


- 8 अक्टूबर को खुलेगा सजा का पन्ना…सूरजपुर डबल मर्डर में चार दोषी,शहर की निगाहें अदालत पर…
- सूरजपुर डबल मर्डर : चार दोषी करार, अब 8 अक्टूबर को सजा का फैसला…
- दो साल बाद आएगा फैसला, अब 8 अक्टूबर को सजा का इंतजार
- मां-बेटी हत्याकांड में मामले चार दोषी करार,अब सजा पर सबकी नजर
- दो साल पुराना जख्म फिर कुरेदेगा 8 अक्टूबर का फैसला
- मां-बेटी हत्याकांड में चार दोषी,अब सजा कितनी?
- अदालत ने दोषी माना,अब 8 अक्टूबर को सजा का ऐलान
- सूरजपुर के बहुचर्चित डबल मर्डर में चार दोषी,सजा का काउंटडाउन शुरू
-संवाददाता-
सूरजपुर,04 अक्टूबर 2026 (घटती-घटना)। दो साल पहले 13 अक्टूबर 2024 की वह रात सूरजपुर के लिए सिर्फ एक आपराधिक घटना नहीं थी,बल्कि ऐसी भयावह घटना थी जिसने पूरे शहर को भीतर तक हिला दिया था,एक पुलिसकर्मी के घर में घुसकर उसकी पत्नी और नाबालिग बेटी की हत्या ने लोगों को झकझोर दिया था,घटना के बाद जिस तरह आक्रोश सड़कों पर उतरा, जिस तरह पुलिस और प्रशासन पर सवाल उठे और जिस तरह इस मामले की जांच से लेकर न्यायालयीन सुनवाई तक पूरे जिले की नजर बनी रही,उसने इसे सूरजपुर के सबसे चर्चित आपराधिक मामलों में शामिल कर दिया। अब उस मामले में 8 अक्टूबर 2026 की तारीख सामने है,चार आरोपी न्यायालय से दोषी करार दिए जा चुके हैं और अब सजा का ऐलान होना बाकी है,जैसे-जैसे 8 अक्टूबर करीब आ रहा है,सूरजपुर में एक ही सवाल चर्चा का विषय बनता जा रहा है,आखिर अदालत दोषियों को क्या सजा सुनाएगी? शहर के एक वर्ग की स्पष्ट मांग है कि जिस तरह की वारदात हुई,उसमें फांसी से कम कोई सजा नहीं होनी चाहिए,वहीं न्यायालय के सामने सवाल जनभावना का नहीं, बल्कि कानून, साक्ष्य,अपराध की परिस्थितियों और लागू कानूनी प्रावधानों का है, इसलिए 8 अक्टूबर को अदालत का आदेश ही यह तय करेगा कि इस मामले में दोषियों के लिए सजा की अंतिम तस्वीर क्या होगी।
पुलिस कार्रवाई के बाद बढ़ाटकराव, हमले की साजिश के पीछे पुरानी कार्रवाइ थी मुख्य वजह?
घटना के बाद कुलदीप से जुड़े लोगों की ओर से पुलिस पर कई तरह के आरोप लगाए गए और एक ऐसा माहौल बनाने का प्रयास हुआ,जिसमें पुलिस की कार्रवाई को ही सवालों के घेरे में रखा गया,लेकिन इस पूरे घटनाक्रम के दूसरे पक्ष में कुलदीप और उसके परिवार से जुड़े लोगों के खिलाफ पुलिस की पूर्व की कार्रवाइयों का सिलसिला भी महत्वपूर्ण रहा,कुलदीप का जिला बदर,उसके चाचा का जिला बदर और दोनों के खिलाफ जिला बदर आदेश के उल्लंघन पर एफआईआर कर जेल भेजे जाने की कार्रवाई, इसके बाद कुलदीप के पिता अशोक साहू का जिला बदर तथा उसके भाई संदीप साहू के खिलाफ एफआईआर और तत्काल गिरफ्तारी—ये वे घटनाक्रम थे,जिनके बीच पुलिस और कुलदीप पक्ष के बीच टकराव बढ़ता गया,इसी क्रम में पूर्व में चोरी के मामले में प्रधान आरक्षक द्वारा कुलदीप के पिता अशोक साहू के खिलाफ की गई कार्रवाई का भी उल्लेख सामने आता है,पुलिस की इन लगातार कार्रवाइयों के चलते कुलदीप और उससे जुड़े लोगों की कथित अवैध गतिविधियों पर शिकंजा कसने की स्थिति बनी,इसी पृष्ठभूमि में पुलिस पर हमले की योजना बनाए जाने की बात सामने आई,कुलदीप के साथ देने वाले चंद्रकांत चौधरी के संबंध में भी यह