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बैकुण्ठपुर@ मंच पर कौन दिखा,आयोजन किसने संभाला? कोसम के चौथे संस्करण ने छेड़ी श्रेय की बहस

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  • कोसम में बदले आयोजन के चेहरे, लेकिन नहीं थमी सफलता की रफ्तार,योगेश गुप्ता और रुद्र मिश्रा की मेहनत चर्चा में…
  • कोसम में चेहरे बदले,सोशल मीडिया की तस्वीर भी बदली,मेहनत करने वालों की पहचान पर उठा सवाल…
  • मंच पर कौन दिखा,आयोजन किसने संभाला? कोसम के चौथे संस्करण ने छेड़ी श्रेय की बहस
  • पुराने चर्चित चेहरों के बिना भी सफल हुआ कोसम,योगेश गुप्ता और रुद्र मिश्रा की मेहनत चर्चा में…
  • तस्वीरों से परे आयोजन की कहानी, कोसम ने दिखाई अभिव्यक्ति के दूसरे सदस्यों की ताकत
  • चार साल में पहचान बना चुके कोरिया साहित्य महोत्सव के चतुर्थ संस्करण ने बदली तस्वीर
  • पहले सोशल मीडिया पर छाए रहते थे कुछ खास चेहरे,इस बार पर्दे के पीछे मेहनत करने वालों की भूमिका पर उठी चर्चा…


-रवि सिंह –
बैकुण्ठपुर,30 अक्टूबर 2026 (घटती-घटना)।
किसी भी बड़े आयोजन की सफलता केवल मंच की भव्यता,अतिथियों की मौजूदगी,दर्शकों की भीड़ या सोशल मीडिया पर वायरल होती तस्वीरों से तय नहीं होती,असली परीक्षा तब होती है,जब आयोजन से जुड़े चर्चित चेहरे सामने न हों और फिर भी पूरी व्यवस्था उसी उत्साह के साथ आगे बढ़े,कोरिया साहित्य महोत्सव यानी कोसम का चतुर्थ संस्करण इसी लिहाज से कई सवालों और चर्चाओं को जन्म देकर संपन्न हुआ, कई दिनों की तैयारी,व्यवस्थाओं की भागदौड़,साहित्यकारों और कलाकारों से समन्वय तथा दो दिनों तक चले कार्यक्रमों के बाद महोत्सव समाप्त हो गया,लेकिन इस बार आयोजन की सफलता के साथ उसके बदलते चेहरे और श्रेय की चर्चा भी जिले में होती रही,टीम अभिव्यक्ति द्वारा आयोजित कोसम के इस संस्करण में दो नाम विशेष रूप से चर्चा में रहे—योगेश गुप्ता और रुद्र मिश्रा।
आयोजन की तैयारियों और व्यवस्थाओं में इनकी सक्रिय भूमिका को लेकर लोगों के बीच चर्चा हुई,इस बार कुछ ऐसे चेहरे मंच और सोशल मीडिया पर पहले की तरह प्रमुखता से दिखाई नहीं दिए,जिन्हें पिछले वर्षों में कोसम की पहचान के साथ जोड़कर देखा जाता रहा था, इसके बावजूद आयोजन संपन्न हुआ,अतिथियों ने सहभागिता की, साहित्यकारों और कलाकारों ने प्रस्तुतियां दीं और कार्यक्रम को सराहना भी मिली,यहीं से इस संस्करण की सबसे बड़ी चर्चा शुरू होती है की क्या किसी आयोजन की सफलता कुछ चर्चित चेहरों पर निर्भर होती है,या फिर संस्था के दूसरे सदस्य भी जिम्मेदारी संभालकर उसे आगे बढ़ा सकते हैं? कोसम के चतुर्थ संस्करण ने कम से कम यह दिखाया कि आयोजन की निरंतरता के लिए सामूहिक प्रयास और जिम्मेदारी उठाने वाले सदस्यों की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण होती है।
चार साल पहले शुरू हुआ सफर, कुछ चेहरे बन गए थे पहचान…
