Breaking News

सोनपुर/भैयाथान@ त्यागपत्र भी दे दिया,कुर्सी भी छोड़ दी…बस कलम छोड़ना भूल गए!

Share

  • 16 सितंबर को त्यागपत्र…फिर भी सोनपुर में पत्राचार जारी-आखिर यह कैसा त्यागपत्र?
  • सोनपुर की कुर्सी गई,लेकिन कलम बची रही! त्यागपत्र के बाद भी पत्राचार पर सवाल
  • ‘पद से त्यागपत्र’ या ‘कुर्सी से आधी दूरी’? सोनपुर में सहकारिता का नया अध्याय
  • त्यागपत्र की चिट्ठी सामने आई,लेकिन सोनपुर की फाइलों से श्यामलाल की कलम नहीं हटी!
  • बैंक का काम ज्यादा बताया,सोनपुर का पद छोड़ा…फिर भी समिति में आदेश-पत्र क्यों?
  • त्यागपत्र दिया,जिम्मेदारी छोड़ी या सिर्फ कागज पर? ‘मैं काम करने में असमर्थ हूं’ से ‘पत्र जारी’ तक—श्यामलाल सिंह के त्यागपत्र पर सवाल…
  • त्यागपत्र के बाद भी कर्मचारियों को स्पष्टीकरण! सोनपुर में किस अधिकार से चल रही कलम?
  • सोनपुर में नई पंजी,कार्यवाहक सचिव और भुगतान के बाद अब त्यागपत्र—कहानी अभी बाकी!
  • प्राधिकृत अधिकारी ने छोड़ा पद,लेकिन सोनपुर की फाइलें नहीं छूटीं—किस आदेश पर जारी हुआ पत्राचार?
  • त्यागपत्र स्वीकार हुआ या नहीं? सोनपुर में श्यामलाल सिंह की प्रशासनिक भूमिका पर सबसे बड़ा सवाल
  • कागज पर त्यागपत्र,फाइल में फिर भी हस्तक्षेप? सोनपुर में सवालों की नई पारी
  • 16 सितंबर को प्राधिकृत अधिकारी पद से त्यागपत्र,30 सितंबर की आमसभा में कार्यवाही पंजी पर सवाल,बाद के पत्राचार ने खड़े किए नए प्रश्न


संवाददाता
सोनपुर/भैयाथान,04 अक्टूबर 2026 (घटती-घटना)।
सहकारिता की कहानी में जब लगा कि सोनपुर समिति का अध्याय अब शायद बंद होने वाला है,तभी एक नया पन्ना सामने आ गया—और इस बार पन्ना खुद त्यागपत्र का है,आदिम जाति सेवा सहकारी समिति मर्यादित सोनपुर,पंजीयन क्रमांक 580 के प्राधिकृत अधिकारी एवं जिला सहकारी केंद्रीय बैंक भैयाथान शाखा के शाखा प्रबंधक श्यामलाल सिंह ने 16 सितंबर 2026 को उप पंजीयक,सहकारी संस्थाएं के नाम प्राधिकृत अधिकारी पद से त्यागपत्र स्वीकार करने का अनुरोध किया। त्यागपत्र में उन्होंने स्पष्ट रूप से लिखा है कि उन्हें आदिम जाति सेवा सहकारी समिति मर्यादित सोनपुर का प्राधिकृत अधिकारी नियुक्त किया गया था, लेकिन बैंक शाखा के कार्य अधिक होने के कारण वे सोनपुर के प्राधिकृत अधिकारी का कार्य करने में असमर्थ हैं,इसी आधार पर उन्होंने पद से त्यागपत्र देने और उसे स्वीकार करने का अनुरोध किया है,अब यहां से कहानी में सबसे बड़ा सवाल पैदा होता है जब बैंक का काम इतना ज्यादा था कि सोनपुर का दायित्व निभाना संभव नहीं था,तो सोनपुर में पहले लिए गए फैसलों की जिम्मेदारी किसकी थी? और त्यागपत्र देने के बाद भी यदि उसी समिति से पत्राचार जारी रहा, तो अधिकार की स्थिति क्या थी? यही सवाल अब 30 सितंबर की वार्षिक साधारण आमसभा में किसानों द्वारा उठाए गए सवालों के साथ जुड़ गया है।
