भारत एक ऐसा देश है जिसकी संस्कृति में देवी पूजन का बड़ा महत्व है । बेटियों ,बहुओं को घर की लक्ष्मी मन जाता है । परंतु विडंबना यह है के उसी धरती पर संस्कृति के विरोध जा कर आज भी नारी ,स्त्री जाति को अपने हक¸ की लड़ाई न सिर्फ घर से बाहर बल्कि घर में भी लड़ने पड़ती है। आए दिन आने वाले विवादित न्यायपालिक द्वारा दिए गए फैसले ना सिर्फ संकीर्ण सोच को दर्शाते हैं बल्कि दोहरी मानसिकता का भी उजागर करते हैं। एक और सरकार द्वारा नारी सशक्तिकरण को ले कर आए दिन अभियान चलाए जाते है । बेटी पढ़ाओ बेटी बचाओ जैसे नारे दिए जाते हैं । कई तरह के कानूनों प्रस्तावित किए जाते हैं। बड़ा सवाल यह है कि ऐसे में यदि निर्धारित न्यायाधीश ही विवादित फ़ैसला जारी करता है तो यह समाज की क्या दिशा निर्धारित करता है । न्यायाधीश का पद बहुत बड़ी जिम्मेदारी है। कोर्ट द्वारा पारित एक फ़ैसला इतिहास रच देता है । तथाकथित तथ्यों पर आधारित हाल ही में इलाहाबाद नाबालिंग बच्ची के साथ रेप की कोशिश को ले कर माननीय हाई कोर्ट द्वारा पारित फैसले के मुताबिक किसी बच्ची की छाती को स्पर्श करना या पजामे का नाडा खुलना कोई अपराध नहीं है। क्योंकि बलात्कार नहीं हुआ इसलिए अपराध साबित नहीं होता । इस बिनाह पर अपराधियों को बरी कर दिया गया । तथ्यों के अनुसार बच्ची को दो लोगों द्वारा खींचा गया और बलात्कार की कोशिश की गई मगर किसी राहगीर की वजह से वह मासूम बच गई ।सवाल यह उठता है कि क्या इस तरह के फैसले न्यायसंगत है ? किस मानसिकता के लोग न्यायप्रणाली का हिस्सा है ? ऐसे न्यायिक फैसलों पर सरकार द्वारा क्या कदम उठाया जाता है ? क्या बलात्कार की कोशिश अपराध नहीं ? क्या यह नाबालिग बच्ची के अधिकारों और उसकी सुरक्षा पर एक बड़ा सवाल नहीं ? क्या यह चाइल्ड एक्ट का हनन नहीं ? ये कहना गलत नहीं होगा कि सिर्फ और सिर्फ नारी सशक्तिकरण की बातें समाज में किसी तरह का बदलाव नहीं ला सकती ।जब तक कि सरकार में बैठे प्रतिनिधि , न्यायपालिका और अन्य सर्वोच्च पदों पर बैठे लोग संकीर्ण विचारधारा से बाहर नहीं निकलते । कानून सुरक्षा का नाम है । इस से केवल शब्द जाल के अंतर्गत खेलना गलत है । समाज को सही दिशा देने के लिए कानून को ऐसा बनाने की जरूरत है कि अपराधी उससे डरे और खेल ना सके । अपराध होने से पहले ही उसे रोकना न्यायिक प्रणाली का उद्देश्य होना चाहिए ।पीडç¸त को न्याय मिलेगा तभी वह न्यायप्रणाली पर भरोसा करेगा। आज जब समाज में मानवता खत्म होने के कगार पर है ऐसे में इस तरह के विवादित फैसले समाज के लिये बड़ा खतरा है । ऐसे फैसले अपराधियों के हौंसले बढ़ते है। जिन पर पुनः विचार करने की आवश्यकता है।
केशी गुप्ता
द्वारका,दिल्ली
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