कोरिया साहित्य महोत्सव की शुरुआत के साथ ही साहित्य,कविता,लोककला,संस्कृति और वैचारिक विमर्श को एक मंच पर लाने का प्रयास किया गया,समय के साथ इस आयोजन ने जिले में अपनी पहचान बनाई और हर नए संस्करण के साथ इसकी गतिविधियों का दायरा बढ़ता गया, पहले तीन वर्षों में कुछ चेहरे लगातार सक्रिय दिखाई दिए,मंचीय कार्यक्रमों, अतिथियों के साथ तस्वीरों और सोशल मीडिया पोस्ट के माध्यम से उनकी मौजूदगी आयोजन की सार्वजनिक पहचान का हिस्सा बनती गई, धीरे-धीरे लोगों के बीच ऐसी धारणा बनने लगी कि कोसम की सफलता में इन्हीं चेहरों की भूमिका सबसे प्रमुख है, किसी बड़े आयोजन में ऐसा होना असामान्य नहीं है, जो लोग लगातार सामने दिखाई देते हैं, उनकी पहचान बनती है और सार्वजनिक चर्चा में उनका योगदान अधिक नजर आने लगता है, लेकिन किसी आयोजन की पूरी कहानी केवल उन्हीं लोगों तक सीमित नहीं होती, जो मंच पर दिखाई देते हैं या जिनकी तस्वीरें सोशल मीडिया पर अधिक साझा होती हैं, किसी भी बड़े कार्यक्रम के पीछे कई दिनों की तैयारी, संपर्क, समन्वय, संसाधनों की व्यवस्था और लगातार काम करने वाली टीम होती है, इनमें से अनेक लोग ऐसे होते हैं, जिनका नाम सार्वजनिक चर्चा में कम आता है,लेकिन उनकी जिम्मेदारियों के बिना कार्यक्रम को व्यवस्थित ढंग से पूरा करना मुश्किल हो सकता है,कोसम का चतुर्थ संस्करण इसी अंतर को सामने लाने वाला रहा। इस बार कुछ पुराने चर्चित चेहरे पहले की तरह दिखाई नहीं दिए, लेकिन आयोजन की गतिविधियां नहीं रुकीं, कार्यक्रम अपनी निर्धारित रूपरेखा के अनुसार आगे बढ़ा और सफलतापूर्वक संपन्न हुआ।
सोशल मीडिया पर कौन दिखा और किसकी मेहनत पीछे रह गई?
इस बार आयोजन को लेकर एक महत्वपूर्ण चर्चा सोशल मीडिया पर दिखाई देने वाली तस्वीरों और वास्तविक आयोजन-प्रक्रिया के बीच के अंतर को लेकर भी रही,पिछले वर्षों में कुछ चेहरे कार्यक्रम से जुड़ी तस्वीरों और पोस्ट में लगातार नजर आते थे, अतिथियों के साथ उनकी तस्वीरें, मंचीय गतिविधियां और आयोजन से संबंधित पोस्ट सार्वजनिक चर्चा में प्रमुखता से दिखाई देती थीं,इससे लोगों के बीच यह छवि बनती थी कि कोसम की सफलता का बड़ा श्रेय उन्हीं चेहरों को जाता है, इसके विपरीत,इस बार आयोजन को सफल बनाने के लिए सक्रिय रूप से काम करने वाले सदस्यों की मेहनत के अनुरूप सोशल मीडिया पर उनकी उपस्थिति और चर्चा उतनी प्रमुखता से सामने नहीं आई,नतीजतन,कार्यक्रम देखने वालों के बीच यह सवाल भी उठा कि आखिर इस दो दिवसीय महोत्सव की तैयारी और व्यवस्थाओं को संभालने में किन लोगों की वास्तविक भूमिका रही,योगेश गुप्ता और रुद्र मिश्रा की सक्रियता को लेकर हुई चर्चा ने इस सवाल को और महत्वपूर्ण बना दिया,आयोजन की सफलता के पीछे मेहनत करने वालों को सार्वजनिक पहचान मिलना भी जरूरी है,क्योंकि किसी संस्था की मजबूती तभी बढ़ती है,जब उसके सदस्यों के योगदान को उचित स्थान मिले, हालांकि,सोशल मीडिया पर किसी व्यक्ति की तस्वीर कम दिखाई देने से उसके योगदान का पूरा आकलन नहीं किया जा सकता,इसी तरह, किसी की तस्वीर अधिक दिखाई देना अपने आप में यह प्रमाण नहीं है कि आयोजन की सारी जिम्मेदारी उसी ने निभाई,लेकिन जब सार्वजनिक छवि कुछ चेहरों के इर्द-गिर्द केंद्रित हो जाए और पर्दे के पीछे काम करने वाले सदस्य चर्चा से दूर रह जाएं, तो आयोजन की वास्तविक तस्वीर अधूरी रह जाती है,कोसम के इस संस्करण ने यही सवाल सामने रखा कि आयोजन का श्रेय तय करने में तस्वीरों और सार्वजनिक उपस्थिति की कितनी भूमिका होती है और वास्तविक मेहनत को पहचानने के लिए किस तरह की दृष्टि जरूरी है।
योगेश गुप्ता और रुद्र मिश्रा की भूमिका क्यों बनी चर्चा का विषय?