त्यागपत्र में वजह साफ…बैंक का काम ज्यादा,समिति का दायित्व निभाना मुश्किल-श्यामलाल सिंह के हस्ताक्षरयुक्त त्यागपत्र में तारीख 16.9.2026 अंकित है, पत्र उप पंजीयक महोदय को संबोधित है और विषय में ‘सोनपुर समिति से प्राधिकृत पद से त्याग पत्र स्वीकार करने बाबत’लिखा गया है, पत्र की भाषा में उन्होंने कहा है कि उन्हें सोनपुर समिति का प्राधिकृत अधिकारी नियुक्त किया गया था,लेकिन बैंक शाखा का कार्य अधिक होने के कारण सोनपुर का प्राधिकृत अधिकारी का कार्य करने में असमर्थ हैं,यानी खुद उनके त्यागपत्र का आधार यही है कि एक तरफ बैंक शाखा की जिम्मेदारी और दूसरी तरफ सोनपुर समिति की जिम्मेदारी—दोनों को साथ निभाना उनके लिए संभव नहीं था,अब व्यंग्य यहीं से शुरू होता है,अगर काम इतना ज्यादा था कि समिति का दायित्व निभाना मुश्किल था तो फिर सवाल यह है कि इस दौरान समिति में लिए गए महत्वपूर्ण निर्णयों की जिम्मेदारी किसकी थी? और यदि जिम्मेदारी निभाई जा रही थी तो त्यागपत्र में ‘असमर्थ’होने की वजह क्यों? सहकारिता की इस कहानी में अब शायद एक नया फार्मूला सामने आया है…बैंक का काम ज्यादा हो तो समिति छोड़ दीजिए,लेकिन समिति छोड़ने के बाद भी अगर कलम चलती रहे तो उसे किस श्रेणी में रखा जाए?
त्यागपत्र दिया है,लेकिन स्वीकार हुआ या नहीं…सबसे पहले यही स्पष्ट हो-यहां एक महत्वपूर्ण कानूनी-प्रशासनिक अंतर है, त्यागपत्र देना और त्यागपत्र स्वीकार होना एक ही बात नहीं है,उपलब्ध पत्र से इतना स्पष्ट है कि श्यामलाल सिंह ने 16 सितंबर को त्यागपत्र स्वीकार करने का अनुरोध किया है,लेकिन इस पत्र से अकेले यह साबित नहीं होता कि उप पंजीयक ने उसी दिन या बाद में उनका त्यागपत्र स्वीकार कर लिया था,यही अब विभाग के सामने सबसे पहला सवाल है क्या 16 सितंबर का त्यागपत्र स्वीकार किया गया? यदि स्वीकार किया गया तो किस तारीख से? यदि स्वीकार नहीं किया गया तो क्या श्यामलाल सिंह तब तक प्राधिकृत अधिकारी के अधिकारों का उपयोग करते रहे? यदि कोई अलग आदेश जारी हुआ तो वह क्या था? और यदि त्यागपत्र लंबित था तो उसके बाद जारी पत्र किस अधिकार के तहत जारी हुए? इसका जवाब केवल त्यागपत्र की स्वीकृति संबंधी कार्यालयीन आदेश से मिल सकता है।
त्यागपत्र के बाद भी पत्राचार—यही तो नई पहेली है- अब इस मामले का सबसे दिलचस्प हिस्सा यही है, एक तरफ 16 सितंबर का त्यागपत्र, दूसरी तरफ उसके बाद सोनपुर समिति से कर्मचारियों के संबंध में पत्राचार और कार्रवाई होने की जानकारी, यदि यह तथ्य दस्तावेजों से पुष्ट होता है तो सवाल गंभीर है, क्या श्यामलाल सिंह का त्यागपत्र स्वीकार नहीं हुआ था? या उन्हें किसी अन्य आदेश के तहत कार्य जारी रखने को कहा गया था? या फिर प्राधिकृत अधिकारी पद से त्यागपत्र देने के बावजूद कुछ प्रशासनिक कार्य उनके पास बने रहे? या फिर उनके द्वारा जारी पत्र किसी अन्य अधिकार के आधार पर जारी किए गए? इनमें से कौन-सी स्थिति सही है, इसका उत्तर विभाग को देना चाहिए, क्योंकि सहकारिता में पद की कुर्सी और पद की कलम दोनों की अपनी वैधानिक सीमा होती है।
