



- मृत किसान के नाम पर ऋ ण,शिकायत हुई तो रकम जमा,अब हस्ताक्षरों का रहस्य!, ऋण किसने निकाला,रकम किसने जमा की? मृत किसान के मामले में हस्ताक्षरों का पेच…
- मृत किसान के नाम पर ऋण से शिकायत वापसी तक सवाल-सोनपुर समिति का हिसाब कौन देगा?
- सोनपुर सहकारी समिति में 10 मई 2021 को मृत्यु,जून में ऋण स्वीकृति का आरोप,पहले 1.29 लाख,फिर 69,175 जमा- लेकिन पैसा किसने निकाला,
- किसने जमा किया और हस्ताक्षर किसके? शिकायतकर्ता ने जितवेश श्रीवास्तव पर लगाए गंभीर आरोप, कलेक्टर और उप पंजीयक सहकारिता से जांच की मांग
- मृत्यु के बाद ऋण का खेल? दो बार रकम जमा,फिर शिकायत वापसी पर सवाल
- शिकायत के बाद 1.29 लाख,फिर 69,175 जमा… अब हस्ताक्षर किसके?
- खाते में रकम जमा,पर हिसाब अब भी बाकी! सोनपुर केसीसी प्रकरण में नया मोड़
-ओंकार पाण्डेय-
सूरजपुर/ भैयाथान,30 अक्टूबर 2026 (घटती-घटना)। सहकारिता व्यवस्था में कागजों का अपना एक अलग संसार होता है, कहीं ऋण स्वीकृत हो जाता है,कहीं खाते से रकम निकल जाती है,फिर वसूली का नोटिस जारी होता है,शिकायत होती है तो रकम जमा होने का विवरण सामने आता है और जब मामला दोबारा उठता है,तो शिकायत वापसी का पत्र भी सामने आ जाता है, लेकिन जब शिकायतकर्ता ही कहने लगे कि जमा पर्ची और शिकायत वापसी के दस्तावेज पर उसके हस्ताक्षर नहीं हैं,तब सवाल केवल खाते के हिसाब का नहीं रह जाता—पूरी प्रक्रिया की विश्वसनीयता जांच के घेरे में आ जाती है।
आदिम जाति सेवा सहकारी समिति मर्यादित, सोनपुर से जुड़ा मृत किसान हरिप्रसाद के नाम पर कथित KCC ऋ ण का मामला अब इसी मोड़ पर पहुंच गया है, मृतक के पुत्र देवी प्रसाद ने 28 अक्टूबर 2026 को कलेक्टर सूरजपुर और उप पंजीयक सहकारिता के समक्ष आवेदन देकर आरोप लगाया है कि 17 अक्टूबर को उनकी जानकारी और सहमति के बिना उनके नाम से कथित फर्जी हस्ताक्षर कर ?69,175 ऋण खाते में जमा किए गए, उनका यह भी आरोप है कि 21 अक्टूबर को उनके नाम से शिकायत वापसी का पत्र उच्च कार्यालय को भेजा गया,जबकि उन्होंने शिकायत वापस लेने की सहमति नहीं दी थी,इससे पहले भी यह मामला ‘दैनिक घटती-घटना’ में प्रकाशित हो चुका है,अब नई शिकायत के बाद सवाल और गंभीर हो गए हैं,शिकायतकर्ता के अनुसार, उनके पिता की मृत्यु के बाद उनके नाम पर ऋ ण स्वीकृत हुआ,खाते से रकम निकली,बकाया ऋ ण का नोटिस आया,शिकायत के बाद ?1.29 लाख जमा हुए और फिर अक्टूबर 2026 में ?69,175 जमा होने का विवरण सामने आया,अब विवाद जमा पर्ची और शिकायत वापसी के पत्र पर दर्ज हस्ताक्षरों को लेकर है,सवाल सीधा है—क्या ऋण खाते में रकम जमा हो जाने से यह पता चल जाता है कि मूल ऋ ण किसने लिया,रकम किसने निकाली और पूरी प्रक्रिया नियमों के अनुसार हुई थी?
