कोरिया@ब्राह्मण समाज ने कराया 27 बटुकों का उपनयन संस्कार

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पटना हनुमान मंदिर परिसर में किया गया आयोजन।
संभाग भर के बटुक परिवार समेत हुए शामिल।


-संवावदाता
कोरिया 20 अप्रैल 2024 (घटती-घटना)। विगत वर्ष की भांति इस वर्ष भी ब्राह्मण समाज कोरिया के द्वारा उपनयन संस्कार का आयोजन किया गया,पटना हनुमान मंदिर परिसर में आयोजित सामाजिक उपनयन संस्कार समारोह में 27 बटुकों को मंत्रोचार के बीच विधि विधान से जनेऊ धारण कराया,आयोजन में सरगुजा संभाग से बटुक परिवार समेत शामिल हुए।  शुक्रवार को सुबह 8 बजे से प्रारंभ उक्त  संस्कार समारोह हेतु बटुकों के वस्त्र से लेकर समस्त पूजन सामग्री की व्यवस्था ब्राह्मण समाज कोरिया के सदस्यों के द्वारा आपसी सहयोग से की गई थी।

आचार्य पंडित सुयश देव महराज, पंडित मुकेश जी, पंडित सुरेश मिश्रा एवं पंडित देवेंद्र गौतम ने बटुकों को मंत्रोचार के साथ यज्ञोपवीत धारण करवाते हुए इसकी उपयोगिता व नियमों पर प्रकाश डालते हुए कहा कि जनेऊ धारण करना व इसके नियमों पर दृढ़तापूर्वक चलना प्रत्येक ब्राह्मण का नैतिक कर्तव्य है।  उपनयन संस्कार के दौरान बटुकों को तेल हल्दी की रस्म के साथ ही मंडप पूजन की विधि की गई। आचार्यों ने उपनयन संस्कार के बारे में बताते हुए ब्रह्मचर्य का महत्व बताया और गायत्री मंत्र के साथ ही दीक्षा दी। इस अवसर पर बटुकों की शिक्षा के लिए काशी गमन की विधि हुई। पंडाल में एक साथ 27 बटुकों का संस्कार कार्यक्रम और वैदिक मंत्रचार आकर्षण का केंद्र रहा। शिक्षा ग्रहण पश्चात वापस आने पर बटुकों के परिजन ने उनका स्वागत किया,बटुकों ने भी भिक्षाम देही..के स्वर के साथ गुरु शिष्य परंपरा के तहत भिक्षा भी मांगी। इसमें उनके परिजन और समाज ने उन्हें नए वस्त्र और अन्य उपहार भेंट किए।  आचार्यों ने बतलाया कि सभी संस्कारों में उपनयन संस्कार सबसे महत्वपूर्ण होता है,इससे जीवन में अनुशासन आता है और धर्म की शिक्षा भी मिलती है। आचार्यों का साथ अन्य पंडितो ने दिया।  इस दौरान ब्राह्मण समाज कोरिया के अध्यक्ष बृज नारायण मिश्रा ने बटुकों को शुभकामनाएं एवं परिजन को धन्यवाद देते हुए कहा कि वैदिक धर्म में यज्ञपोवित दशम संस्कार है,इस संस्कार में बटुक को गयंत्री मंत्र की दीक्षा दी जाती है और यज्ञोपवीत धारण कराया जाता है,यज्ञोपवीत का अर्थ है यज्ञ के समीप या गुरु के समीप आना। यज्ञोपवीत एक तरह से बालक को यज्ञ करने का अधिकार देता है। शिक्षा ग्रहण करने से पहले यानी गुरु के आश्रम में भेजने से पहले बच्चे का यज्ञोपवीत किया जाता था, भगवान रामचन्द्र तथा कृष्ण का भी गुरुकुल भेजने से पहले यज्ञोपवीत संस्कार हुआ था। श्री मिश्रा ने कहा कि कालांतर से इस संस्कार का विशेष महत्व है,हालांकि तात्कालीन समय में वर्ण व्यवस्था उपनयन संस्कार से निर्धारित किया जाता था ऐसा कहा जाता है कि जब बालक ज्ञान हासिल करने योग्य हो जाए तब सर्वप्रथम उपनयन संस्कार करना चाहिए।  ब्राह्मण समाज कोरिया के सचिव योगेंद्र मिश्रा ने कहा कि समाज द्वारा पिछले वर्ष से उपनयन संस्कार कराया जा रहा है, जिसमें परिजन को इस संस्कार के लिए अतिरिक्त खर्च वहन नहीं करना पड़ता, समाज के द्वारा आपसी सहयोग से उक्त आयोजन किया जा रहा है,इससे विप्र परिवार को लाभ मिल रहा है। जबकि व्यक्तिगत तौर पर उपनयन संस्कार करने में एक बड़ी राशि खर्च करनी पड़ती है। अधिक खर्च से बटुकों के परिजन को मुक्त रखने के लिए ब्राह्मण समाज कोरिया के द्वारा लगातार दूसरे वर्ष उपनयन संस्कार आयोजित किया गया जहां मामूली खर्च पर भोजन आदि की व्यवस्था के साथ वैदिक विधान से संस्कार संपन्न हो रहा है। इस अवसर पर समाज के संरक्षक रविशंकर शर्मा, जय नाथ बाजपेयी, वेदांती तिवारी, केडी त्रिपाठी, अखिलेश मिश्रा, बीके पांडेय, एस एस दुबे, नरेश तिवारी, कौशलेंद्र त्रिपाठी, ध्रुवनाथ तिवारी, शैलेंद्र शर्मा, सत्यप्रकाश तिवारी, नितिन शर्मा, राजीव पाठक, प्रमोद अवस्थी, शंभू दयाल शुक्ला, रामसागर तिवारी, चंद्र शेखर अवस्थी, रामप्रकाश तिवारी, रुद्र मिश्रा, अखिलेश द्विवेदी, शिब्बू मिश्रा, राहुल मिश्रा, विवेकानंद पांडेय, अभिषेक द्विवेदी, विवेकानंद चौबे, देवव्रत पांडेय, करुणा त्रिपाठी, रूपेश तिवारी, राघवेंद्र तिवारी, अनुराग दुबे, विकास शुक्ला, हिमांशु अवस्थी, महिला इकाई जिलाध्यक्ष श्रीमती वंदना शर्मा, अनिल मिश्रा, अवनीश मिश्रा, सरोज पांडेय, बालेंद्र मिश्रा, सत्यनारायण मिश्रा, जितेंद्र पांडेय, सुनील दुबे, विकास चौबे, निलेश पांडेय, रविशंकर पांडेय गुड्डा, भोलू चौबे, प्रदीप द्विवेदी, रामनरेश समेत बड़ी संख्या में विप्र शामिल हुए।

 

                             


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