
- कोरिया की खाद्य सुरक्षा या नवा रायपुर का अतिरिक्त प्रभार? एक अधिकारी…दो मोर्चे…
- 300 किमी दूर से डबल ड्यूटी! कोरिया की खाद्य जांच के बीच नवा रायपुर का अतिरिक्त प्रभार…
- सैंपलिंग के बाद रिपोर्ट का इंतजार, अब अधिकारी संभालेंगे 300 किमी दूर का अतिरिक्त प्रभार…
- खाद्य सुरक्षा की जमीन कमजोर, मुख्यालय का बोझ बढ़ा…एक अधिकारी,दो जिम्मेदारियां
- जिले की शुद्धता जांच छोड़ेंगे या मुख्यालय संभालेंगे? अतिरिक्त प्रभार पर बड़ा सवाल… जैसा चल रहा है,चलने दो वाला सिस्टम! कोरिया से नवा रायपुर तक अतिरिक्त प्रभार…
- 300 किलोमीटर दूर बैठे अधिकारी को मुख्यालय का अतिरिक्त प्रभार, जिस जिले में खाद्य पदार्थों की शुद्धता की जांच ही चुनौती बनी हुई वहां अब निगरानी और सैंपलिंग का क्या होगा?
-रवि सिंह-
कोरिया/बैकुंठपुर,19 सितम्बर 2026 (घटती-घटना)। सरकारी व्यवस्था में अतिरिक्त प्रभार कोई नई बात नहीं है,लेकिन जब एक अधिकारी को एक जिले की जिम्मेदारी के साथ सैकड़ों किलोमीटर दूर स्थित मुख्यालय की जिम्मेदारी भी सौंप दी जाए,तो सवाल केवल आदेश का नहीं,बल्कि जमीनी कामकाज की निगरानी का बन जाता है, 18 सितंबर 2026 को जारी शासन के आदेश ने इसी सवाल को जन्म दिया है। आदेश के अनुसार कोरिया जिले में पदस्थ अभिहित अधिकारी नीलम ठाकुर को उनके वर्तमान कर्तव्यों के साथ-साथ नवा रायपुर स्थित नियंत्रक,खाद्य एवं औषधि प्रशासन कार्यालय में उप संचालक (खाद्य) का अतिरिक्त प्रभार सौंपा गया है,वहीं बेमेतरा के अभिहित अधिकारी आशीष कुमार यादव को भी उनके वर्तमान कर्तव्यों के साथ नवा रायपुर में उपायुक्त (खाद्य) का अतिरिक्त प्रभार दिया गया है, यानी विभाग ने दो अधिकारियों को उनके मौजूदा काम से हटाया नहीं है,बल्कि उसी जिम्मेदारी के साथ मुख्यालय की अतिरिक्त जिम्मेदारी भी जोड़ दी है,यहीं से सबसे बड़ा सवाल खड़ा होता है—आखिर एक अधिकारी एक साथ कितनी जगह मौजूद रह सकता है?
कोरिया से नवा रायपुर तक जिम्मेदारी,बीच में कौन देखेगा जिला?- कोरिया कोई छोटा जिला नहीं है,यहां खाद्य पदार्थों की शुद्धता,मिलावट की जांच, सैंपलिंग और उससे जुड़ी कार्रवाई की जिम्मेदारी खाद्य एवं औषधि प्रशासन की है,लेकिन जमीनी स्तर पर पहले से ही यह सवाल उठता रहा है कि खाद्य पदार्थों की नियमित जांच कितनी प्रभावी ढंग से हो रही है,स्थिति यह बताई जाती है कि शुद्धता और मिलावट की जांच के लिए कभी-कभी अभियान चलाया जाता है,कुछ दिनों तक कार्रवाई, सैंपलिंग और निरीक्षण की गतिविधियां दिखाई देती हैं और फिर कुछ समय बाद व्यवस्था पहले जैसी नजर आने लगती है,यानी सवाल यह नहीं कि अभियान चलता है या नहीं, बल्कि सवाल यह है कि क्या पूरे वर्ष नियमित रूप से खाद्य पदार्थों की जांच और निगरानी की व्यवस्था प्रभावी ढंग से चल रही है? अगर जिले में पहले से ही नियमित निगरानी को लेकर सवाल हैं, तो अब उसी अधिकारी के ऊपर नवा रायपुर की अतिरिक्त जिम्मेदारी डाल दिए जाने से यह सवाल और गंभीर हो जाता है।