तथ्य सामने आया कि घटना से कुछ दिन पहले उसे सूरजपुर पुलिस द्वारा नाबालिग के शोषण से जुड़े मामले में जेल भेजा गया था,घटना के बाद इन घटनाक्रमों को सामने रखने के बजाय पुलिस के खिलाफ एकतरफा माहौल बनाने और आरोपियों के पक्ष में महिमामंडन किए जाने के आरोप लगे, हालांकि,कुलदीप या उसके परिवार की ओर से लगाए गए पुलिस संबंधी आरोपों की पुष्टि इस सामग्री में स्वतंत्र रूप से स्थापित नहीं होती,ऐसे में न्यायालय द्वारा चार आरोपियों को दोषसिद्ध किए जाने का फैसला इस पूरे घटनाक्रम के न्यायिक परीक्षण का महत्वपूर्ण परिणाम है,दोषसिद्धि के फैसले के बाद पुलिस कार्रवाई को लेकर घटना के बाद बनाए गए नैरेटिव और न्यायालय के समक्ष परीक्षण किए गए साक्ष्यों के बीच अंतर पर भी चर्चा शुरू हुई है।
दो साल बाद भी वह रात लोगों के जेहन में जिंदा-13 अक्टूबर 2024 की रात को याद करना आज भी सूरजपुर के लोगों के लिए आसान नहीं है,प्रधान आरक्षक के घर में घुसकर उसकी पत्नी और नाबालिग बेटी की हत्या कर दी गई थी,घटना के बाद दोनों शवों को घर से दूर ले जाकर वीराने में फेंके जाने की जानकारी सामने आई थी,वारदात की भयावहता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि घटना के बाद पूरा शहर आक्रोशित हो उठा था,पुलिस परिवार को निशाना बनाए जाने ने लोगों को और अधिक विचलित किया,महिलाओं के बीच इस घटना को लेकर भय का असर लंबे समय तक रहा,लोगों के लिए यह सवाल भी महत्वपूर्ण था कि यदि पुलिस परिवार का घर सुरक्षित नहीं है तो आम नागरिक अपनी सुरक्षा को लेकर कितना निश्चिंत रह सकता है? यही कारण है कि दो साल गुजर जाने के बाद भी इस मामले की चर्चा होते ही उस रात की घटनाएं लोगों के सामने फिर जीवित हो उठती हैं।
घटना से पहले शुरू हुआ घटनाक्रम धीरे-धीरे खूनी वारदात तक पहुंचा-आपके द्वारा उपलब्ध कराई गई पूर्व सामग्री के अनुसार,घटना से पहले जगराता कार्यक्रम को लेकर विवाद हुआ था,इसके बाद मुख्य आरोपी कुलदीप साहू के भाई को पुलिस द्वारा उठाए जाने की बात सामने आई थी,इसके बाद कथित रंजिश बढ़ती गई,13 अक्टूबर की शाम घटनाक्रम ने गंभीर रूप ले लिया। पहले एक आरक्षक पर खौलता तेल फेंके जाने की घटना सामने आई,इसके बाद पुलिस टीम को वाहन से कुचलने का प्रयास किया गया और आरोपी के तलवार लेकर भागने की बात सामने आई,और फिर उसी रात वह घटना हुई जिसने पूरे सूरजपुर को हिला दिया, एक पुलिसकर्मी के परिवार की दो सदस्यों की हत्या,यह घटनाक्रम बताता है कि मामला अचानक हुई एक सामान्य आपराधिक घटना नहीं था, बल्कि उस रात कई घटनाएं एक के बाद एक सामने आईं और अंततः दोहरी हत्या पर जाकर ठहरीं।
वारदात के बाद सड़कों पर उतर आया था आक्रोश
घटना के बाद सूरजपुर में जिस तरह का आक्रोश दिखाई दिया,वह भी इस मामले का महत्वपूर्ण अध्याय है, लोग सड़कों पर आए,विरोध हुआ, चक्काजाम हुआ,आरोपियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की मांग उठी,स्थिति ऐसी बनी कि प्रशासन को कानून-व्यवस्था संभालने के लिए अतिरिक्त प्रयास करने पड़े, घटना के बाद पुलिस प्रशासन में भी बदलाव हुआ और तत्कालीन पुलिस अधीक्षक को हटाए जाने की कार्रवाई हुई,उस समय लोगों के सामने सबसे बड़ा सवाल यही था कि क्या इस घटना के दोषियों को कानून के तहत ऐसी सजा मिलेगी,जो पीडि़त परिवार को न्याय का अहसास करा सके? दो साल बाद वही सवाल फिर सामने है—लेकिन अब पुलिस कार्रवाई की जगह न्यायालय के फैसले की प्रतीक्षा है।