किसी साहित्यिक महोत्सव को सफल बनाना केवल मंच सजाने या कार्यक्रम की शुरुआत और समापन तक सीमित नहीं होता,कोसम जैसे आयोजन में साहित्यकारों,कवियों,कलाकारों, अतिथियों और स्थानीय प्रतिभाओं की भागीदारी सुनिश्चित करना, कार्यक्रमों के बीच समन्वय बनाना तथा अलग-अलग व्यवस्थाओं को संभालना पड़ता है,इस बार योगेश गुप्ता और रुद्र मिश्रा की सक्रिय भूमिका को लेकर चर्चा हुई, आयोजन की तैयारियों और कार्यक्रम को सफलतापूर्वक संपन्न कराने में उनकी मेहनत को महत्वपूर्ण माना गया,इससे अभिव्यक्ति के दूसरे सदस्यों की क्षमता भी चर्चा में आई,जो इस आयोजन को आगे बढ़ाने के लिए जिम्मेदारियां संभालते नजर आए,इस पहलू का महत्व इसलिए भी है कि किसी संस्था में कुछ लोगों का लगातार सक्रिय रहना स्वाभाविक रूप से उन्हें पहचान दिलाता है,लेकिन संस्था की दीर्घकालिक मजबूती इस बात से तय होती है कि कितने सदस्य जिम्मेदारी संभालने के लिए तैयार हैं,यदि आयोजन की पूरी व्यवस्था कुछ ही लोगों पर निर्भर रहे, तो भविष्य में उनके अनुपस्थित होने पर कठिनाई पैदा हो सकती है,इसके विपरीत, जब दूसरे सदस्य आगे आते हैं,तो संस्था के पास नेतृत्व और कार्यक्षमता के अधिक विकल्प उपलब्ध होते हैं,कोसम के चतुर्थ संस्करण ने इस संभावना को सामने रखा कि अभिव्यक्ति के भीतर जिम्मेदारियां संभालने की क्षमता केवल कुछ पुराने चर्चित चेहरों तक सीमित नहीं है,हालांकि,आयोजन की प्रत्येक जिम्मेदारी किसने संभाली, इसका पूरा विवरण सार्वजनिक रूप से सामने आना भी जरूरी है,ताकि सभी योगदानकर्ताओं की भूमिका स्पष्ट हो सके।
पुराने चर्चित चेहरे क्यों नहीं दिखे? सवाल कायम, कारण स्पष्ट नहीं
इस बार कुछ ऐसे चेहरे आयोजन में पहले की तरह प्रमुखता से दिखाई नहीं दिए,जिन्हें पिछले वर्षों में कोसम के साथ जोड़कर देखा जाता रहा था, उनकी अनुपस्थिति लोगों के बीच चर्चा का विषय बनी रही,कुछ लोगों के मन में सवाल उठे कि क्या उन्हें आमंत्रित नहीं किया गया था,क्या उन्होंने स्वयं आयोजन से दूरी बनाई या फिर इसके पीछे कोई अन्य कारण था? इन सवालों का स्पष्ट उत्तर फिलहाल उपलब्ध नहीं है,किसी व्यक्ति का कार्यक्रम में दिखाई नहीं देना अपने आप में उसके अलग होने या किसी विवाद का प्रमाण नहीं होता है, फिर भी,यह तथ्य चर्चा के योग्य है कि जिन चेहरों को पहले आयोजन की पहचान का हिस्सा माना जाता था,उनकी कम मौजूदगी के बावजूद कोसम का चौथा संस्करण संपन्न हुआ,इस घटनाक्रम ने आयोजन की सफलता और व्यक्तिगत पहचान के बीच संबंध पर विचार करने का अवसर दिया,यदि पुराने सहयोगियों का योगदान रहा है,तो उसका सम्मान अपनी जगह महत्वपूर्ण है, वहीं,नए या कम चर्चित सदस्यों की मेहनत को भी उचित पहचान मिलनी चाहिए,संस्था का विकास तभी संतुलित तरीके से हो सकता है,जब पुराने अनुभव और नए प्रयास एक-दूसरे के विरोध में खड़े होने के बजाय आयोजन को आगे बढ़ाने में सहयोग करें।
