- दोहरे हत्याकांड में ऐतिहासिक फैसला : कुलदीप साहू, फूल सिंह उर्फ रिंकू और चंद्रकांत चौधरी को फांसी, आर्यन विश्वकर्मा उर्फ गोल्डी को उम्रकैद
- आनंद प्रकाश वारियाल की अदालत ने दोहरे हत्याकांड में सुनाई सजा
- जिस फैसले का दो साल से इंतजार था, अदालत की कलम चली तो तीन के लिए मौत की सजा और एक के लिए उम्रकैद लिखी गई—और फैसला लिखने के बाद पेन की निब भी टूट गई।
सूरजपुर 08 अक्टूबर 2026 (घटती-घटना)। करीब दो साल से जिस फैसले का इंतजार सूरजपुर कर रहा था, गुरुवार को वही फैसला सामने आया जिसकी उम्मीद शहर के एक बड़े वर्ग को थी, बहुचर्चित दोहरे हत्याकांड में मुख्य आरोपी कुलदीप साहू, फूल सिंह उर्फ रिंकू सिंह और चंद्रकांत चौधरी को फांसी की सजा, जबकि चौथे दोषी आर्यन विश्वकर्मा उर्फ गोल्डी को आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई, फैसला अपर जिला एवं सत्र न्यायाधीश आनंद प्रकाश वारियाल की अदालत ने सुनाया, यह फैसला केवल चार दोषियों की सजा तक सीमित नहीं रहा, बल्कि इसके साथ सूरजपुर जिला न्यायालय के इतिहास में भी एक नया अध्याय जुड़ गया, जिला न्यायालय बनने के बाद यहां पहली बार किसी मामले में मृत्युदंड सुनाए जाने का रिकॉर्ड दर्ज हुआ, इस तरह दोहरे हत्याकांड का यह फैसला सूरजपुर के न्यायिक इतिहास में लंबे समय तक याद रखा जाएगा, तीन को मृत्युदंड, एक को उम्रकैद—अदालत का फैसला आया तो वही हुआ जिसकी शहर को उम्मीद थी, पेन की निब तोड़ने वाले प्रसंग को ‘अदालती सूत्रों के अनुसार’ रखा गया है, इसे कानूनी अनिवार्यता के रूप में नहीं लिखा गया है।
न्यायालय की कलम से निकला फैसला, टूट गई पेन की निब- फैसले का सबसे चर्चित पहलू केवल तीन आरोपियों को मृत्युदंड सुनाया जाना नहीं रहा, अदालती सूत्रों के अनुसार, मृत्युदंड का फैसला सुनाने के बाद न्यायाधीश आनंद प्रकाश वारियाल ने उस पेन की निब तोड़ दी, जिससे फैसले पर हस्ताक्षर किए गए, मृत्युदंड सुनाने के बाद पेन की निब तोड़ने की परंपरा को न्यायिक जगत में एक प्रतीकात्मक परंपरा के तौर पर देखा जाता है, इसका आशय यह माना जाता है कि जिस कलम से किसी व्यक्ति के जीवन से जुड़ा इतना गंभीर फैसला लिखा गया, उसका सामान्य रूप से दोबारा इस्तेमाल न किया जाए, हालांकि पेन की निब तोड़ना किसी कानून अथवा न्यायिक प्रक्रिया की अनिवार्य शर्त नहीं है, बल्कि इसे एक प्रतीकात्मक परंपरा के रूप में देखा जाता है, सूरजपुर के इस मामले में इस प्रतीकात्मक क्षण ने फैसले की गंभीरता को और चर्चा में ला दिया, एक तरफ अदालत के आदेश में तीन आरोपियों के लिए मृत्युदंड लिखा जा रहा था, तो दूसरी तरफ अदालत कक्ष में मौजूद लोगों के सामने न्यायिक इतिहास का एक ऐसा क्षण दर्ज हो रहा था, जिसे सूरजपुर लंबे समय तक याद रखेगा।
फैसला वही आया जिसकी शहर को उम्मीद थी- दोषसिद्धि के बाद से ही सूरजपुर में यह चर्चा थी कि अदालत अपराध की गंभीरता को किस नजर से देखती है, शहर के एक वर्ग की ओर से लगातार कठोरतम सजा की मांग की जा रही थी, गुरुवार को जब अदालत ने तीन आरोपियों को मृत्युदंड और एक को आजीवन कारावास की सजा सुनाई तो न्यायालय परिसर के बाहर मौजूद लोगों के बीच भी फैसले को लेकर तीखी चर्चा रही, हालांकि न्यायालय का फैसला किसी जनभावना के आधार पर नहीं, बल्कि मामले में प्रस्तुत साक्ष्यों, गवाहियों, अभियोजन की पैरवी और कानून के प्रावधानों के आधार पर हुआ है, यही वजह है कि यह फैसला पुलिस की जांच और अभियोजन की पैरवी की भी बड़ी परीक्षा का परिणाम माना जा रहा है।