अब दोषी तय, सिर्फ सजा का इंतजार- इस मामले की सबसे महत्वपूर्ण कानूनी स्थिति यह है कि न्यायालय चार आरोपियों को दोषी करार दे चुका है, मुख्य आरोपी कुलदीप साहू के साथ फूल सिंह उर्फ रिंकू सिंह, चंद्रकांत चौधरी और आर्यन विश्वकर्मा उर्फ गोल्डी को दोहरे हत्याकांड में दोषी माना गया है, अब न्यायालय को इन दोषियों की सजा तय करनी है, यानी 8 अक्टूबर की सुनवाई में मूल सवाल यह नहीं होगा कि मामले में दोष सिद्ध हुआ या नहीं—दोषसिद्धि हो चुकी है, अब सवाल सजा की मात्रा और स्वरूप का है, इसीलिए 8 अक्टूबर की तारीख इस पूरे मामले में सबसे महत्वपूर्ण तारीख बन गई है।
दोषी करार होने के बाद आरोपी की मुस्कान ने बदल दिया बहस का स्वर-इस मामले में अब एक और दृश्य लोगों के बीच चर्चा का विषय है, दोषी करार दिए जाने के बाद मुख्य आरोपी का एक वीडियो सामने आया, वीडियो में वह पुलिस सुरक्षा के बीच न्यायालय से बाहर निकलता दिखाई देता है और उसके चेहरे पर मुस्कान नजर आती है, गले में मफलर/गमछा भी दिखाई देता है, कुछ ही सेकंड के इस वीडियो ने दो साल पुराने मामले को एक बार फिर लोगों की चर्चा में ला दिया, सवाल उठने लगा की जिस मामले में दो लोगों की जान चली गई, जिस मामले में दो साल तक न्यायालयीन प्रक्रिया चली और जिस मामले में अब आरोपी दोषी करार दिया जा चुका है, उस स्थिति में आरोपी का मुस्कुराते हुए बाहर आना आखिर क्या संदेश देता है?
सजा के दिन भी मुस्कान—लोगों को क्यों चुभा यह दृश्य?-लोगों को यह दृश्य इसलिए असहज कर रहा है क्योंकि यह कोई सामान्य आपराधिक मामला नहीं है, यह वही मामला है जिसमें एक परिवार की दो सदस्य मारी गईं, यह वही मामला है जिसके बाद पूरा सूरजपुर आक्रोश में था, यह वही मामला है जिसके लिए फास्ट ट्रैक न्यायालय में सुनवाई हुई और दो साल तक लोग फैसले की प्रतीक्षा करते रहे, ऐसे में दोषी करार दिए जाने के दिन आरोपी के चेहरे पर दिखाई देने वाली मुस्कान को लोग अपनी-अपनी दृष्टि से देख रहे हैं, किसी के लिए यह बेफिक्री है, किसी के लिए यह न्यायिक प्रक्रिया के प्रति असंवेदनशीलता का प्रतीक है, और किसी के लिए यह सिर्फ कैमरे के सामने दिया गया एक क्षणिक व्यवहार हो सकता है, लेकिन पीडि़त परिवार के लिए यह दृश्य किस तरह का भाव पैदा करता है, यह सवाल सबसे अधिक महत्वपूर्ण है।
एक अन्य मामले में 10 साल की सजा और फिर वही चेहरा चर्चा में-इसी घटनाक्रम से जुड़े एक अन्य मामले में मुख्य आरोपी को पुलिसकर्मियों को वाहन से कुचलने के प्रयास के मामले में 10 वर्ष के सश्रम कारावास की सजा हो चुकी है, यानी 8 अक्टूबर को होने वाली सुनवाई उसके लिए न्यायिक प्रक्रिया का पहला सामना नहीं है, इससे पहले भी अदालत उसके खिलाफ सजा सुना चुकी है, लेकिन उस सजा के बाद सामने आए वीडियो में उसके मुस्कुराते हुए व्यवहार ने अब दोहरे हत्याकांड की आगामी सजा के संदर्भ में भी बहस को और तेज कर दिया है, लोग पूछ रहे हैं की क्या सजा सुनाए जाने का भय आरोपी के व्यवहार में दिखाई देना चाहिए? या फिर न्याय व्यवस्था का उद्देश्य आरोपी के चेहरे पर भय देखना नहीं, बल्कि कानून के अनुसार न्याय सुनिश्चित करना है? दूसरा सवाल कानूनी रूप से अधिक महत्वपूर्ण है।
