


जब वन ही नहीं रहेगा तो राष्ट्रीय पक्षी व पशु की जरूरत क्या…उन्हें क्यों संरक्षण देने की जरूर
व्यर्थ की जरूरत के लिए जंगल का विनाश सरकार की जरूरत?
देश का राष्ट्रीय पशु बाघ राष्ट्रीय पक्षी मोर है पर उनके रहने के लिए जंगल कहां है?
छत्तीसगढ़ के बाद अब तेलंगाना में 400 एकड़ वन भूमि नष्ट की जा रही है?
वन व जंगल प्राकृतिक देन है पर उन्हें नष्ट करना सरकार की देन
कोरिया सरकार के लिए क्या जरूरी है अपनी मनमर्जी चलाना या फिर देश के हित में जो जरूरी है।उसे बचाना क्या सरकार की चिंता अपने देश के लोग सहित देश के लिए अब नहीं रह गई क्योंकि जिस प्रकार से सरकार तानाशाही रवैया अपना रही है उससे तो कुछ ऐसा ही लगता है देश में किसी भी सरकार को पर्यावरण की चिंता अब नहीं सता रही है। लगता है कि सरकार में बैठे लोगों को ना तो शुद्ध हवा की जरूरत है और ना ही एक संतुलित पर्यावरण की। यही वजह है कि वह इन सबसे परे सिर्फ तत्कालीन सोच पर आश्रित हो गए हैं। वनों का विनाश जिस तरीके से हो रहा है जिसे विकास का नाम दिया जा रहा है क्या यह वनों की बलि देकर देश के विकास की नींव रख रहे हैं? जब वनों की जरूरत ही नहीं है तो फिर यह विभाग क्यों बचा है। इस विभाग को भी विलुप्त कर दिया जाए। जंगल जिस तरीके से नष्ट हो रहे हैं आने वाले समय में तो वह सिर्फ इतिहास के पन्नों में लिखे रहेंगे कि इस जगह पर कभी जंगल हुआ करते थे।जंगल में जब पशुओं की जरूरत ही नहीं है तो फिर पशुओं के लिए नियम क्यों बने हुए हैं। क्या राष्ट्रीय पशु व राष्ट्रीय पक्षी भी सिर्फ देश में कहलाने के लिए रह जाएंगे। उनके लिए जंगल नहीं होंगे। क्या वह भी आईटी पार्क में रहेंगे या फिर कोयला खदान में रहेंगे या फिर जंगल काट कर बनाए गए शहर में रहेंगे। रोजगार देने के नाम पर क्या जंगल को उजाड़ना ही विकास है । क्या जंगल की आवश्यकता सिर्फ विकास के लिए है। लोगों के स्वास्थ्य व देश में संतुलित पर्यावरण के लिए जरूरत नहीं है । इस प्रकार से जंगलों को नष्ट करने की सरकार ठनी हुई है और बड़े-बड़े लोगों की दलाली में जंगल के विनाश की स्थिति निर्मित हो रही है उसे तो आने वाला समय मनुष्य जीवन के लिए धरती पर किसी प्रलय से कम की स्थिति निर्मित नहीं कर रहा है। सरकार अब दूर दृष्टि नहीं रख रहे हैं।अब सरकार सिर्फ नजदीक दृष्टि ही रख रहे हैं । दूर दृष्टि वाली सरकार अब दोबारा नहीं आने वाली। क्योंकि सरकार में अब दूर दृष्टि चिंता वाले नेता नहीं रह गए हैं और ना ही मंत्री और मुख्यमंत्री,प्रधानमंत्री। सभी दृष्टि दोष से गुजर रहे हैं। कुछ ऐसा ही मानना गलत नहीं होगा क्योंकि जिस तरीके से उनकी सोच बदली है और जिस तरीके सभी देश को चला रहे हैं उससे तो ऐसा ही प्रतीत होता है और देश के लोग भी उतने ही मूर्ख बने पड़े हैं। वन व जंगल को नष्ट करने के लिए हर प्रदेश की सरकार प्रयासरत दिख रहे हैं। नष्ट करने के लिए वही आगे दिख रहे हैं। छत्तीसगढ़ भी कुछ इसी दौर से गुजर रहा था।अब हैदराबाद का तेलगाना भी कुछ ऐसी ही स्थिति से गुजर रहा है। 400 एकड़ पर लगे पेड़ों को नष्ट करना अब देश के लिए फिर से बहस का हिस्सा बनकर रह गया है।
