दिमाग के एक कोने में सालभर की स्कूल की फीस एवं वाहन की फीस की चिंता भी होगी।
सरकारी स्कूल में पढ़ रहे बच्चों के पालक अपने बच्चों के बस्ते को खोलकर देखते भी नहीं, आखिर क्यों ?
स्कूल आ पढ़े बर, जिंदगी ला गढ़े बर।
आशीष जायसवाल शिक्षक। कल से स्कूल खुल गए खर्चा कर प्राइवेट स्कूल में पढ़ने वाले बच्चों के पालक चेक करेंगे की उनके बच्चों के पास पेन, पेंसिल, बुक्स,कॉपी, ड्रेस, बैग, जुते, टाई आदि सब है या नहीं। यदि नहीं है तो तत्काल आवश्यक चीजें, चाहे जैसे भी हो बच्चों को उपलब्ध कराए जाएंगे। दिमाग के एक कोने में सालभर की स्कूल की फीस एवं वाहन की फीस की चिंता भी होगी। इसे हेतू अलग से पारिवारिक बजट बनेगा। दूसरी तरफ सरकारी स्कूल भी खुलेंगे। लगभग सभी स्कूलों में पाठ्यपुस्तकें पहुंच जाएंगी, स्कूल ड्रेस आदि भी पहुंचने को होंगे। स्कूल में मध्यान्ह भोजन हेतु आवश्यक तैयारी भी पूरी कर ली गई होगी। अब आता हूं मैं अपनी चिंता पर जो की मेरे मन में शिक्षक के रूप में कार्य प्रारंभ करने के पूर्व अपने छात्र जीवन से बनी हुई है।
आज प्राईवेट स्कूल में खर्चा कर पढ़ा रहे पालक चाहे वे अमीर हों या गरीब, सभी प्रकार के जतन अपने बच्चों के लिए करते हैं। किंतु सरकारी स्कूल में पढ़ रहे बच्चों के पालक अपने बच्चों के बस्ते को खोलकर देखते भी नहीं। उन्हें इस बात की भी परवाह नहीं होती कि बच्चे के पास बस्ता, झोला, थैला भी है या नहीं? ऐसा ही महसूस होता है, कुछ अपवादों को छोड़ कर। अच्छी बात है सरकार पुस्तक निःशुल्क देती है, स्कूल ड्रेस देती है, मध्यान्ह भोजन दे देती है, छात्रवृत्ति भी प्रदान करती है। किंतु एक शिक्षक समझ पाता है, महसूस कर पाता है कि बिना बुनियादी आवश्यकताओं के स्कूल आने वाला छात्र कितना आगे बढ़ पाएगा। एक शिक्षक प्रयास करके अपनी ओर से कुछ दे भी दे तब भी वह प्रत्येक बच्चे को सारी चीजें उपलब्ध नहीं करा पाएगा। यकीन मानिए बिना पर्याप्त आवश्यकताओं की पूर्ति के क्या नुकसान होता है, ये बात सिर्फ एक शिक्षक समझ सकता है और कोई नहीं।
40 बच्चों की कक्षा में 5 बच्चों के पास सभी चीजें हैं, अन्यों के पास किसी के पास कॉपी है, किसी के पास पेन है, कॉपी आधी अधूरी है, जरूरत चार कॉपी की है, तो दो ही कॉपी है, कॉपी है पर पेंसिल नहीं है, रबड़ नहीं है। यह स्थिति हर सरकारी स्कूल में आप पाएंगे। सवाल यही उठता है कि जब पर्याप्त मात्रा में बच्चे के पास आवश्यक सामग्री नहीं है, ऐसे में बिना इन सब चीजों के बच्चा कैसे सीखेगा? कैसे अभ्यास करेगा? प्राइवेट स्कूल में पढ़ने वाले बच्चों के पालक प्रातः स्कूल भेजते समय हर छोटी से छोटी चीजों का ध्यान रखते हैं। यथा बच्चे ने सही जूते मोजे पहने कि नहीं, टिफिन में क्या रखा है, होमवर्क पूरा हुआ या नहीं। साथ ही स्कूल से आने के बाद बच्चों के दिन भर की गतिविधियों का पूरा ख्याल रखा जाता है। उसके होमवर्क कराए जाते हैं, ट्यूशन लगाया जाता है। प्राइवेट स्कूल वाले बच्चों को घरेलू कार्य से दूर केवल सामरिक गतिविधियों में ही संलिप्त किया जाता है। परंतु इसके ठीक विपरीत सरकारी स्कूल में पढ़ने वाले बच्चों के पालक (कुछ अपवादों को छोड़कर) न तो विद्यालय भेजते समय और ना ही विद्यालय से आने के बाद अपने बच्चे की गतिविधियों पर कुछ विशेष ध्यान रखते हैं। कपड़े गंदे हों या पैरों में चप्पल भी ना हो इन सब चीजों से उन्हें कोई मतलब नहीं।
