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लेख@ वकालत को सुरक्षित पेशा ही नहीं,सुरक्षित जीवन भी चाहिए : अधिवक्ता देव प्रसाद जोशी

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छत्तीसगढ़ में अधिवक्ता संरक्षण की नई परिकल्पना : सुरक्षा,शुरुआती संघर्ष, बीमारी,वृद्धावस्था और न्यायालयीन कार्यस्थल…पांचों मोर्चों पर एक समग्र व्यवस्था की जरूरत…
किसी न्यायालय में जब कोई अधिवक्ता अपने मुवक्किल की ओर से खड़ा होकर तर्क रखता है,तो सामने दिखाई देता है केवल उसका पेशेवर पक्ष। उसके पीछे एक ऐसा जीवन भी है जिसमें रोज की तैयारी, लगातार अध्ययन, न्यायालयीन दौड़-भाग,मुवक्किलों की जिम्मेदारी और अनिश्चित आय के बीच पेशे को बनाए रखने की चुनौती शामिल होती है।
इसी वास्तविकता से छत्तीसगढ़ में अधिवक्ता प्रोटेक्शन एक्ट की मांग को देखने की जरूरत है।
अधिवक्ता संरक्षण का अर्थ केवल यह नहीं होना चाहिए कि किसी अप्रिय घटना के बाद आरोपी के विरुद्ध कठोर कार्रवाई हो। संरक्षण की अवधारणा इससे आगे जाती है…अधिवक्ता को निर्भय होकर काम करने का वातावरण मिले,युवा अधिवक्ता शुरुआती वर्षों में पेशा छोड़ने को मजबूर न हो,वरिष्ठ अधिवक्ता वृद्धावस्था में आर्थिक असुरक्षा से न जूझे, बीमारी में उपचार के साथ परिवार की चिंता भी कम हो और न्यायालय स्वयं अधिवक्ता के लिए सम्मानजनक कार्यस्थल उपलब्ध कराए।
इसी व्यापक सोच के आधार पर छत्तीसगढ़ में अधिवक्ताओं के लिए एक विशेष संरक्षण एवं कल्याण कानून की आवश्यकता पर विचार किया जाना चाहिए।
अधिवक्ता देव प्रसाद जोशी,छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय, बिलासपुर एवं सेशन कोर्ट,रायपुर के अनुसार अधिवक्ता संरक्षण की चर्चा को केवल सुरक्षा तक सीमित रखने के बजाय इसे अधिवक्ता के पूरे पेशेवर जीवन-चक्र से जोड़ना अधिक उपयोगी होगा।
पहला सवाल—क्या अधिवक्ता अपने कार्यस्थल पर सुरक्षित है?
अधिवक्ता का चेंबर या कार्यालय उसके पेशे का कार्यस्थल है। वहां मुवक्किल से बातचीत होती है, केस के दस्तावेज देखे जाते हैं और कानूनी रणनीति पर विचार होता है।
यदि कोई व्यक्ति वहां पहुंचकर मारपीट करता है,गाली-गलौज करता है,धमकी देता है या विवाद उत्पन्न कर अधिवक्ता पर दबाव डालने का प्रयास करता है,तो ऐसी घटना को केवल व्यक्तिगत झगड़ा मानकर छोड़ना उचित नहीं होगा।
प्रस्तावित कानून में अधिवक्ता के पेशेवर कार्य में हिंसा, धमकी,जबरदस्ती या गंभीर व्यवधान से संबंधित स्पष्ट प्रावधान होने चाहिए।
गंभीर प्रकृति की घटनाओं में अपराध की परिस्थितियों के अनुरूप गैर-जमानती प्रावधान किए जाने की मांग पर भी विधायी स्तर पर विचार किया जा सकता है। साथ ही कानून में यह सुरक्षा भी होनी चाहिए कि वास्तविक घटना और दुर्भावनापूर्ण या झूठी शिकायत के बीच अंतर करने के लिए उचित कानूनी प्रक्रिया उपलब्ध रहे।
इससे संरक्षण कानून एकतरफा दंड का साधन बनने के बजाय संतुलित कानूनी व्यवस्था के रूप में विकसित हो सकेगा।
दूसरा सवाल— नया अधिवक्ता पेशे में टिके कैसे?
