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सूरजपुर@ कहानी चश्मदीद की नहीं,साक्ष्यों की थी,विमलेश दुबे ने कडि़यां जोड़ीं सुरेश शर्मा ने अदालत में उन्हें रखा और 283 पन्नों के फैसले ने तीन के लिए मृत्युदंड,एक के लिए उम्रकैद लिख दी…

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  • चश्मदीद नहीं था,फिर भी साक्ष्यों ने खोल दी पूरी कहानी विमलेश दुबे की विवेचना से तैयार हुई कडि़यां
  • सुरेश शर्मा की पैरवी में अदालत तक पहुंचा मजबूत पक्ष और 283 पेज के फैसले में निकला तीन को मृत्युदंड,आर्यन को उम्रकैद…
  • सूरजपुर दोहरे हत्याकांड में जांच से फैसला तक की पूरी कहानी…पुलिस के सामने थी सबसे बड़ी चुनौती,लेकिन विवेचना ने जोड़े घटनाक्रम के तार
  • जिस हत्याकांड से दहल उठा था सूरजपुर,उसमें तीन को फांसी दो साल बाद आया इंसाफ… तीन दोषियों को फांसी,चौथे को मृत्यु तक उम्रकैद फास्ट ट्रैक कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला,चौथे दोषी आर्यन उर्फ गोल्डी को मृत्यु पर्यंत कारावास
  • मां-बेटी हत्याकांड : अदालत ने सुनाई तीन को फांसी,एक को उम्रकैद की सजा
  • सूरजपुर हत्याकांड में अदालत का कड़ा फैसला,कुलदीप समेत तीन को फांसी


-ओंकार पाण्डेय-
सूरजपुर,08 अक्टूबर 2026 (घटती-घटना)।
सूरजपुर के बहुचर्चित दोहरे हत्याकांड में अदालत का फैसला अब केवल तीन आरोपियों को मृत्युदंड और एक को आजीवन कारावास दिए जाने तक सीमित नहीं है,इस फैसले के पीछे करीब दो साल चली वह पूरी प्रक्रिया भी है, जिसमें पुलिस की विवेचना,साक्ष्य संकलन, गवाहों के बयान और अभियोजन की न्यायालयीन पैरवी की लगातार परीक्षा हुई। इस मामले में प्रत्यक्ष चश्मदीद की चुनौती के बीच जांच को आगे बढ़ाना आसान नहीं था,लेकिन तत्कालीन कोतवाली थाना प्रभारी एवं विवेचना अधिकारी विमलेश दुबे के नेतृत्व में तैयार की गई विवेचना और शासन की ओर से नियुक्त विशेष लोक अभियोजक सुरेश प्रसाद शर्मा की पैरवी के बाद मामला उस मुकाम तक पहुंचा, जहां अदालत ने चार आरोपियों को दोषी ठहराते हुए तीन को मृत्युदंड और एक को आजीवन कारावास की सजा सुनाई,8 अक्टूबर 2026 को न्यायाधीश आनंद प्रकाश वारियाल की अदालत में सुनाए गए फैसले के उपलब्ध अंश में कुलदीप साहू,फूल सिंह उर्फ रिंकू सिंह और चंद्रकांत चौधरी के लिए मृत्युदंड तथा आर्यन विश्वकर्मा उर्फ गोल्डी के लिए आजीवन कारावास दर्ज है।