अभिव्यक्ति के सामने अब सामूहिक नेतृत्व को मजबूत करने का अवसर
चार संस्करण पूरे करना किसी भी सांस्कृतिक आयोजन के लिए एक महत्वपूर्ण पड़ाव है, लेकिन आयोजन की पहचान बनाए रखना और उसे लगातार बेहतर करना उससे भी बड़ी चुनौती है, कोसम के सामने अब यह अवसर है कि वह अपने अनुभवों से सीखकर ऐसी कार्यप्रणाली विकसित करे,जिसमें आयोजन की सफलता किसी एक या दो चेहरों पर निर्भर न रहे,इसके लिए जिम्मेदारियों का स्पष्ट बंटवारा,नए सदस्यों को अवसर,पुराने सहयोगियों के अनुभव का उपयोग और आयोजन के पीछे काम करने वाली पूरी टीम को उचित पहचान देना महत्वपूर्ण होगा, सोशल मीडिया पर भी केवल मंचीय तस्वीरों तक सीमित रहने के बजाय उन सदस्यों के काम को सामने लाया जा सकता है,जो व्यवस्थाओं को संभालने में सक्रिय भूमिका निभाते हैं,ऐसा करने से आयोजन के प्रति पारदर्शिता बढ़ेगी और संस्था के भीतर सामूहिक जिम्मेदारी की भावना मजबूत होगी,इससे उन लोगों को भी प्रोत्साहन मिलेगा,जो बिना अधिक प्रचार के काम करते हैं,किसी संस्था की पहचान तभी स्थायी होती है,जब वह व्यक्तिगत लोकप्रियता से आगे बढ़कर सामूहिक उपलब्धि को महत्व देती है,यह भी जरूरी है कि पुराने और नए सदस्यों के योगदान को आमने-सामने खड़ा करके न देखा जाए,पहले के संस्करणों में जिन लोगों ने मेहनत की,उनका योगदान महत्वपूर्ण हो सकता है,वहीं,इस बार जिम्मेदारियां संभालने वाले सदस्यों की भूमिका भी उतनी ही गंभीरता से सामने आनी चाहिए, संस्था के लिए सबसे उपयोगी रास्ता यही होगा कि अनुभव और नई ऊर्जा को साथ लेकर चला जाए।
अतिथियों की सहभागिता और कार्यक्रमों ने भी बढ़ाया आयोजन का महत्व
कोसम का चतुर्थ संस्करण केवल आयोजकों के बदलते समीकरणों के कारण ही चर्चा में नहीं रहा, बल्कि इसमें साहित्य,संस्कृति और वैचारिक विमर्श से जुड़े कई कार्यक्रम भी आयोजित हुए,पहले दिन छत्तीसगढ़ शासन के स्वास्थ्य मंत्री श्याम बिहारी जायसवाल ने महोत्सव का शुभारंभ किया और साहित्य की सामाजिक भूमिका पर विचार व्यक्त किए,उन्होंने साहित्य को समाज की दिशा निर्धारित करने वाला महत्वपूर्ण माध्यम बताया,दूसरे दिन छत्तीसगढ़ राजभाषा आयोग के अध्यक्ष प्रभात मिश्रा शामिल हुए,उन्होंने कोरिया की साहित्यिक विरासत का उल्लेख करते हुए कहा कि महोत्सव इस परंपरा को आगे बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है,विभिन्न क्षेत्रों