30 सितंबर की आमसभा ने फिर खोल दी ‘पंजी’ की फाइल-अब आते हैं 30 सितंबर की उस वार्षिक साधारण आमसभा पर, जहां सोनपुर समिति के सदस्यों और किसानों ने कथित तौर पर ऐसे सवाल उठाए जिन्होंने पहले से चल रहे विवाद को फिर सामने ला दिया, बैठक में मांग की गई कि समिति की कार्यवाही पंजी उपलब्ध कराई जाए, सवाल यह था कि आखिर संस्था में बार-बार नई कार्यवाही पंजी क्यों संधारित की गई? किसके आदेश से? किस परिस्थिति में? क्या मूल कार्यवाही पंजी उपलब्ध थी? यदि उपलब्ध थी तो नई पंजी क्यों? और नई पंजी में लिए गए फैसलों का पुरानी कार्यवाही से क्या संबंध है? जब आमसभा में सदस्य ही संस्था की कार्यवाही का मूल रिकॉर्ड मांग रहे हों, तो इसे मामूली सवाल कहकर टाला नहीं जा सकता।
नई पंजी, एक दिन का कार्यवाहक सचिव और फिर कर्मचारी की वापसी- सोनपुर समिति से जुड़े पूर्व घटनाक्रम में आरोप है कि 7 अगस्त 2026 की बैठक में नई कार्यवाही पंजी संधारित की गई और एक दिन के लिए कार्यवाहक सचिव/प्रबंधक की व्यवस्था की गई,इसके बाद विवादित कर्मचारी विवेक कुमार चौरसिया को पुनः कार्य पर रखने का निर्णय लिए जाने की बात सामने आई,अब आमसभा में किसानों का सवाल यही बताया जा रहा है जिस कर्मचारी की नियुक्ति पर पहले से सवाल थे, उसे वापस रखने से पहले उसकी मूल नियुक्ति फाइल देखी गई थी या नहीं? क्या नियुक्ति आदेश था? क्या पद स्वीकृत था? क्या विज्ञापन हुआ था? क्या चयन प्रक्रिया हुई थी? क्या बोर्ड की अनुमति थी? क्या सेवा समाप्ति के कारणों की समीक्षा की गई? क्या पुनर्नियुक्ति से पहले सक्षम अधिकारी की अनुमति ली गई? यदि इन सभी प्रश्नों के दस्तावेज उपलब्ध हैं तो उन्हें आमसभा में रखने में समस्या नहीं होनी चाहिए।
फिर 5 सितंबर—नई पंजी और भुगतान का दूसरा अध्याय- मामला यहीं नहीं रुका,आरोप है कि 5 सितंबर 2026 को फिर नई कार्यवाही पंजी संधारित की गई और कर्मचारियों के भुगतान से संबंधित निर्णय लिए गए, कहा जा रहा है कि कर्मचारियों को पूर्व की अवधि के लंबित वेतन के नाम पर समिति के बचत खाते से लाखों रुपये का भुगतान किया गया, अब यहां सबसे महत्वपूर्ण सवाल 7 अगस्त की कथित कार्यवाही से जुड़ता है, बताया गया है कि 7 अगस्त की बैठक में विवेक चौरसिया की पृथक अवधि के वेतन भुगतान के लिए उप पंजीयक सहकारी संस्थाएं सूरजपुर से अनुमति प्राप्त करने के बाद भुगतान किए जाने की बात कही गई थी, तो सवाल है—क्या अनुमति ली गई? अगर ली गई तो आदेश कहां है? कितनी राशि की अनुमति मिली? क्या उसी अनुमति के आधार पर भुगतान हुआ? यदि अनुमति नहीं ली गई तो 5 सितंबर का भुगतान किस आधार पर हुआ?