कानून की डिग्री और अधिवक्ता के रूप में पंजीयन के बाद वास्तविक पेशेवर शिक्षा शुरू होती है। पहले कुछ वर्षों में युवा अधिवक्ता को कानून पढ़ने के साथ-साथ यह सीखना पड़ता है कि न्यायालय में आवेदन कैसे प्रस्तुत किया जाता है, केस डायरी कैसे पढ़ी जाती है, साक्ष्य का परीक्षण कैसे किया जाता है, जिरह की तैयारी कैसे होती है और न्यायालयीन प्रक्रिया को व्यावहारिक रूप से कैसे समझा जाता है।
इसी दौरान उसकी आय अक्सर सीमित या अनिश्चित होती है।
इसलिए तीन वर्ष से कम अवधि से पंजीकृत नए अधिवक्ताओं के लिए प्रारंभिक पेशेवर प्रशिक्षण एवं इंटर्नशिप छात्रवृत्ति शुरू करने का प्रस्ताव महत्वपूर्ण हो सकता है।
यह सहायता निर्धारित पात्रता और प्रशिक्षण गतिविधियों से जोड़ी जा सकती है। इसका उद्देश्य मुफ्त आय देना नहीं बल्कि उस शुरुआती अवधि में पेशेवर क्षमता विकसित करने का अवसर देना होना चाहिए, जब अधिवक्ता अपने भविष्य की नींव तैयार करता है।
तीसरा सवाल— 65 वर्ष के बाद क्या?
वकालत की खासियत यह है कि इसमें सेवा की कोई सामान्य निर्धारित सेवानिवृत्ति आयु नहीं होती। कई अधिवक्ता लंबे समय तक सक्रिय रहते हैं। लेकिन उम्र बढ़ने के साथ आय के स्रोत सीमित हो सकते हैं और चिकित्सा खर्च बढ़ सकता है।
इसलिए 65 वर्ष से अधिक आयु के पात्र अधिवक्ताओं के लिए मासिक अधिवक्ता पेंशन अथवा जीवन-निर्वाह सहायता की योजना बनाई जानी चाहिए।
पात्रता के लिए न्यूनतम वकालत अवधि, पंजीयन,आय संबंधी मानदंड और अन्य आवश्यक शर्तें निर्धारित की जा सकती हैं।
यह योजना अधिवक्ता को केवल आर्थिक सहायता देने की योजना न होकर उस पेशेवर योगदान की सामाजिक स्वीकृति भी हो सकती है जो उसने अपने सक्रिय वर्षों में न्याय व्यवस्था को दिया है।
चौथा सवाल—बीमारी में सिर्फ अस्पताल का बिल नहीं आता किसी अधिवक्ता के गंभीर रूप से बीमार होने पर दो समस्याएं एक साथ पैदा होती हैं।
पहली—उपचार का खर्च।
दूसरी—काम न कर पाने के
कारण आय में कमी।

इसलिए अधिवक्ता कल्याण योजना में कम से कम 20 लाख रुपये तक की कैशलेस स्वास्थ्य उपचार सुविधा अधिवक्ता तथा उसके पात्र आश्रित परिवार के लिए उपलब्ध कराने की मांग पर विचार किया जाना चाहिए। लेकिन केवल स्वास्थ्य बीमा पर्याप्त नहीं है।
गंभीर बीमारी या चिकित्सकीय रूप से प्रमाणित अस्थायी कार्य-असमर्थता के दौरान पात्र अधिवक्ता को निर्धारित अवधि के लिए जीवन-निर्वाह सहायता भी उपलब्ध कराई जा सकती है।
इस व्यवस्था के लिए मेडिकल प्रमाण, पात्रता और सहायता की अधिकतम अवधि स्पष्ट रूप से तय की जा सकती है।
पांचवां सवाल—क्या न्यायालय अधिवक्ता का भी कार्यस्थल है?