10 मई को मृत्यु,फि र 25 मई को निकासी-खाते की पहली पहेली
शिकायतकर्ता द्वारा दिए गए विवरण के अनुसार,हरिप्रसाद की मृत्यु 10 मई 2021 को हुई थी,इसके बाद 25 मई 2021 को उनके खाते से ?17,000 की निकासी दर्ज होने का उल्लेख है,फि र 1 जून 2021 को ?75,000 और 11 जून 2021 को ?54,000 का KCC ऋ ण स्वीकृत होने का दावा किया गया है, दोनों ऋ णों की कुल राशि ?1,29,000 बताई गई है, शिकायत में ऋण की रकम से संबंधित निकासी का विवरण भी दिया गया है, ?75,000 के ऋ ण में से 3 जून को ?49,000 और 4 जून को ?26,000 निकाले जाने का उल्लेख है,वहीं ?54,000 के ऋण में से 17 जून को ?49,000 और 21 जून को ?5,000 निकाले जाने का विवरण दिया गया है, इसके अतिरिक्त 23 अगस्त 2021 को ?18,500 की निकासी का भी उल्लेख है,यदि मृत्यु प्रमाणपत्र और बैंक रिकॉर्ड में दर्ज तारीखें सही हैं, तो जांच का पहला सवाल यही है कि मृत्यु के बाद ऋ ण आवेदन किसने प्रस्तुत किया? ऋ ण स्वीकृति के लिए किसान की पहचान और पात्रता का सत्यापन किसने किया? दस्तावेजों पर हस्ताक्षर किसके थे? ऋ ण स्वीकृति किस अधिकारी या कर्मचारी ने दी? और खाते से रकम निकालने के लिए किसने दस्तावेज प्रस्तुत किए? 25 मई और 23 अगस्त की निकासी को जून में स्वीकृत ऋ णों से सीधे जुड़ रहा है,इन प्रविष्टियों का वास्तविक आधार बैंक के मूल लेजर और संबंधित वाउचर से ही स्पष्ट करना चाहिए,यह कोई ऐसा हिसाब नहीं है जिसे केवल एक अंतिम शेष राशि देखकर समझ लिया जाए,ऋ ण स्वीकृति से लेकर हर निकासी तक की कड़ी सामने आनी चाहिए,आखिर बैंक के रिकॉर्ड में दर्ज रकम का वास्तविक लाभार्थी कौन था?
वसूली का नोटिस आया,तब मृतक के नाम पर ऋण की जानकारी मिलने का दावा
शिकायतकर्ता का कहना है कि वर्ष 2024 में उन्हें अपने दिवंगत पिता के नाम पर ?1,72,860 का बकाया ऋ ण जमा करने के लिए समिति से नोटिस मिला, उनके अनुसार,इसी नोटिस के बाद उन्हें कथित ऋ ण की जानकारी हुई,इसके बाद 22 जुलाई 2024 को उन्होंने कलेक्टर सूरजपुर के जनदर्शन में लिखित शिकायत प्रस्तुत की,यहां सहकारिता व्यवस्था से सवाल पूछा जाना जरूरी है,यदि ऋ ण की स्वीकृति और भुगतान की प्रक्रिया नियमों के अनुसार हुई थी,तो वसूली का नोटिस जारी करने से पहले ऋ ण आवेदन,स्वीकृति आदेश और संबंधित रिकॉर्ड का सत्यापन किस आधार पर किया गया? यदि ऋ ण के संबंध में विवाद था,तो उसकी जांच किस स्तर पर हुई? उसी तरह शिकायतकर्ता का आरोप भी अपने आप ऋ ण को फर्जी सिद्ध नहीं करता,लेकिन मृत्यु की तारीख और ऋ ण स्वीकृति की तारीखों के बीच जो सवाल खड़े होते हैं,उनका उत्तर दस्तावेजों से मिलना चाहिए।
पहली शिकायत के चार दिन बाद 1.29 लाख जमा-लेकिन जमा किसने किए?
शिकायतकर्ता के विवरण के अनुसार,22 जुलाई 2024 को जनदर्शन में शिकायत किए जाने के बाद 26 जुलाई 2024 को ?1,29,000 ऋ ण खाते में जमा किए गए। शिकायतकर्ता का आरोप है कि इसके बाद शिकायत वापसी से संबंधित दस्तावेज भी सामने आया,लेकिन इस घटनाक्रम में सबसे अहम सवाल यह है कि ?1.29 लाख किसने जमा किए? रकम कहां से आई? क्या शिकायतकर्ता ने स्वयं भुगतान किया था या किसी दूसरे व्यक्ति ने? बैंक की जमा पर्ची पर किसके हस्ताक्षर हैं? और शिकायत वापसी के पत्र पर दर्ज हस्ताक्षर किसने किए? शिकायतकर्ता ने अब हस्ताक्षरों को लेकर आपत्ति जताई है,इसलिए जमा पर्ची और शिकायत वापसी के दस्तावेजों की मूल प्रतियां सामने आना जरूरी है, यदि शिकायतकर्ता के हस्ताक्षर वास्तविक हैं,तो जांच में उसका आधार स्पष्ट होना चाहिए,यदि वे उनके हस्ताक्षर नहीं हैं,तो इसकी पुष्टि सक्षम जांच से होनी चाहिए,व्यंग्य अपनी जगह, लेकिन सवाल गंभीर है—शिकायत के बाद रकम जमा हो गई, तो क्या इससे ऋ ण स्वीकृति और निकासी की मूल प्रक्रिया अपने आप सही साबित हो जाती है?