यह सिर्फ हत्या की जांच नहीं, विवेचना की भी अग्निपरीक्षा थी-13 अक्टूबर 2024 की रात हुई वारदात के बाद पुलिस के सामने कई सवाल थे,घटना की कडि़यां कैसे जोड़ी जाएं? आरोपियों तक कैसे पहुंचा जाए? किस साक्ष्य से किस आरोपी की भूमिका स्थापित होगी? और सबसे बड़ा सवाल—अदालत में वह सब किस तरह रखा जाए कि अभियोजन का मामला केवल आरोप बनकर न रह जाए, बल्कि न्यायिक कसौटी पर भी टिक सके? यहीं से विवेचना अधिकारी विमलेश दुबे की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है, जांच अधिकारी के सामने चुनौती केवल आरोपियों की गिरफ्तारी नहीं थी,जांच में जुटाए गए प्रत्येक साक्ष्य को केस की पूरी कहानी से जोड़ना था। घटनास्थल,आरोपियों की गतिविधियां,उनके बीच संबंध,घटना से पहले और बाद की परिस्थितियां तथा पुलिस के पास उपलब्ध अन्य सामग्री को विवेचना का हिस्सा बनाया गया, मामले की सुनवाई के दौरान अभियोजन ने इन्हीं साक्ष्यों और गवाहों के आधार पर अपना पक्ष रखा।
घटना से पहले पुलिस से टकराव की कड़ी-दोहरे हत्याकांड से पहले की घटनाएं भी इस पूरे मामले की पृष्ठभूमि में महत्वपूर्ण रहीं, पुलिस दस्तावेज में 13 अक्टूबर 2024 को आरक्षक घनश्याम सोनवानी के साथ हुए हमले का उल्लेख है। इसमें बताया गया है कि आरोपी कुलदीप साहू के खिलाफ जिला बदर और अन्य आपराधिक कार्रवाई की पृष्ठभूमि थी और घटना के दौरान पुलिसकर्मियों के साथ टकराव हुआ, इसके बाद प्रधान आरक्षक के परिवार से जुड़ी घटना सामने आई,बाद की न्यायिक प्रक्रिया में पुलिसकर्मियों को वाहन से कुचलने के प्रयास से जुड़े मामले में कुलदीप साहू को 10 वर्ष के सश्रम कारावास की सजा भी सुनाई गई। इस अलग मामले की सजा और दोहरे हत्याकांड की सजा को एक ही आदेश समझना उचित नहीं होगा,उपलब्ध रिपोर्टिंग में पुलिस पर फायरिंग से जुड़े अलग मामले में कुलदीप समेत कुछ आरोपियों को साक्ष्य के अभाव में दोषमुक्त किए जाने की भी जानकारी सामने आई है, यही अंतर इस पूरे मामले की न्यायिक प्रक्रिया को समझने के लिए बेहद महत्वपूर्ण है—जिस आरोप में साक्ष्य पर्याप्त नहीं पाए गए, उसमें दोषमुक्ति हुई,जबकि दोहरे हत्याकांड में अदालत ने चार आरोपियों को दोषी माना।
विमलेश दुबे की विवेचना से अभियोजन तक पहुंचा मामला-किसी भी आपराधिक मुकदमे में पुलिस की विवेचना और अभियोजन की पैरवी दो अलग-अलग चरण हैं,लेकिन दोनों की सफलता एक-दूसरे से जुड़ी होती है,विमलेश दुबे ने विवेचना अधिकारी के रूप में मामले की जांच को आगे बढ़ाया,जांच में प्राप्त सामग्री को केस डायरी और आरोप पत्र के माध्यम से न्यायालय तक पहुंचाया गया,इसके बाद सरकारी पक्ष को न्यायालय में उस सामग्री को स्थापित करना था, इसी उद्देश्य से मामले की गंभीरता को देखते हुए शासन की अनुमति के बाद सहायक संचालक अभियोजन सुरेश शर्मा को विशेष लोक अभियोजक नियुक्त किया गया था,इस नियुक्ति के पीछे भी मामला साधारण नहीं था,पुलिस प्रशासन ने मामले की गंभीरता को देखते हुए प्रभावी पैरवी के लिए विशेष लोक अभियोजक की नियुक्ति का प्रस्ताव शासन को भेजा था।