यदि उत्तर हां है,तो फिर न्यायालय परिसर की योजना बनाते समय अधिवक्ता की कार्य संबंधी जरूरतों को भी शामिल करना होगा। कई न्यायालयों में बड़ी संख्या में अधिवक्ता रोज उपस्थित होते हैं। उन्हें बैठने,दस्तावेज देखने, मुवक्किल से चर्चा करने और डिजिटल काम करने के लिए पर्याप्त स्थान की आवश्यकता होती है।
इसलिए प्रत्येक न्यायालय में आवश्यकता के अनुसार :-बार रूम, पर्याप्त सीटिंग, स्वच्छ पेयजल,शौचालय,इंटरनेट,ई-फाइलिंग सुविधा,दस्तावेज स्कैनिंग तथा प्रिंटिंग सुविधा उपलब्ध कराई जानी चाहिए। चेंबर केवल सुविधा नहीं, कानूनी गोपनीयता का स्थान है मुवक्किल और अधिवक्ता के बीच होने वाली बातचीत कई मामलों में अत्यंत संवेदनशील होती है।
यदि किसी व्यक्ति को अपने मुकदमे की जानकारी सार्वजनिक स्थान पर बतानी पड़े तो वह खुलकर अपनी बात रखने में संकोच कर सकता है। इसलिए न्यायालय परिसर में उपलब्ध स्थान के अनुसार अलग चेंबर या प्राइवेट कंसल्टेशन केबिन विकसित किए जाने चाहिए।
चेंबर आवंटन की प्रक्रिया पारदर्शी हो तथा नए और पुराने अधिवक्ताओं के लिए न्यायसंगत व्यवस्था बनाई जाए।
महिला अधिवक्ता और परिवार-अनुकूल न्यायालय परिसर
न्याय व्यवस्था में महिला अधिवक्ताओं की भागीदारी लगातार महत्वपूर्ण हो रही है। इसलिए न्यायालय परिसर की सुविधाओं में उनकी व्यावहारिक जरूरतों को भी शामिल किया जाना चाहिए।स्वच्छ महिला शौचालय,सुरक्षित विश्राम स्थल,मातृत्व संबंधी आवश्यक सुविधाएं तथा आवश्यकता वाले बड़े न्यायालय परिसरों में क्रेच/चाइल्ड-केयर सुविधा विकसित करने पर विचार किया जा सकता है।
यह केवल सुविधा का प्रश्न नहीं बल्कि ऐसा न्यायालयीन वातावरण बनाने का प्रश्न है जिसमें प्रतिभा और पेशेवर क्षमता के सामने अनावश्यक व्यावहारिक बाधाएं कम हों।
अधिवक्ता की मृत्यु का असर परिवार पर पड़ता है
एक अधिवक्ता के निधन के बाद उसके परिवार के सामने आय का संकट उत्पन्न हो सकता है। इसलिए अधिवक्ता कल्याण व्यवस्था में पात्र अधिवक्ता की मृत्यु पर आश्रित परिवार के लिए आर्थिक सहायता,बच्चों की शिक्षा के लिए सहायता तथा उपलब्ध स्वास्थ्य योजना की निरंतरता जैसे प्रावधानों पर विचार किया जाना चाहिए।
डिजिटल युग का अधिवक्ता—सिर्फ कंप्यूटर नहीं, सुविधा भी चाहिए…
ई-फाइलिंग और डिजिटल न्याय व्यवस्था ने अधिवक्ता के काम करने के तरीके को बदल दिया है। लेकिन डिजिटल व्यवस्था तभी प्रभावी होगी जब जिला और तहसील स्तर तक अधिवक्ता को आवश्यक तकनीकी सहायता उपलब्ध हो। इसलिए न्यायालय परिसर में अधिवक्ता डिजिटल सहायता केंद्र स्थापित किए जा सकते हैं,जहां ई-फाइलिंग,स्कैनिंग,प्रिंटिंग और ऑनलाइन न्यायालयीन सेवाओं से संबंधित तकनीकी सहायता उपलब्ध हो।
एक नया विचार—अधिवक्ता जीवन-चक्र कल्याण मॉडल
अधिवक्ता संरक्षण कानून को अलग-अलग योजनाओं का संग्रह बनाने के बजाय एकअधिवक्ता जीवन-चक्र कल्याण मॉडल के रूप में विकसित किया जा सकता है। इस मॉडल में अधिवक्ता के पेशेवर जीवन के पांच चरणों को ध्यान में रखा जाए…
प्रवेश : नए अधिवक्ता को प्रशिक्षण एवं छात्रवृत्ति।
स्थापना : कार्यस्थल,चेंबर और डिजिटल सुविधाएं।
सुरक्षा : कार्यस्थल पर हिंसा, धमकी और पेशेवर दबाव से कानूनी संरक्षण।