बर्खास्तगी या अनुपस्थिति अवधि का वेतन—किस नियम से?-आमसभा में उठे सवालों का एक महत्वपूर्ण हिस्सा कर्मचारियों को किए गए भुगतान से जुड़ा बताया जा रहा है, यदि कोई कर्मचारी बर्खास्त था, सेवा से पृथक था या लंबे समय तक संस्था के कार्य से अनुपस्थित था तो उसकी उस अवधि की वेतन देयता किस आधार पर तय हुई? क्या उपस्थिति रजिस्टर देखा गया? क्या सेवा पुस्तिका देखी गई? क्या अनुपस्थिति स्वीकृत थी? क्या कोई न्यायालय अथवा सक्षम अधिकारी का आदेश था? क्या वेतन भुगतान की गणना की गई? क्या उच्च कार्यालय की अनुमति ली गई? अगर सब कुछ नियम के तहत था तो पूरा दस्तावेजी रिकॉर्ड सामने आना चाहिए।
आमसभा में किसानों का सवाल— ‘हमें पंजी दिखाइए’-30 सितंबर की आमसभा में कथित तौर पर यही सवाल सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण रहा कि संस्था की मूल कार्यवाही पंजी सदस्यों को उपलब्ध कराई जाए, सदस्यों ने यह भी पूछा कि आखिर बार-बार नई पंजी क्यों तैयार की गई और उन्हीं पंजी में ऐसे फैसले क्यों दर्ज हुए जिनका सीधा असर कर्मचारी नियुक्ति और समिति के वित्तीय भुगतान पर पड़ा,बताया गया है कि पर्याप्त जानकारी उपलब्ध नहीं होने के कारण उपस्थित सदस्यों ने बैठक का विरोध किया और आमसभा की कार्यवाही स्थगित कर दी,यदि यह स्थिति आधिकारिक कार्यवाही में दर्ज है तो यह अपने आप में महत्वपूर्ण दस्तावेज बन जाता है, क्योंकि आमसभा वह मंच है जहां सदस्य संस्था के कामकाज पर सवाल उठा सकते हैं।
सोनपुर में अब सवाल यह नहीं कि पंजी कितनी हैं, सवाल है—मूल पंजी कौन-सी है?- एक संस्था में कार्यवाही पंजी का उद्देश्य ही निर्णयों का क्रमबद्ध रिकॉर्ड रखना है, लेकिन यदि किसी संस्था में अलग-अलग महत्वपूर्ण बैठकों के लिए नई पंजी सामने आती रहे तो सवाल उठना स्वाभाविक है,मूल पंजी कौन-सी है? नई पंजी कब खोली गई? किसने प्रमाणित की? उसका क्रमांक क्या है? पुरानी पंजी में अंतिम कार्यवाही क्या दर्ज है? नई पंजी में पहली कार्यवाही क्या है? और दोनों के बीच रिकॉर्ड का क्रम कैसे जुड़ता है? इन सवालों का जवाब मिलने के बाद ही पता चलेगा कि नई पंजी बनाना सामान्य प्रक्रिया थी या कोई विशेष परिस्थिति।
श्यामलाल सिंह का त्यागपत्र—क्या विवादों के बीच आया प्रशासनिक मोड़?- अब श्यामलाल सिंह के त्यागपत्र को भी इसी पूरे घटनाक्रम के बीच देखा जा रहा है,लेकिन यहां सावधानी जरूरी है, त्यागपत्र पत्र में उन्होंने खुद बैंक शाखा के कार्य अधिक होने को कारण बताया है,पत्र में यह नहीं लिखा है कि उन्होंने किसी दबाव, शिकायत, विवाद या समाचार प्रकाशन के कारण त्यागपत्र दिया, इसलिए यह कहना कि उन्होंने किसी दबाव में त्यागपत्र दिया, बिना अतिरिक्त प्रमाण के उचित नहीं होगा, हां, यह जरूर पूछा जा सकता है कि त्यागपत्र देने का समय क्या था? क्या उस समय उनके खिलाफ कोई शिकायत लंबित थी? क्या किसी मामले में उनसे जवाब मांगा गया था? क्या कोई जांच चल रही थी? और सबसे महत्वपूर्ण— त्यागपत्र स्वीकार होने के बाद उनकी प्रशासनिक भूमिका क्या रही?