फांसी की मांग अपनी जगह,फैसला अदालत का-सूरजपुर के लोगों में इस मामले को लेकर गुस्सा आज भी कम नहीं हुआ है, लोगों का एक वर्ग साफ कह रहा है कि ऐसे अपराध में फांसी से कम सजा नहीं होनी चाहिए, लेकिन अदालत को जनभावना के आधार पर नहीं, बल्कि कानून और साक्ष्यों के आधार पर निर्णय करना होगा, क्या अपराध की परिस्थितियां मृत्युदंड के लिए निर्धारित न्यायिक कसौटी तक पहुंचती हैं? क्या अभियोजन द्वारा प्रस्तुत साक्ष्य उस स्तर की सजा को उचित ठहराते हैं? क्या अदालत कोई अन्य कठोर दंड निर्धारित करती है? इन सवालों का उत्तर अभी किसी के पास नहीं है, उत्तर केवल 8 अक्टूबर को न्यायालय के आदेश में होगा।
दैनिक घटती-घटना की नजर घटना से फैसले तक- दैनिक घटती-घटना ने इस मामले को घटना के दिन से लेकर न्यायालय के निर्णय तक लगातार अपनी नजर में रखा है,घटना के बाद उपजे आक्रोश से लेकर आरोपियों की गिरफ्तारी, जांच, न्यायालयीन सुनवाई और अब दोषसिद्धि तक इस पूरे घटनाक्रम को लगातार पाठकों के सामने रखा गया है, अब इस मामले की अंतिम महत्वपूर्ण तारीख सामने है—8 अक्टूबर 2026, उस दिन अदालत क्या फैसला सुनाती है, यह अभी भविष्य के गर्भ में है, शहर फांसी की मांग कर रहा है, पीडि़त परिवार न्याय की प्रतीक्षा में है और पूरा सूरजपुर उस आदेश की प्रतीक्षा कर रहा है जो दो साल पुराने इस जख्म पर न्याय का अगला अध्याय लिखेगा, लेकिन एक बात स्पष्ट है—दोषी करार दिए जाने के बाद अब न्याय की अगली कसौटी सजा है,और 8 अक्टूबर को यह सामने आएगा कि न्यायालय ने इस पूरे अपराध की गंभीरता, परिस्थितियों और सामने रखे गए साक्ष्यों को किस तरह परखा, सूरजपुर पूछ रहा है—जिस वारदात ने पूरे शहर को दहला दिया, क्या उसकी सजा भी उतनी ही कठोर होगी? जवाब 8 अक्टूबर को अदालत देगी।
विवेचना की भी होगी अग्निपरीक्षा
इस मामले में यदि दोषसिद्धि तक बात पहुंची है इस मामले की के विवेचना अधिकारी थे निरीक्षक व तत्कालीन कोतवाली पुलिस प्रभारी सूरजपुर विमलेश दुबे जिन्होंने सभी साक्ष्य जुटाए थे,तो इसके पीछे पुलिस की विवेचना,अभियोजन की पैरवी,गवाहों के बयान और न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत साक्ष्यों की महत्वपूर्ण भूमिका रही होगी,अब सजा के स्तर पर भी यह मामला विवेचना और अभियोजन की मजबूती के संदर्भ में देखा जाएगा, यदि न्यायालय अपराध की गंभीरता को ध्यान में रखते हुए कठोरतम सजा देता है, तो इसे मामले की विवेचना और अभियोजन द्वारा प्रस्तुत साक्ष्यों की प्रभावशीलता के संदर्भ में भी देखा जाएगा, वहीं यदि न्यायालय कोई दूसरी सजा निर्धारित करता है, तो उसका आधार भी न्यायालय के विस्तृत आदेश से ही स्पष्ट होगा,इसलिए अभी से सजा को लेकर कोई अंतिम निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा, 8 अक्टूबर का न्यायिक आदेश ही बताएगा कि अदालत ने पूरे मामले को किस दृष्टि से देखा।
सरकार और पुलिस मुख्यालय ने माना था चुनौतीपूर्ण मामला
