
महंगाई ने कर दिया है, मेरा जीना बुरा हाल।
जुबां खामोश है, बदल गयी है मेरी चाल।।
मैं कैसे दीवाली मनाऊं, कैसे मैं दीप सजाऊं।
बढ़ती महंगाई की, तकलीफ़ मैं कैसे छिपाऊं।।
रात्रि के अंधकार को, भला मैं कैसे भगाऊं।
सूनी पड़ी है रसोई मेरी, मैं आंगन कैसे सजाऊं।।
बढ़ती महंगाई से, मेरे लिए दिन भी रात हो गया है।
इससे छुटकारा दिलाने वाला, वो राम कहाँ चला गया है।।
मन में तो मेरे आशा है, पर हाथ में मेरे बस निराशा है।
महंगाई की चमक, कम न होती किसी ने इसे खुब तराशा है।।
मैं कैसे मनाऊं दीवाली, यहाँ तो हर तरफ अंधियारी छायी है।
मेरे ही घर के दीये चोरी कर,पड़ोसन ने घर -आंगन सजायी है।।
एक दिन के दीवाली से, भला इस संसार का क्या? होगा।
लोग छुट्टी मनाएंगे बस, बाद में फिर रावण का प्रचार होगा।।
यदि सच में लोग दीवाली मनाते, सबके मन में सत्य बसता।
राम को अपना आदर्श मानते, तो सच इतना बेबश न होता।।
कोई रास्ते पर चलते हुए, यूं ही प्यासा तड़प कर नहीं मरता।
दो घूंट पानी देने के लिए,कोई यूं ही झूठ नहीं बोलता।।
मैं भला किसके लिए, दीप जलाऊं अपना घर-आंगन सजाऊं।
इंसानियत का अकाल पड़ा है, मैं भला किस-किस को बताऊं।।
दीपों से घर -आंगन सजे हैं, रात में ये अधंकार कैसा।
मुंह में राम और बगल में छुरी,बात – बात में ये संस्कार कैसा।।
मैं उस दिन दीप जलाऊंगा, घर-आंगन मेरे भी सजाऊंगा।
इंतजार है उस दिन का, जब मैं सबके मन से द्वेष मिटाऊंगा।।
हितेश्वर बर्मन चैतन्य
विलाईगढ़ सारंगढ़ छत्तीसगढ़¸
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