और अब एक बड़ा सवाल—त्यागपत्र के बाद भी ‘सोनपुर’ क्यों नहीं छूटा?- यही सवाल पूरे प्रकरण का सबसे व्यंग्यात्मक हिस्सा है की श्यामलाल सिंह कहते हैं बैंक शाखा का काम अधिक है, इसलिए सोनपुर का प्राधिकृत अधिकारी का कार्य करने में असमर्थ हूं, ठीक है, लेकिन यदि उसके बाद भी सोनपुर से जुड़े कर्मचारियों को पत्र जारी हो रहे हैं, कार्रवाई हो रही है और भुगतान संबंधी प्रक्रिया में उनका नाम सामने आ रहा है,तो फिर सवाल होगा की बैंक का काम ज्यादा था या सोनपुर की फाइल का आकर्षण ज्यादा? बेशक यह केवल व्यंग्यात्मक सवाल है पर वास्तविक स्थिति दस्तावेजों से ही तय होगी,लेकिन आमसभा में किसानों के सवालों और त्यागपत्र के पत्र को साथ रखकर देखें तो यह सवाल अपने आप पैदा होता है कि जिम्मेदारी छोड़ने की कोशिश और उसके बाद की प्रशासनिक भूमिका में आखिर संबंध क्या था?
शिवप्रसादनगर से सोनपुर तक—अब वित्तीय रिकॉर्ड भी जांच की मांग कर रहे हैं-दूसरी तरफ शिवप्रसादनगर समिति के बचत खाते से बड़े भुगतान को लेकर भी लगातार सवाल उठते रहे हैं,आरोप है कि समिति के खाते से बड़ी राशि निकाली गई और खर्चों को लेकर पारदर्शिता नहीं रही,इन आरोपों को तथ्य मानने से पहले बैंक स्टेटमेंट,बिल,वाउचर,भुगतान प्रस्ताव और वास्तविक खर्च का मिलान जरूरी है, इसी तरह आमसभा में यह सवाल भी उठाया जाना चाहिए कि क्या बचत खाते से हुए बड़े भुगतानों का विवरण सदस्यों को दिया गया? क्या हमाल भुगतान की जानकारी दी गई? क्या किसानों द्वारा कथित रूप से किए गए भुगतान और समिति द्वारा किए गए भुगतान का मिलान कराया गया? क्या सदस्यों को आय-व्यय का विवरण उपलब्ध कराया गया? यदि आमसभा में यह सब प्रस्तुत हुआ था तो रिकॉर्ड सामने आए, यदि नहीं हुआ तो क्यों नहीं हुआ?