इस मामले की जांच और न्यायालयीन प्रक्रिया पर छत्तीसगढ़ शासन तथा पुलिस मुख्यालय के वरिष्ठ अधिकारियों की लगातार निगरानी रही,वर्तमान आईजी दीपक झा तथा पूर्व एवं वर्तमान एसपी क्रमशः प्रशांत ठाकुर और योगेश पटेल द्वारा प्रकरण की मॉनिटरिंग किए जाने की बात सामने आई,शासन स्तर से विशेष लोक अभियोजक सुरेश शर्मा को मामले की पैरवी के लिए नियुक्त किया गया था,कुल मिलाकर पुलिस विभाग और शासन के सामने इस मामले में आरोपियों को न्यायालय से दोषसिद्धि तक पहुंचाना एक महत्वपूर्ण चुनौती के रूप में लिया गया था, चार आरोपियों की दोषसिद्धि के बाद अब 8 अक्टूबर को होने वाली सजा पर निगाहें हैं,जहां न्यायालय यह तय करेगा कि दोषसिद्ध अपराधों के लिए कानून के तहत कौन-सी सजा निर्धारित की जाती है।
क्या फांसी मिलेगी? शहर की नजर इसी सवाल पर…
सूरजपुर में इस समय सबसे ज्यादा चर्चा इसी बात की है कि क्या अदालत इस मामले में मृत्युदंड जैसी कठोर सजा सुनाएगी, शहर के लोगों का तर्क है कि जिस तरह दो लोगों की हत्या की गई,घटना की परिस्थितियां जैसी थीं और जिस तरीके से वारदात ने पूरे समाज को झकझोर दिया,उसमें फांसी से कम सजा नहीं होनी चाहिए,लेकिन यहां जनभावना और न्यायिक निर्णय के बीच अंतर को समझना जरूरी है,लोग अपनी मांग रख सकते हैं। समाज अपनी अपेक्षा व्यक्त कर सकता है,पीडि़त परिवार न्याय की मांग कर सकता है, लेकिन सजा का निर्धारण न्यायालय करेगा,न्यायालय यह देखेगा कि अपराध की प्रकृति क्या है, साक्ष्य क्या हैं,अपराध की परिस्थितियां क्या हैं और कानून के तहत किस स्तर की सजा उचित है,इसलिए 8 अक्टूबर को आने वाला फैसला केवल शहर की मांग का जवाब नहीं होगा,बल्कि न्यायालय की कानूनी कसौटी पर आधारित निर्णय होगा।
तत्कालीन आईजीअंकित गर्ग के आश्वासन की भी होगी चर्चा…
इस पूरे मामले के शुरुआती दौर में तत्कालीन आईजी अंकित गर्ग ने पुलिस परिवार और पीडि़त परिवार को भरोसा दिलाया था कि मामले की जांच प्रभावी तरीके से की जाएगी और आरोपियों को कानून के अनुसार सजा दिलाने के लिए मजबूत कार्रवाई की जाएगी,उस समय दिया गया यह भरोसा आज दो साल बाद फिर चर्चा में है, अब यदि न्यायालय दोषियों को कठोर सजा देता है तो इसे पुलिस की जांच और उस समय दिए गए आश्वासन के परिणाम के रूप में भी देखा जाएगा,हालांकि न्यायालय का फैसला स्वतंत्र न्यायिक प्रक्रिया का परिणाम होगा,किसी पुलिस अधिकारी का आश्वासन अदालत के निर्णय को निर्धारित नहीं करता,फिर भी पीडि़त परिवार के लिए यह जरूर महत्वपूर्ण होगा कि जिस जांच को लेकर उस समय भरोसा दिया गया था,उसका न्यायालयीन परिणाम क्या निकलता है।
8 अक्टूबर सिर्फ एक तारीख नहीं,दो साल के इंतजार का पड़ाव
अब 8 अक्टूबर में कुछ ही दिन बचे हैं,सूरजपुर की नजर जिला न्यायालय पर है,पीडि़त परिवार न्याय की प्रतीक्षा कर रहा है,शहर के लोग सजा को लेकर चर्चा कर रहे हैं,पुलिस विभाग की नजर भी इस फैसले पर होगी, अभियोजन के लिए यह लंबी प्रक्रिया का महत्वपूर्ण पड़ाव है,और न्यायालय के सामने पूरा मामला है—साक्ष्य,गवाह,परिस्थितियां और कानून, यही कारण है कि 8 अक्टूबर को आने वाला फैसला इस मामले का सबसे महत्वपूर्ण अध्याय होगा।
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