2026 में फिर बकाया नोटिस-पुराना विवाद दोबारा सामने
शिकायतकर्ता के नए आवेदन के अनुसार,7 अक्टूबर 2026 को उन्हें ?64,512 बकाया ऋ ण जमा करने का नोटिस दिया गया। शिकायतकर्ता ने बताया कि इसके बाद उन्होंने दोबारा शिकायत की, आपके उपलब्ध विवरण में दूसरी शिकायत की तारीख 14 अक्टूबर बताई गई है,जबकि पूर्व में साझा सामग्री में 15 अक्टूबर का भी उल्लेख आया है, इस तारीख की मूल आवेदन से पुष्टि जरूरी है,यहां फि र वही सवाल उठता है—यदि 2024 में 1.29 लाख जमा किए गए थे,तो 2026 में बकाया राशि किस आधार पर दिखाई गई? क्या मूलधन,ब्याज और अन्य देय राशि का पूरा हिसाब दिया गया था? क्या 2024 के भुगतान का समुचित समायोजन हुआ था? या बैंक रिकॉर्ड में कोई विसंगति थी? इन सवालों का उत्तर ऋ ण खाते के प्रमाणित विवरण से ही मिल सकता है,केवल नोटिस की राशि और बाद में जमा रकम को देखकर किसी अनियमितता का अंतिम निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा।
17 अक्टूबर को 69,175 जमा शिकायतकर्ता ने सहमति से इनकार किया
नए आवेदन में शिकायतकर्ता ने आरोप लगाया है कि 17 अक्टूबर 2026 को उनकी जानकारी और सहमति के बिना उनके नाम से कथित फर्जी हस्ताक्षर कर ?69,175 ऋ ण खाते में जमा किए गए, उन्होंने यह भी कहा है कि जमा वाउचर पर दर्ज हस्ताक्षर उनके नहीं हैं,यह आरोप अब जांच का महत्वपूर्ण बिंदू है,बैंक रिकॉर्ड से स्पष्ट होना चाहिए कि ?69,175 किसने जमा किए, किस खाते या माध्यम से राशि आई,किसने वाउचर तैयार किया और भुगतान के समय शिकायतकर्ता की पहचान तथा सहमति की पुष्टि की गई थी या नहीं,यदि जमा पर्ची पर शिकायतकर्ता के हस्ताक्षर होने का दावा किया गया है और वही व्यक्ति हस्ताक्षर से इनकार कर रहा है,तो केवल दस्तावेज में हस्ताक्षर मौजूद होने से विवाद समाप्त नहीं हो जाता,मूल पर्ची,संबंधित बैंक प्रविष्टि और शिकायतकर्ता के निर्विवाद हस्ताक्षरों का मिलान आवश्यक है, लेकिन जांच से पहले यह भी निश्चित रूप से नहीं कहा जा सकता कि हस्ताक्षर फर्जी ही हैं, शिकायतकर्ता का आरोप गंभीर है,और उसका निष्पक्ष परीक्षण होना चाहिए।
21 अक्टूबर को शिकायत वापसी का पत्र-किसकी सहमति से गया?