संकट : बीमारी,दुर्घटना और अस्थायी कार्य-असमर्थता में सहायता।
वृद्धावस्था : 65 वर्ष के बाद पात्र अधिवक्ता के लिए पेंशन/जीवन-निर्वाह सहायता

ऐसी संरचना अधिवक्ता कल्याण को एक बिखरी हुई सहायता प्रणाली के बजाय दीर्घकालीन नीति का रूप दे सकती है।
विशेष मांग-पत्र : प्रस्तावित प्रमुख बिंदु
● अधिवक्ता के चेंबर,कार्यालय अथवा न्यायालय परिसर में मारपीट,धमकी, गाली-गलौज एवं पेशेवर कार्य में जबरन हस्तक्षेप के लिए विशेष कानूनी प्रावधान।
● गंभीर प्रकृति की घटनाओं में परिस्थितियों के अनुरूप गैर-जमानती प्रावधानों पर विधायी विचार।
● तीन वर्ष से कम अवधि से पंजीकृत नएअधिवक्ताओं के लिए इंटर्नशिप/ प्रशिक्षण छात्रवृत्ति।
● 65 वर्ष से अधिक आयु के पात्र अधिवक्ताओं के लिए मासिक पेंशन या जीवन-निर्वाह सहायता।
● अधिवक्ता एवं आश्रित परिवार के लिए कम से कम 20 लाख रुपये तक कैशलेस चिकित्सा सुविधा।
● गंभीर बीमारी अथवा प्रमाणित कार्य-असमर्थता के दौरान निर्धारित अवधि के लिए जीवन-निर्वाह सहायता।
● आकस्मिक मृत्यु की स्थिति में पात्र अधिवक्ता के परिवार के लिए पर्याप्त आर्थिक सहायता।
● प्रत्येक न्यायालय में अधिवक्ताओं के लिए पर्याप्त बैठने की व्यवस्था और बार रूम।
● चेंबर/केबिन तथा मुवक्किल से कानूनी परामर्श के लिए प्राइवेट स्पेस।
● महिला अधिवक्ताओं के लिए आवश्यक सुरक्षित एवं सुविधाजनक कार्यस्थल।
● ई-फाइलिंग और अन्य डिजिटल सेवाओं के लिए अधिवक्ता सुविधा केंद्र।
● जरूरतमंद अधिवक्ताओं के बच्चों के लिए शिक्षा सहायता।
● गंभीर दुर्घटना एवं आकस्मिक परिस्थितियों के लिए आपातकालीन सहायता कोष।
● अधिवक्ता सुरक्षा संबंधी शिकायतों के लिए स्पष्ट, पारदर्शी और समयबद्ध प्रक्रिया।
अंतिम बात : संरक्षण का मतलब विशेषाधिकार नहीं, काम करने की स्वतंत्रता है
अधिवक्ता प्रोटेक्शन एक्ट की सबसे महत्वपूर्ण कसौटी यह नहीं होनी चाहिए कि उसमें कितनी धाराएं हैं। असली प्रश्न यह है कि क्या कानून अधिवक्ता को बिना भय,बिना अनुचित दबाव और सम्मानजनक परिस्थितियों में अपने पेशेवर दायित्व निभाने का वास्तविक वातावरण देता है।
सुरक्षा के साथ सामाजिक सुरक्षा जुड़नी चाहिए। नए अधिवक्ता को शुरुआत का सहारा चाहिए,वरिष्ठ अधिवक्ता को वृद्धावस्था की सुरक्षा चाहिए,बीमार अधिवक्ता को उपचार और आय दोनों की चिंता से राहत चाहिए और न्यायालय में काम करने वाले प्रत्येक अधिवक्ता को बैठने तथा मुवक्किल से गोपनीय बातचीत करने के लिए उचित स्थान चाहिए।
इसीलिए छत्तीसगढ़ में अधिवक्ता संरक्षण पर होने वाली चर्चा को केवल मारपीट के बाद कार्रवाई तक सीमित न रखकर पूरे पेशेवर जीवन की सुरक्षा के रूप में देखा जाना चाहिए।
यह दृष्टिकोण अधिवक्ता को कोई विशेषाधिकार देने की बात नहीं करता। इसका उद्देश्य इतना भर है कि जो व्यक्ति दूसरों के अधिकारों की रक्षा के लिए न्यायालय में खड़ा होता है,उसके अपने सुरक्षित कार्यस्थल,स्वास्थ्य,सम्मान और सामाजिक सुरक्षा के प्रश्न भी नीति-निर्माण में पर्याप्त महत्व प्राप्त करें। अधिवक्ता साथी हमारे इस मुहिम से जुड़ने के लिए संपर्क करे
देवप्रसाद जोशी
रायपुर,छत्तीसगढ़


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