नीकी पर फीकी लगे, बिन अवसर की बात!! मैं सदैव यही सुनकर बड़ी हुई हूँ, मेरी माँ सदा ये बात कहती रहती थीं। और वैसे सही भी है, कोई बात कितनी भी अच्छी क्यों न हो, कहाँ बोलना है और कब बोलना है, यह सोच कर ही बोलना चाहिए। मैं पिछले दिनों अपने ऑफिस के काम से नयी दिल्ली गयी हुई थी, वहां अचानक ही किसी करीबी मित्र के रिश्तेदार का देहावसान हो जाने पर उनके साथ मैं भी शोक व्यक्त करने चली गयी, अभी उनकी मिट्टी उठी नहीं थी, सारे लोग वहीं बैठे हुए नम आँखों से आपस में मानो मौन वार्तालाप कर रहे थे। मैं किंकर्तव्यविमूढ़ सी चुपचाप ये सब देख रही थी। उसी समय बाहर गेट पर कोई बड़ी ऊंची आवाज़ में बातें करता हुआ दाखिल हुआ,हालांकि बातें तो उन्हीं दिवंगत व्यक्ति के विषय में थीं,परन्तु लहजे में दूर दूर तक संवेदना लेशमात्र भी नहीं झलक रही थी, वे सज्जन इन (मृत व्यक्ति) के चचेरे भाई बताये गए, और वे काफी देर तक बाहर गेट पर ही बतियाते रहे, फिर अंदर दाखिल हुए, यहाँ आकर भी वही प्रपंच शुरू। मैं यह नहीं कह रही कि वे भाई साहब दुःखी न रहे होंगे, ज़रूर रहे होंगे,आखिर उनके भाई का देहांत हुआ था, परन्तु उनका दुःख अभिव्यक्त करने का तरीका ज़रा अलगअंदाज़ लगा मुझे! ख़ैर, तभी तो घुमन्तु गीत यानी कि मैं दुनिया घूम घूम कर कुछ ना कुछ नवल नवीन अनुभव एकत्रित करती रहती हूँ, उनकी तमाम बातों के बीच भी मैं मन ही मन राम-राम जपती रही, अंत में अपना बैकपैक उठाया, अपनी मित्र से मिलकर, उन सब से विदा ली और चल पड़ी अपने होटल की ओर, उसी शाम की मेरी फ्लाइट थी, और मुझे रूम चेकआउट भी करना था। वापस आते समय पूरे रास्ते भर मैं यही सोचती रही, नीकी पर फीकी लगे, बिन अवसर की बात!! मन में एक बड़े शून्य के साथ अब फ्लाइट बोर्ड कर ली है, अगला पड़ाव बम्बई यानी कि मुंबई है, तो मिलते हैं इस घुमन्तु गीत के बम्बइया अनुभवों के किसी चटपटे किस्से के साथ। हर हर महादेव मित्रों!
प्रियंका अग्निहोत्री ग
काशी,उत्तर प्रदेश
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