घर में आने के बाद बच्चा कुछ समय पढ़ता है या नहीं? घरेलू समय में उसकी क्या गतिविधियां है, इस बात की परवाह अभिभावकों को नहीं होती। अपितु आमतौर पर यह देखने में आया है कि सरकारी स्कूल में पढ़ने वाला बच्चा अपने हर घरेलू काम में अपना ज्यादातर समय अपने अभिभावकों की मदद में गुजार देता है। यथा गाय, भैंस, बकरीयां चरानी हों, उन्हें चारा डालना हो, बाड़ी में काम करना हो, राशन लेने जाना हो। और भी वह सारे काम जो दैनिक जीवन की आवश्यकता में आते हैं, सरकारी स्कूल के विद्यार्थियों को करने पड़ते हैं। सरकारी विद्यालयों में पढ़ने वाले बच्चों के अभिभावक यदि अपने बच्चों को समय ही पर्याप्त दें तो भी शिक्षक के लिए राह काफी आसान हो जाएगी।
शिक्षक भी अब शिक्षक कहां रहा? मध्यान्ह भोजन का संचालन करना हो, दिन भर में दसों प्रकार के रिपोर्ट तैयार करने हों, शैक्षणिक गतिविधियों के इतर जितने भी कार्य हैं सब शिक्षकों के मत्थे मढ़ दिए जाते हैं। शिक्षकों से शिक्षा के कार्य कराया ही कहां जा रहा? आए दिन नए-नए प्रयोग और निरंतर होते बदलाव ने पूरे शिक्षकीय गतिविधियों को एक प्रयोगशाला मात्र बना दिया है। उपरोक्त जितनी भी कठिनाइयों का जिक्र मैंने किया है, इनका दूर किया जाना बहुत ही जरूरी है। और यह सरकार, सहकार, समाज, पालक, अभिभावक और शिक्षक के बिना संभव नहीं है। हम शिक्षक अपने स्तर पर करते ही हैं। यहां पर जितनी भी बातें मैंने लिखी हैं, वह बहुत ही कम है। इसके अलावा भी बहुत सारी कमियां, जरूरतें सरकारी स्कूलों में है।
वर्तमान में शिक्षा का अधिकार कानून 2009 के अंतर्गत गरीब परिवार के बच्चों को निजी विद्यालयों में अध्ययन करने हेतु सरकार द्वारा सुविधा दी जा रही है, जिसके एवज में सरकार उन निजी विद्यालयों को भुगतान भी करती है। तो क्यों ना सरकारी स्कूलों में निवेश बढ़ाया जाए सरकार के द्वारा ताकि सिर्फ 25 प्रतिशत ही नहीं 100 प्रतिशत बच्चों को सुविधा मिल पाए। अभी छत्तीसगढ़ में उत्कृष्ट विद्यालय भी खोले जा रहे है तो क्यों ना सभी विद्यालयों को उत्कृष्ट बनाने का प्रयास हो। हो सकता है बहुत लोग इन बातों से सहमत ना हों और इसे कोई बड़ी समस्या ना मानें। लेकिन यह एक गंभीर और चिंतन करने का विषय है। यह भी हो सकता है की कुछ लोग कहें की हर चीज मुफ्त करना उचित नहीं है, तो उनसे कहूंगा की सिर्फ शिक्षा और स्वास्थ्य फ्री कर दिया जाए। सुविधाहीन निजी संस्थाओं को बंद/सीमित कर सरकारी विद्यालयों की व्यवस्था बढा़ कर तो देखिए गुणात्मक विकास क्या होता है? बहुत ही जरूरी है शिक्षा में सरकार द्वारा बजट को बढ़ाना, तब जाकर हम आश्वस्त हो सकते हैं, भारत के उज्जवल भविष्य को लेकर।
आशीष जायसवाल शिक्षक
ग्राम पंचायत छिंदिया,तहसील बैकुंठपुर कोरिया
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