कोरिया के पुराने फैसले की भी आई याद- इस फैसले के साथ ही अविभाजित कोरिया जिले के जिला न्यायालय से जुड़े उस पुराने फैसले की भी चर्चा होने लगी, जिसमें कबाड़ी से जुड़े एक हत्या मामले में मृत्युदंड का फैसला सामने आया था, दोनों मामलों में परिस्थितियां और घटनाक्रम अलग हैं, दोनों को एक जैसा मानना उचित नहीं होगा, लेकिन एक समानता यह जरूर चर्चा में है कि दोनों गंभीर हत्याकांडों में कबाड़ के कारोबार से जुड़े लोगों की भूमिका के संदर्भ सामने आए और दोनों मामलों में न्यायालय से फांसी की सजा का फैसला निकला, यही समानता अब न्यायिक इतिहास के संदर्भ में भी चर्चा का विषय बन गई है।
जनता की उम्मीद, पुलिस की चुनौती और अदालत का फैसला- इस मामले में पुलिस विभाग के सामने सबसे बड़ी चुनौती आरोपियों को कानून के सामने दोषसिद्ध कराने की थी, शासन और पुलिस के वरिष्ठ अधिकारियों की निगरानी में जांच आगे बढ़ी, अभियोजन ने मामले को न्यायालय के सामने रखा और लंबी सुनवाई के बाद चार आरोपी दोषी करार दिए गए, अब सजा के रूप में तीन को मृत्युदंड और एक को आजीवन कारावास मिला है, इस फैसले के बाद एक बात साफ है कि घटना के बाद बने आरोप-प्रत्यारोप, पुलिस के खिलाफ उठे सवाल और आरोपियों के पक्ष में बनने वाले नैरेटिव से आगे अदालत ने मामले को उपलब्ध साक्ष्यों और कानूनी कसौटी पर परखा।
अब आगे की न्यायिक प्रक्रिया भी महत्वपूर्ण- तीन आरोपियों को फांसी की सजा सुनाए जाने के बाद अब इस मामले की अगली न्यायिक प्रक्रिया भी महत्वपूर्ण होगी, मृत्युदंड के मामलों में उच्च न्यायालय की पुष्टि आवश्यक होती है, इसके अलावा दोषी पक्ष को कानून के तहत उपलब्ध अपील के अधिकार भी रहते हैं, इसलिए आज का फैसला ऐतिहासिक जरूर है, लेकिन इसकी आगे की कानूनी यात्रा भी उतनी ही महत्वपूर्ण होगी, फिलहाल सूरजपुर के लिए गुरुवार का दिन उस मामले के नाम रहा, जिसने दो साल पहले पूरे जिले को झकझोर दिया था, अदालत ने अपना फैसला सुना दिया। तीन के लिए मौत की सजा और एक के लिए उम्रकैद। न्यायालय की कलम चली, पेन की निब टूटी और सूरजपुर के न्यायिक इतिहास में एक नया पन्ना जुड़ गया।
एक पेन, तीन मौत की सजा और न्यायिक इतिहास में दर्ज एक दिन-
यह फैसला इसलिए भी खास रहा क्योंकि एक ही मामले में तीन दोषियों को मृत्युदंड दिया गया, न्यायालय द्वारा मुख्य आरोपी कुलदीप साहू, फूल सिंह उर्फ रिंकू सिंह और चंद्रकांत चौधरी को फांसी की सजा सुनाई गई, जबकि आर्यन विश्वकर्मा उर्फ गोल्डी को आजीवन कारावास से दंडित किया गया, मृत्युदंड के मामले में आगे की न्यायिक प्रक्रिया भी महत्वपूर्ण होगी, सत्र न्यायालय द्वारा सुनाई गई फांसी की सजा पर कानून के अनुसार उच्च न्यायालय की पुष्टि आवश्यक होती है, इसलिए आज का फैसला महत्वपूर्ण पड़ाव है, लेकिन मृत्युदंड के अंतिम क्रियान्वयन से पहले न्यायिक प्रक्रिया के अगले चरण भी होंगे।
दो साल पुराने जख्म पर अदालत का फैसला-
13 अक्टूबर 2024 की वह रात सूरजपुर के लिए कभी न भूल पाने वाली घटना बन गई थी, प्रधान आरक्षक के परिवार की महिला और नाबालिग बेटी की हत्या ने पूरे जिले को झकझोर दिया था, घटना के बाद सूरजपुर में आक्रोश का माहौल बना और पुलिस-प्रशासन की कार्यप्रणाली से लेकर अपराधियों के प्रभाव तक कई सवाल उठे, मामले की जांच हुई, आरोपी गिरफ्तार हुए, साक्ष्य जुटाए गए, गवाह न्यायालय पहुंचे और करीब दो साल तक न्यायालयीन प्रक्रिया चली, इसके बाद पहले चार आरोपियों को दोषी करार दिया गया और अब अदालत ने सजा भी सुना दी, दोषसिद्धि के बाद अब सजा का फैसला भी सामने आ गया है।
फैसले की बड़ी बातें
– मुख्य आरोपी कुलदीप साहू-फांसी
– फूल सिंह उर्फ रिंकू सिंह-फांसी
– चंद्रकांत चौधरी-फांसी
– आर्यन विश्वकर्मा उर्फ गोल्डी-उम्रकैद
– फैसला-8 अक्टूबर 2026
– न्यायाधीश-आनंद प्रकाश वारियाल
– अदालत-फास्ट ट्रैक न्यायालय, सूरजपुर
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