सुरेश शर्मा ने अदालत में रखी विवेचना की पूरी कड़ी-विवेचना में जुटाए गए साक्ष्य तभी मायने रखते हैं जब उन्हें न्यायालय के सामने विधि के अनुरूप साबित किया जा सके,यही जिम्मेदारी विशेष लोक अभियोजक सुरेश प्रसाद शर्मा की थी, अभियोजन ने पुलिस द्वारा तैयार किए गए केस को अदालत के सामने रखा। गवाहों के बयान,दस्तावेजी सामग्री और जांच के दौरान सामने आई परिस्थितियों के आधार पर सरकारी पक्ष ने आरोपियों की भूमिका स्थापित करने का प्रयास किया,अंततः अदालत ने चार आरोपियों को दोषी माना, यानी जांच से लेकर अभियोजन और फिर न्यायिक परीक्षण तक मामला कई स्तरों से गुजरने के बाद इस मुकाम पर पहुंचा।
29 सितंबर का फैसला और 8 अक्टूबर की सजा—दो अलग पड़ाव– इस मामले को समझने के लिए दो तारीखें बेहद महत्वपूर्ण हैं,पहला पड़ाव—दोषसिद्धि,चार आरोपियों को दोषी माना गया, दूसरा पड़ाव—सजा, 8 अक्टूबर को तीन आरोपियों को मृत्युदंड और एक आरोपी को आजीवन कारावास दिया गया,अदालत के उपलब्ध आदेश में आरोपीवार सजा का पूरा विवरण दर्ज है,कुलदीप साहू,फूल सिंह और चंद्रकांत चौधरी के लिए मृत्युदंड तथा आर्यन उर्फ गोल्डी के लिए आजीवन कारावास दर्ज है।
वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए सुनाया गया फैसला-सजा सुनाए जाने के दिन दोषियों को न्यायालय में प्रत्यक्ष रूप से लाने के बजाय वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से पेश किया गया,करीब दो वर्ष से चल रहे इस मामले की अंतिम सुनवाई का यह दृश्य भी अलग रहा,अदालत के सामने आरोपी मौजूद थे,लेकिन स्क्रीन के माध्यम से। उसी दौरान न्यायालय ने चारों दोषियों की सजा सुनाई, एक तरफ अदालत में न्यायिक प्रक्रिया अपने अंतिम चरण में थी, तो दूसरी तरफ बाहर लोग फैसले का इंतजार कर रहे थे।
फैसले के बाद लोगों में दिखा संतोष- फैसला आने के बाद लोगों में एक अलग तरह का संतोष देखने को मिला, जिस घटना ने दो साल पहले पूरे जिले को आंदोलित कर दिया था, उसके दोषियों के खिलाफ अदालत से कठोर सजा सामने आई, लोगों के बीच यह चर्चा रही कि आखिरकार न्यायिक प्रक्रिया अपने एक महत्वपूर्ण पड़ाव पर पहुंची है, यह संतोष केवल सजा की कठोरता को लेकर नहीं था, बल्कि इस बात को लेकर भी था कि मामला लंबी प्रक्रिया के बाद अदालत में अपने निष्कर्ष तक पहुंचा।वह पुरानी मुस्कान भी लोगों की चर्चा में लौट आई-इस मामले में पहले भी एक दृश्य ने काफी चर्चा बटोरी थी, पुलिसकर्मियों को वाहन से कुचलने के प्रयास वाले अलग मामले में कुलदीप साहू को 10 वर्ष की सजा सुनाए जाने के बाद वह अदालत से बाहर निकला था और उसके मुस्कुराने का वीडियो चर्चा में आया था, रिपोर्टिंग के अनुसार उसने कैमरों के सामने मुस्कुराते हुए पोज भी दिया था, उस समय इस व्यवहार को लेकर लोगों ने सवाल उठाए थे,अब जब उसी व्यापक घटनाक्रम के दोहरे हत्याकांड में तीन दोषियों को मृत्युदंड और एक को आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई,तो लोगों के बीच उस पुराने दृश्य की चर्चा फिर हुई,हालांकि किसी के चेहरे के भाव से उसके मन की स्थिति का निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा,लेकिन जनचर्चा में उस समय की मुस्कान और आज के फैसले को दो अलग तस्वीरों के रूप में जरूर देखा गया।