इस मामले में दूसरा बड़ा विवाद 21 अक्टूबर 2026 को उच्च कार्यालय को भेजे गए कथित शिकायत वापसी पत्र को लेकर है, शिकायतकर्ता का आरोप है कि उन्होंने शिकायत वापस लेने की सहमति नहीं दी,फिर भी उनके नाम से हस्ताक्षर करके पत्र भेज दिया गया,28 अक्टूबर 2026 को कलेक्टर सूरजपुर और उप पंजीयक सहकारिता को दिए गए आवेदन में देवी प्रसाद ने कहा है कि उनकी मूल शिकायत,ऋ ण जमा वाउचर और शिकायत वापसी के पत्र पर दर्ज हस्ताक्षर अलग-अलग प्रतीत होते हैं, उन्होंने इन दस्तावेजों की जांच कराने की मांग की है,यहां सवाल केवल हस्ताक्षरों का नहीं,बल्कि पूरी प्रक्रिया का है,पत्र किसने तैयार किया? किसने कार्यालय में प्रस्तुत किया? प्राप्ति किस तारीख को दर्ज हुई? क्या शिकायतकर्ता से सीधे संपर्क कर यह पुष्टि की गई कि वह वास्तव में शिकायत वापस लेना चाहते हैं? क्या शिकायत वापसी से पहले मूल आरोपों की जांच हुई थी? यदि शिकायतकर्ता ने पत्र दिया ही नहीं,तो उसकी प्रामाणिकता का सवाल गंभीर हो जाता है,यदि उन्होंने पत्र दिया था,तो उनकी सहमति और परिस्थितियों की पुष्टि भी जरूरी है,किसी भी निष्कर्ष पर पहुंचने से पहले मूल दस्तावेजों की जांच होनी चाहिए।
शिकायतकर्ता को परेशान करने और घर छोड़कर जाने का दावा भी जांच के दायरे में
इस प्रकरण में शिकायतकर्ता की परेशानी का पहलू भी महत्वपूर्ण है,आपने बताया है कि शिकायतकर्ता को कथित रूप से इतना परेशान किया गया कि उन्हें अपना घर छोड़कर भागना पड़ा, यह दावा गंभीर है और इसे खबर में नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए, हालांकि,उपलब्ध दस्तावेजों से इस घटना की स्वतंत्र पुष्टि अभी स्पष्ट नहीं है, यदि शिकायतकर्ता को धमकी, दबाव या उत्पीड़न का सामना करना पड़ा और इसी कारण उन्हें घर छोड़ना पड़ा,तो प्रशासन को इस आरोप की भी अलग से जांच करनी चाहिए, शिकायतकर्ता ने किन परिस्थितियों में घर छोड़ा, किससे खतरा होने की बात कही,क्या उन्होंने पुलिस या किसी अन्य अधिकारी से संपर्क किया और क्या इस संबंध में कोई लिखित शिकायत या गवाह उपलब्ध हैं—इन बिंदुओं का सत्यापन आवश्यक है, किसी नागरिक को शिकायत करने के कारण असुरक्षित महसूस करना पड़े, तो यह केवल ऋ ण खाते का मामला नहीं रह जाता, यह शिकायतकर्ता की सुरक्षा और निष्पक्ष सुनवाई का विषय भी बन जाता है,इसलिए प्रशासन को उनकी सुरक्षा संबंधी आशंका को गंभीरता से सुनना चाहिए और आवश्यक होने पर नियमानुसार कदम उठाने चाहिए।
जितवेश श्रीवास्तव पर आरोप,लेकिन जांच का दायरा पूरे रिकॉर्ड तक हो…
शिकायतकर्ता ने सोनपुर सहकारी समिति के पदस्थ कर्मचारी जितवेश श्रीवास्तव पर आरोप लगाए हैं,उन्होंने मामले की जांच और दोषी पाए जाने पर कार्रवाई की मांग की है, इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि अभी बाकी है,संबंधित कर्मचारी, समिति प्रबंधन और बैंक का आधिकारिक पक्ष भी सामने आना चाहिए,जांच केवल एक व्यक्ति के बयान तक सीमित नहीं रहनी चाहिए,ऋ ण आवेदन किसने तैयार किया,सत्यापन किसने किया,स्वीकृति किसने दी, रकम निकालने के दस्तावेज किसने प्रस्तुत किए,भुगतान किसे हुआ,बकाया नोटिस किस रिकॉर्ड पर जारी हुआ और बाद में जमा हुई रकम किसने जमा की—इन सभी बिंदुओं का रिकॉर्ड से मिलान होना चाहिए,किसी व्यक्ति की भूमिका केवल उसके पद के आधार पर तय नहीं की जा सकती,जिम्मेदारी दस्तावेजों,बैंक प्रविष्टियों, हस्ताक्षरों,संबंधित बयानों और लागू प्रक्रिया की जांच के बाद ही निर्धारित होनी चाहिए।
रकम जमा होना अंतिम जवाब नहीं-मूल प्रक्रिया की जांच जरूरी