‘कुछ दिन अभियान,फिर सब सामान्य’ वाली व्यवस्था?-जिले में खाद्य पदार्थों की शुद्धता जांच को लेकर यह धारणा बनती जा रही है कि जब कोई विशेष अभियान आता है तो विभाग सक्रिय दिखाई देता है, बाजारों में निरीक्षण होते हैं,सैंपल लिए जाते हैं और कार्रवाई की खबरें सामने आती हैं, लेकिन अभियान समाप्त होते ही नियमित निगरानी की रफ्तार पर सवाल उठने लगते हैं,यदि खाद्य सुरक्षा व्यवस्था अभियान आधारित होकर रह जाए तो मिलावट और अमानक खाद्य पदार्थों पर स्थायी नियंत्रण कैसे होगा? आम उपभोक्ता को तो रोज खाद्य सामग्री खरीदनी है। उसके लिए खाद्य सुरक्षा अभियान केवल कुछ दिनों का विषय नहीं है,दूध,मिठाई,मसाले,तेल,खाद्य सामग्री और अन्य उत्पादों की गुणवत्ता की जांच पूरे साल होनी चाहिए,यही कारण है कि जिले की खाद्य सुरक्षा व्यवस्था में नियमित निरीक्षण और लगातार निगरानी अधिक महत्वपूर्ण है।
सूत्रों का दावा…सेटिंग से चलता है सिस्टम,जांच की जरूरत-इसी बीच विभागीय कामकाज से जुड़े सूत्र गंभीर आरोप लगाते हैं,सूत्रों का दावा है कि कई मामलों में कार्रवाई की बजाय ‘सेटिंग’ का खेल चलता है और इसी वजह से व्यवस्था अपनी अपेक्षित कठोरता से काम नहीं कर पाती,हालांकि इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि इस आदेश से नहीं होती है और इन्हें तथ्य के रूप में नहीं माना जा सकता, लेकिन यदि ऐसे आरोप लगातार सामने आ रहे हैं तो विभाग के लिए यह जांच का विषय जरूर होना चाहिए कि सैंपलिंग से लेकर रिपोर्ट,कार्रवाई और प्रकरण के अंतिम परिणाम तक पूरी प्रक्रिया कितनी पारदर्शी है,सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह है कि यदि किसी खाद्य पदार्थ का नमूना मानक से बाहर पाया जाता है तो उसके बाद वास्तव में कितनी कार्रवाई होती है? सैंपल लेने से लेकर कार्रवाई पूरी होने तक की पूरी चेन सार्वजनिक क्यों नहीं होनी चाहिए?
अब मुख्यालय भी संभालेंगी,तो जिले की निगरानी कौन करेगा?-यही इस पूरे मामले का सबसे बड़ा सवाल है,कोरिया में अधिकारी की अपनी जिम्मेदारी बनी रहेगी और उसी के साथ नवा रायपुर में उप संचालक (खाद्य) का अतिरिक्त प्रभार भी रहेगा,शासन के आदेश में स्पष्ट रूप से वर्तमान कर्तव्यों के साथ अतिरिक्त प्रभार सौंपे जाने की बात कही गई है,ऐसे में प्रशासन को यह स्पष्ट करना चाहिए कि दोनों जिम्मेदारियों के बीच कार्य-विभाजन कैसे होगा,क्या कोरिया में नियमित निरीक्षण के लिए अलग अधिकारी या टीम उपलब्ध होगी? क्या सैंपलिंग की संख्या बढ़ाई जाएगी? क्या पुराने सैंपलों की रिपोर्ट और लंबित मामलों की समीक्षा होगी? क्या बाजारों में नियमित जांच होगी या फिर विशेष अभियान का इंतजार किया जाएगा? और सबसे महत्वपूर्ण—क्या अतिरिक्त प्रभार संभालने वाले अधिकारी को दोनों स्थानों की जिम्मेदारी प्रभावी ढंग से निभाने के लिए पर्याप्त प्रशासनिक सहयोग और मानव संसाधन उपलब्ध कराया जाएगा?