से आए साहित्यकारों और कलाकारों ने काव्यपाठ,सांस्कृतिक प्रस्तुतियों और अन्य गतिविधियों में भाग लिया,आयोजकों के अनुसार,दो दिवसीय महोत्सव में कुल 147 कलाकारों एवं साहित्यकारों और 16 समाजसेवियों का सम्मान किया गया,दिल्ली से आए रचनाकार मुरारी मंडल सहित विभिन्न क्षेत्रों के कवियों की प्रस्तुतियों ने श्रोताओं को आकर्षित किया,संगीत,लोककला और परिचर्चाओं के माध्यम से कार्यक्रम में विविधता बनी रही,इन गतिविधियों ने यह भी दिखाया कि आयोजन की सफलता का मूल्यांकन केवल मंच पर कौन दिखाई दिया या सोशल मीडिया पर किसकी तस्वीर अधिक साझा हुई, इसके आधार पर नहीं किया जा सकता,कार्यक्रम की विषयवस्तु, प्रतिभागियों की सहभागिता,दर्शकों की रुचि और व्यवस्थाओं की गुणवत्ता भी उसके महत्व के प्रमुख आधार होते हैं।
चेहरों की चर्चा से आगे बढ़कर मेहनत को पहचानने की जरूरत
कोरिया साहित्य महोत्सव का चतुर्थ संस्करण संपन्न हो चुका है,आयोजन के दौरान और उसके बाद कुछ पुराने चर्चित चेहरों की अनुपस्थिति,सोशल मीडिया पर दिखाई देने वाली तस्वीरों और योगेश गुप्ता तथा रुद्र मिश्रा की सक्रिय भूमिका को लेकर चर्चाएं होती रहीं,इन चर्चाओं के बीच एक महत्वपूर्ण सवाल उभरकर आया—किसी आयोजन की सफलता का वास्तविक श्रेय किसे मिलना चाहिए? क्या उन लोगों को,जो मंच पर दिखाई देते हैं और जिनकी तस्वीरें सार्वजनिक चर्चा में रहती हैं? या उन सदस्यों को भी, जो कई दिनों तक तैयारी और व्यवस्थाओं में जुटे रहते हैं,लेकिन जिनकी मेहनत को उतनी सार्वजनिक पहचान नहीं मिलती? मंच पर मौजूदगी और पर्दे के पीछे की मेहनत,दोनों आयोजन का हिस्सा हैं,अंतर सिर्फ इतना है कि मंच पर दिखाई देने वाली गतिविधियां आसानी से नजर आ जाती हैं,जबकि व्यवस्थाओं के पीछे किया गया काम अक्सर चर्चा से बाहर रह जाता है,कोसम का चतुर्थ संस्करण इस मायने में याद रखा जा सकता है कि इसने अभिव्यक्ति के भीतर जिम्मेदारियां संभालने वाले दूसरे सदस्यों की भूमिका को चर्चा में लाया, आयोजन संपन्न हुआ,अतिथियों ने सराहना की और साहित्यकारों तथा कलाकारों को मंच मिला,इससे यह संदेश जरूर निकला कि संस्था की कार्यक्षमता किसी एक चेहरे तक सीमित नहीं होनी चाहिए, आखिरकार,किसी आयोजन की असली पहचान तस्वीरों में दिखाई देने वाले चेहरों से नहीं, बल्कि उन सभी लोगों की मेहनत से बनती है,जो उसे सफल बनाने में अपना समय,श्रम और जिम्मेदारी लगाते हैं,चेहरे बदल सकते हैं,श्रेय की चर्चा बदल सकती है,लेकिन संस्था की व्यवस्था तभी मजबूत होती है, जब सफलता का सम्मान सामूहिक रूप से किया जाए।


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