इस प्रकरण में सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या ऋ ण खाते में रकम जमा हो जाने से मूल वित्तीय प्रक्रिया पर उठे सवाल समाप्त हो जाते हैं? यदि ऋण स्वीकृति वैध थी,तो उसके दस्तावेज सामने आने चाहिए। यदि रकम खाते से निकली थी,तो निकासी का आधार और वास्तविक लाभार्थी स्पष्ट होना चाहिए,यदि शिकायत वापसी का पत्र वास्तविक है,तो उसकी पुष्टि होनी चाहिए,और यदि शिकायतकर्ता के हस्ताक्षरों का कथित दुरुपयोग हुआ है, तो इसकी निष्पक्ष जांच आवश्यक है,व्यंग्यात्मक भाषा में कहें तो खाते में रकम वापस जमा कर देने से यह पता नहीं चल जाता कि रकम पहले निकली कैसे थी,लेकिन इस मामले में वास्तव में क्या हुआ,यह जांच से ही तय होगा, किसी को पहले से दोषी ठहराना उचित नहीं, मगर दस्तावेजों और शिकायतों से उठे सवालों को अनदेखा करना भी उचित नहीं है, ‘दैनिक घटती-घटना’ का सवाल है—मृत किसान के नाम पर ऋण स्वीकृति,खाते से निकासी,वसूली के नोटिस,दो बार रकम जमा होने और शिकायत वापसी के दस्तावेजों तक फैले इस पूरे घटनाक्रम की जांच होगी या केवल खाते में जमा अंतिम राशि देखकर मामला समाप्त मान लिया जाएगा? कलेक्टर और उप पंजीयक सहकारिता को मूल ऋ ण आवेदन,स्वीकृति आदेश,बैंक लेजर, निकासी वाउचर,दोनों जमा पर्चियां, शिकायत वापसी का पत्र और संबंधित शिकायतों का रिकॉर्ड मंगाकर जांच करनी चाहिए, यदि आरोप प्रमाणित होते हैं,तो नियमानुसार कार्रवाई हो,यदि नहीं, तो जांच रिपोर्ट में उसका दस्तावेजी आधार स्पष्ट किया जाए, फिलहाल शिकायतकर्ता के आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि और संबंधित कर्मचारी,समिति तथा बैंक का आधिकारिक पक्ष सामने आना बाकी है,इस मामले में अंतिम निष्कर्ष दस्तावेजों की जांच और संबंधित पक्षों को सुनने के बाद ही निकाला जाना चाहिए।
‘दैनिक घटती-घटना’ ने पहले उठाया मामला, अब नए आवेदन पर प्रशासन की परीक्षा
‘दैनिक घटती-घटना’ इस मामले को पहले भी प्रकाशित कर चुका है, अब 28 अक्टूबर के नए आवेदन में शिकायतकर्ता ने जमा वाउचर और शिकायत वापसी के पत्र पर कथित फर्जी हस्ताक्षर की आपत्ति उठाई है,इससे मामला फिर प्रशासन के सामने आ गया है,अब कलेक्टर और सहकारिता विभाग से अपेक्षा है कि वे यह स्पष्ट करें कि 2024 की शिकायत पर क्या कार्रवाई हुई,ऋ ण खाते की जांच किस स्तर पर की गई, 2026 के नोटिस में बकाया राशि कैसे तय हुई और शिकायत वापसी के पत्र की प्रामाणिकता की पुष्टि की गई या नहीं,साथ ही, शिकायतकर्ता के घर छोड़कर जाने संबंधी दावे की भी पुष्टि कराई जानी चाहिए,यदि उन्होंने दबाव या खतरे के कारण घर छोड़ा,तो उस पहलू को केवल वित्तीय जांच के पीछे छूटने नहीं देना चाहिए।
अब आठ सवाल,जिनका जवाब जरूरी है…
- हरिप्रसाद की मृत्यु 10 मई 2021 को हुई थी,तो जून 2021 में उनके नाम पर केसीसी ऋण स्वीकृत होने का आधार क्या था? 2. 25 मई और 23 अगस्त की निकासी सहित सभी लेनदेन का वास्तविक आधार क्या था? 3. ऋण की रकम किसने निकाली और वास्तविक लाभार्थी कौन था । 4. 2024 में 1.29 लाख किसने जमा किए और जमा पर्ची पर हस्ताक्षर किसके हैं। 5. 2026 में 69,175 किसने जमा किए और क्या शिकायतकर्ता की सहमति की पुष्टि की गई? 6. 21 अक्टूबर को शिकायत वापसी का पत्र किसने प्रस्तुत किया और क्या उस पर दर्ज हस्ताक्षर वास्तविक हैं? 7. शिकायतकर्ता को कथित रूप से परेशान किए जाने और घर छोड़कर जाने के दावे की जांच कौन करेगा? 8. क्या सहकारिता विभाग ऋण खाते की अंतिम राशि देखने के साथ-साथ पूरी स्वीकृति, निकासी, भुगतान और शिकायत वापसी की प्रक्रिया की भी जांच करेगा?
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