सूरजपुर में आक्रोश से अदालत तक पहुंची कहानी-घटना के बाद सूरजपुर में भारी आक्रोश सामने आया था, पुलिस प्रशासन पर भी सवाल उठे थे,आरोपी के खिलाफ कार्रवाई हुई,पुलिसकर्मियों से जुड़े अलग-अलग प्रकरणों में जांच आगे बढ़ी। कुलदीप को गिरफ्तार किया गया और मामले को फास्ट ट्रैक अदालत में चलाया गया,मामले की गंभीरता को देखते हुए विशेष लोक अभियोजक की नियुक्ति की गई,गवाहों के बयान दर्ज हुए,करीब दो साल तक सुनवाई चली,फिर 29 सितंबर को दोषसिद्धि और 8 अक्टूबर को सजा, यानी सड़क पर उठे आक्रोश से लेकर अदालत की चौखट तक यह मामला एक लंबी न्यायिक यात्रा से गुजरा।
फैसले का सबसे बड़ा संदेश…विवेचना की मजबूती


इस पूरे मामले की सबसे बड़ी कहानी शायद यही है कि गंभीर अपराध की जांच केवल आरोपी पकड़ने तक पूरी नहीं होती, विवेचना अधिकारी को घटनास्थल से लेकर अदालत तक साक्ष्य की पूरी कड़ी तैयार करनी होती है, अभियोजन को उसी कड़ी को न्यायालय के सामने स्थापित करना होता है,और अंत में अदालत को उस साक्ष्य की विश्वसनीयता और पर्याप्तता पर निर्णय करना होता है,सूरजपुर के इस मामले में यही तीनों चरण सामने आए, विमलेश दुबे की विवेचना से तैयार सामग्री,सुरेश शर्मा की न्यायालयीन पैरवी और न्यायाधीश आनंद प्रकाश वारियाल का विस्तृत फैसला—इन तीनों को जोड़कर देखें तो यह मामला पुलिस जांच से न्यायिक निर्णय तक पहुंची एक लंबी प्रक्रिया की कहानी बन जाता है।
अप्रैल 2026 से शुरू हुई गवाही, फिर लगातार चली सुनवाई…
मामले की सुनवाई फास्ट ट्रैक न्यायालय में हुई,उपलब्ध रिपोर्टिंग के अनुसार अप्रैल 2026 से गवाहों के बयान दर्ज होने शुरू हुए थे,लगातार सुनवाई के बाद 28 सितंबर को अदालत ने चार आरोपियों को दोषी ठहराया और दो आरोपियों को दोषमुक्त किया,इसके बाद अदालत ने सजा के बिंदु पर सुनवाई की और 8 अक्टूबर को अंतिम सजा सुनाई,इस तरह घटना के करीब दो साल बाद मामला उस निर्णायक स्थिति में पहुंचा,जहां अदालत ने दोषियों की सजा निर्धारित की।
283 पेज के फैसले में तय हुई सजा
इस मामले का फैसला करीब 283 पेज का बताया गया है, यह अपने आप में बताता है कि मामला केवल एक संक्षिप्त आदेश तक सीमित नहीं रहा,उपलब्ध फैसले के अंश में पृष्ठ 273 से 275 पर सजा संबंधी हिस्से में न्यायालय ने अलग-अलग आरोपियों के लिए अलग-अलग धाराओं के तहत सजा का विवरण दर्ज किया है,फैसले के अंतिम हिस्से में अदालत ने स्पष्ट किया कि कुलदीप साहू,फूल सिंह और चंद्रकांत चौधरी को दी गई मृत्युदंड की सजा हाईकोर्ट की पुष्टि के बिना लागू नहीं की जाएगी।


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