यदि अभी वर्तमान की बात की जाए तो बीते ढाई दशकों में विभिन्न सरकारों ने ग्रेटर हैदराबाद के पश्चिमी हिस्से को कंक्रीट के जंगल में तब्दील कर दिया है,जहां प्राकृतिक चट्टानों की जगह ऊंची-ऊंची इमारतें खड़ी हैं। सवाल यह उठता है कि जब शहर के दक्षिणी हिस्से में बंजर ज़मीन उपलब्ध है, तो हैदराबाद की ‘सिलिकॉन वैली’ सिर्फ¸ इसी क्षेत्र में क्यों बनाई जाए? अगर लियो टॉल्स्टॉय की प्रसिद्ध कहानी ‘एक आदमी को कितनी ज़मीन चाहिए? का सवाल तेलंगाना सरकार से पूछा जाता, तो शायद उसका जवाब होता- 400 एकड़। हैदराबाद के कांचा गाचीबोवली इलाके में बनने वाले आईटी पार्क को लेकर सरकार का यही रवैया रहा है। सरकार का दावा है कि इस प्रोजेक्ट में 50,000 करोड़ का निवेश आएगा और 5 लाख नौकरियां पैदा होंगी। मुख्यमंत्री रेवंत रेड्डी के अनुसार, यह विकास तेलंगाना के लिए ऑक्सीजन जैसा है, लेकिन विडंबना यह है कि उन्होंने हैदराबाद के हरे-भरे पेड़ों को जेसीबी मशीनों से काटकर हटा देने की कोशिश की है। यह एक तरह से प्रकृति पर किसी सर्जिकल स्ट्राइक जैसा है।
अगर लियो टॉल्स्टॉय की प्रसिद्ध कहानी ‘एक आदमी को कितनी ज़मीन चाहिए?’ का सवाल तेलंगाना सरकार से पूछा जाता, तो शायद उसका जवाब होता 400 एकड़, हैदराबाद के कांचा गाचीबोवली इलाके में बनने वाले आईटी पार्क को लेकर सरकार का यही रवैया रहा है, सरकार का दावा है कि इस प्रोजेक्ट में 50,000 करोड़ का निवेश आएगा और 5 लाख नौकरियां पैदा होंगी, मुख्यमंत्री के अनुसार, यह विकास तेलंगाना के लिए ऑक्सीजन जैसा है, लेकिन विडंबना यह है कि उन्होंने हैदराबाद के हरे-भरे पेड़ों को जेसीबी मशीनों से काटकर हटा देने की कोशिश की है, यह एक तरह से प्रकृति पर किसी सर्जिकल स्ट्राइक जैसा माना जा
सकता है, वैसे सुप्रीम कोर्ट ने सख्ती दिखाई कागजों पर यह सरकारी ज़मीन है, जैसा कि तेलंगाना हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट भी कह चुके हैं, सरकार के समर्थकों का तर्क है कि इस ज़मीन पर कोई भी फैसला लेना सरकार का अधिकार है, वन विभाग और इस इलाके से सटा हैदराबाद विश्वविद्यालय दोनों का इस मामले में कोई कानूनी हक नहीं है, ऐसा सरकार का पक्ष है पर क्या सरकार का यह पक्ष कितना सही है? यदि जंगलों को उजाड़ कर जंगली जानवरों को भगाकर ही विकास होता है तो फिर विनाश किसे कहा जाता है यह भी कौन बताएगा? जिस प्रकार से जंगल वह वन का विनाश हो रहा है उसे तो देश के राष्ट्रीय पशुओं का भी विनाश माना जा सकता है क्या अब देश के राष्ट्रीय पशुओं को भी हटा देना चाहिए क्योंकि ना जंगल रहेगा और ना कोई जानवर होगा और ना ही कोई राष्ट्र का पशु व पक्षी होगा सिर्फ यदि कुछ होगा तो वह सरकार के दादागिरी वह मनमानी होगी।
-रवि सिंह-
पण्डोपारा,कटकोना,
कोरिया,छत्तीसगढ़
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