सुपरमैन चाहिए या मजबूत सिस्टम?- असल सवाल किसी अधिकारी की क्षमता पर नहीं है,सवाल सिस्टम की संरचना का है, एक सक्षम अधिकारी भी एक साथ कई जिम्मेदारियां संभाल सकता है,तकनीक ने काम को आसान बनाया है,लेकिन खाद्य सुरक्षा जैसे विभाग में केवल फाइलों का निपटारा पर्याप्त नहीं है,जमीन पर जाकर निरीक्षण करना,सैंपल लेना, उसकी जांच कराना,रिपोर्ट की समीक्षा करना और नियमों के मुताबिक कार्रवाई सुनिश्चित करना भी उतना ही जरूरी है, इसलिए व्यवस्था को किसी सुपरमैन अधिकारी पर निर्भर करने की बजाय ऐसा सिस्टम बनाना चाहिए जिसमें अधिकारी की अनुपस्थिति में भी जिला स्तर की खाद्य सुरक्षा निगरानी प्रभावित न हो,क्योंकि सवाल एक अधिकारी की कार्यक्षमता का नहीं, करोड़ों लोगों की थाली तक पहुंचने वाले खाद्य पदार्थों की गुणवत्ता का है।
शासन के सामने अब असली परीक्षा-18 सितंबर 2026 के आदेश में राज्य शासन ने दोनों अधिकारियों को अतिरिक्त जिम्मेदारी सौंपी है और आदेश उप सचिव विजय कुमार चौधरी के हस्ताक्षर से जारी हुआ है,आदेश की प्रतिलिपि खाद्य एवं औषधि प्रशासन के संबंधित वरिष्ठ अधिकारियों तथा दोनों अधिकारियों को सूचना एवं आवश्यक कार्रवाई के लिए भेजी गई है,अब जिम्मेदारी केवल आदेश जारी करने तक खत्म नहीं होती,असली परीक्षा यह होगी कि कोरिया की खाद्य सुरक्षा व्यवस्था पर इसका क्या असर पड़ता है,यदि जिले में नियमित सैंपलिंग बढ़ती है,रिपोर्ट समय पर आती है,अमानक खाद्य पदार्थों पर कार्रवाई होती है और बाजारों में लगातार निगरानी दिखाई देती है तो अतिरिक्त प्रभार के बावजूद व्यवस्था मजबूत मानी जाएगी, लेकिन यदि अभियान कुछ दिनों तक चला, सैंपल लिए गए,फिर रिपोर्ट और कार्रवाई की प्रक्रिया ठंडी पड़ गई और अधिकारी मुख्यालय की अतिरिक्त जिम्मेदारी में व्यस्त रहे तो सवाल उठना स्वाभाविक है कि आखिर इस व्यवस्था का लाभ किसे मिला? क्योंकि कोरिया की जनता को अतिरिक्त प्रभार नहीं,सुरक्षित और शुद्ध खाद्य पदार्थ चाहिए,और यही वह बिंदु है जहां शासन को तय करना होगा कि उसे दो जगह का काम संभालने वाले सुपरमैन चाहिए या ऐसा मजबूत सिस्टम,जो किसी एक अधिकारी की मौजूदगी पर निर्भर न रहे।
सैंपल तो लिए जाते हैं,परिणाम का क्या?
खाद्य सुरक्षा व्यवस्था में सैंपलिंग सबसे महत्वपूर्ण प्रक्रिया में से एक है। किसी खाद्य पदार्थ का नमूना लिया गया,उसे जांच के लिए भेजा गया और उसके बाद उसकी रिपोर्ट के आधार पर कार्रवाई हुई…तभी सैंपलिंग का वास्तविक उद्देश्य पूरा होता है,लेकिन जिले में सवाल यह भी उठ रहा है कि सैंपल लेने के बाद आगे क्या होता है? कितने सैंपल लिए गए? कितने सैंपल की रिपोर्ट आई? कितने नमूने मानक के अनुरूप नहीं मिले? कितने मामलों में कार्रवाई हुई? और कितने मामलों में मामला सिर्फ सैंपल लेने तक सीमित रह गया? इन सवालों के स्पष्ट और नियमित आंकड़े आम लोगों के सामने नहीं आने से व्यवस्था की प्रभावशीलता पर सवाल खड़े होते हैं,यही वजह है कि अब अतिरिक्त प्रभार का आदेश केवल प्रशासनिक आदेश नहीं रह जाता। यह सवाल भी सामने आता है कि जब जिले की नियमित निगरानी ही पूरी क्षमता से नहीं हो पा रही है तो मुख्यालय की अतिरिक्त जिम्मेदारी मिलने के बाद जमीनी जांच का क्या होगा?
जैसा चल रहा है,चलने दो वाली स्थिति तो नहीं?
इस पूरे मामले में सबसे बड़ा सवाल शासन की निर्णय प्रक्रिया पर भी है, क्या शासन को जिले में खाद्य सुरक्षा की वास्तविक जमीनी जरूरतों की जानकारी है? क्या यह देखा गया कि जिस अधिकारी को मुख्यालय का अतिरिक्त प्रभार दिया जा रहा है,उसकी मूल पदस्थापना वाले जिले में खाद्य सुरक्षा व्यवस्था की स्थिति क्या है? क्या यह आकलन किया गया कि जिले में नियमित सैंपलिंग, निरीक्षण और कार्रवाई के लिए पर्याप्त अधिकारी उपलब्ध हैं? या फिर प्रशासनिक व्यवस्था का आसान रास्ता यही बन गया है कि जहां पद खाली है, वहां किसी दूसरे अधिकारी को अतिरिक्त प्रभार दे दो और व्यवस्था चलती रहने दो? अगर यही मॉडल लगातार चलता रहा तो अतिरिक्त प्रभार व्यवस्था अस्थायी समाधान से आगे बढ़कर स्थायी प्रशासनिक संस्कृति बन सकती है।
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