अब विभाग के सामने एक नहीं,पूरी प्रश्नावली है- सोनपुर मामले में अब सवालों की सूची लंबी हो चुकी है, श्यामलाल सिंह ने त्यागपत्र कब दिया? क्या त्यागपत्र स्वीकार हुआ? यदि स्वीकार हुआ तो किस तारीख से? उसके बाद उन्होंने कौन-कौन से पत्र जारी किए? क्या वे पत्र प्राधिकृत अधिकारी के अधिकार से जारी हुए? 7 अगस्त की नई कार्यवाही पंजी किस आदेश से बनी? एक दिन का कार्यवाहक सचिव किस आदेश से नियुक्त हुआ? विवेक चौरसिया को पुनः कार्य पर रखने से पहले मूल नियुक्ति दस्तावेजों की जांच हुई या नहीं? 5 सितंबर की नई कार्यवाही पंजी क्यों बनी? कर्मचारियों को किस आधार पर भुगतान किया गया? क्या उच्च कार्यालय की अनुमति ली गई? 30 सितंबर की आमसभा में मूल पंजी क्यों उपलब्ध नहीं कराई गई? बैठक स्थगित होने की वास्तविक वजह क्या थी? इन सभी सवालों का उत्तर एक ही जगह से आ सकता है—मूल दस्तावेजों से।
सोनपुर में अब ‘त्यागपत्र’ से ज्यादा जरूरी है अधिकार की स्थिति स्पष्ट करना-श्यामलाल सिंह का त्यागपत्र अपने आप में कोई अपराध या अनियमितता का प्रमाण नहीं है, बैंक शाखा के अधिक कार्यभार के कारण किसी अतिरिक्त दायित्व से मुक्त होने का अनुरोध करना प्रशासनिक रूप से संभव है, लेकिन जब उसी समिति में उनके कार्यकाल के दौरान कई विवादित फैसलों पर सवाल उठ चुके हों और त्यागपत्र के बाद भी पत्राचार की बात सामने आए, तो प्रशासनिक पारदर्शिता के लिए उनकी अधिकारिक स्थिति स्पष्ट करना जरूरी हो जाता है।
आमसभा स्थगित हुई है,सवाल नहीं…
30 सितंबर की आमसभा भले ही स्थगित हुई हो, लेकिन उसने सोनपुर समिति की सबसे महत्वपूर्ण फाइल फिर खोल दी है,किसान अब सिर्फ यह नहीं पूछ रहे कि कर्मचारी कौन है, वे पूछ रहे हैं—पंजी कौन-सी है? निर्णय किसके हैं? कार्यवाहक सचिव किस आदेश से आया? कर्मचारी किस प्रक्रिया से वापस आया? वेतन किस आधार पर मिला? त्यागपत्र के बाद कलम किस अधिकार से चली? और सबसे महत्वपूर्ण— ‘अगर प्राधिकृत अधिकारी ने 16 सितंबर को कह दिया कि बैंक का काम अधिक होने के कारण सोनपुर का दायित्व निभाना संभव नहीं है, तो 30 सितंबर तक सोनपुर की फाइलों में उनकी भूमिका आखिर किस रूप में बची रही? अब सहकारिता विभाग के पास दो ही रास्ते हैं—या तो पूरी फाइल खोलकर हर सवाल का दस्तावेजी जवाब दे, या फिर सवालों को और बड़ा होने दे, क्योंकि सोनपुर की आमसभा ने बैठक भले स्थगित की है, लेकिन ‘नई पंजी, नया सचिव, नया भुगतान और अब त्यागपत्र’ वाला अध्याय अभी खत्म नहीं हुआ है।
किसके दबाव में?…अब यह सवाल दस्तावेजों से पूछना होगा…
सोनपुर समिति के घटनाक्रम में यह चर्चा भी सामने आती रही है कि श्यामलाल सिंह पर किसी वरिष्ठ व्यक्ति का दबाव था और उनसे नियम विरुद्ध काम करवाया जा रहा है? इसलिए जांच का रास्ता सीधा है,फाइल नोटिंग देखिए,आदेश देखिए,पत्राचार देखिए,व्हाट्सएप निर्देश हैं तो उनका परीक्षण कीजिए,किसने बैठक कराने कहा? किसने कर्मचारी को वापस रखने कहा? किसने भुगतान की अनुमति दी? किसने पत्र जारी करने कहा? फाइल में यदि कोई दबाव है तो वह दिखाई देगा,यदि नहीं है तो यह आरोप भी वहीं खत्म हो जाएगा।


Share

Check Also

अंबिकापुर@ पुलिसकर्मियों और परिजनों के लिए निःशुल्क स्वास्थ्य शिविर हुआ आयोजित

Share करीब 200 पुलिस अधिकारी-कर्मचारियों व आश्रितों ने विशेषज्ञ चिकित्सकों से कराया स्वास्थ्य परीक्षण अंबिकापुर, …

Leave a Reply