- समय रहते नहीं जागा प्रशासन,स्कूल बसों से मरीजों तक सब बेहाल…
- मुख्य मार्ग बंद,स्कूल बसों से मरीजों तक आवागमन प्रभावित,समय रहते मरम्मत नहीं होने पर प्रशासन की निगरानी पर सवाल…
- हादसे का इंतजार करता रहा सिस्टम, अब धंसी चरचा की लाइफलाइन
- चरचा की सड़क में बड़ा ‘सुराख’, प्रशासन की निगरानी पर सवाल…
- सालभर पहले बना रेलवे अंडरब्रिज भी नहीं बचा! शिवपुर-चरचा मुख्य मार्ग बंद, स्कूल बसों के पहिए थमे
- वैकल्पिक रास्ता भी जर्जर, प्रशासन की निगरानी और निर्माण गुणवत्ता पर बड़े सवाल…
-रवि सिंह-
बैकुंठपुर/कोरिया,19 सितम्बर 2026 (घटती-घटना)। जिस सड़क को चरचा क्षेत्र की करीब 25 हजार आबादी की लाइफलाइन कहा जाता है,वही सड़क अब एक धंसी हुई पुलिया के कारण बंद हो गई है, शिवपुर-चरचा मुख्य मार्ग पर स्थित रेलवे अंडरब्रिज की पुलिया शनिवार सुबह अचानक धंस गई,इसके साथ ही चरचा क्षेत्र का मुख्य संपर्क मार्ग बाधित हो गया और हजारों लोगों के सामने आवागमन का संकट खड़ा हो गया,स्कूल बसों की आवाजाही प्रभावित है,रोजमर्रा की जरूरतों का सामान लेकर आने-जाने वाले वाहनों पर असर पड़ा है और मरीजों तथा आपातकालीन सेवाओं को लेकर चिंता बढ़ गई है। उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार यह अंडरब्रिज करीब एक वर्ष पहले ही निर्मित हुआ था,मामला सिर्फ पुलिया के धंसने तक सीमित नहीं है,असली सवाल यह है कि एक साल के भीतर ही महत्वपूर्ण मार्ग की पुलिया ऐसी स्थिति में कैसे पहुंच गई? यदि निर्माण के दौरान गुणवत्ता और तकनीकी मानकों का पालन हुआ था तो इतनी जल्दी संरचना के क्षतिग्रस्त होने की वजह क्या है? और यदि पुलिया की स्थिति पहले से कमजोर थी तो संबंधित एजेंसियों ने समय रहते निरीक्षण क्यों नहीं किया? अब पुलिया धंसने के बाद प्रशासनिक व्यवस्था सक्रिय होती दिखाई दे रही है, लेकिन जनता का सवाल इससे बड़ा है—क्या सरकारी तंत्र हमेशा किसी संरचना के टूटने का इंतजार करेगा और उसके बाद ही उसकी हालत देखने पहुंचेगा?
भारी कोयला परिवहन का दबाव भी चर्चा में-स्थानीय स्तर पर पुलिया पर भारी कोयला परिवहन और पिछले दिनों हुई बारिश के कारण बढ़े दबाव की बात सामने आई है,कुछ स्थानीय रिपोर्टों में भी भारी कोयला परिवहन को पुलिया की स्थिति से जोड़कर सवाल उठाए गए हैं,लेकिन इस बिंदु पर अंतिम निष्कर्ष तकनीकी जांच के बाद ही सामने आ सकता है,यही वजह है कि अब सबसे जरूरी कदम किसी एक कारण को मान लेना नहीं,बल्कि पुलिया के धंसने के वास्तविक कारणों की स्वतंत्र तकनीकी जांच कराना है,यदि भारी वाहनों का दबाव कारण है तो उसका आकलन होना चाहिए। यदि बारिश या जल निकासी समस्या है तो उसकी जांच होनी चाहिए। यदि निर्माण गुणवत्ता में कमी है तो संबंधित एजेंसी और जिम्मेदारों की जवाबदेही तय होनी चाहिए।
वैकल्पिक रास्ता भी पूरी तरह सुरक्षित नहीं-मुख्य मार्ग बंद होने के बाद लोग वैकल्पिक रास्ते का इस्तेमाल कर रहे हैं, लेकिन उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार यह वैकल्पिक मार्ग भी पहले से खराब स्थिति में है,वहां मौजूद पुल जर्जर बताया गया है और सीसी सड़क भी कई स्थानों पर खराब है,मुख्य मार्ग बंद होने के बाद इस रास्ते पर वाहनों का दबाव बढ़ने से नई दुर्घटना का खतरा पैदा हो सकता है,यानी समस्या का तत्काल समाधान करने के लिए जिस वैकल्पिक रास्ते का सहारा लिया जा रहा है, उसकी अपनी स्थिति भी चिंता पैदा कर रही है, ऐसे में प्रशासन को केवल‘वैकल्पिक मार्ग उपलब्ध है कहकर जिम्मेदारी पूरी करने के बजाय उसकी वास्तविक क्षमता और सुरक्षा का तकनीकी आकलन करना होगा।
हादसे के बाद जागने की बजाय पहले क्यों नहीं जागा तंत्र?-चरचा की पुलिया का धंसना प्रशासनिक निगरानी व्यवस्था के सामने सबसे बड़ा सवाल यही खड़ा करता है कि यदि किसी संरचना में खतरा था तो उसका पता हादसे से पहले क्यों नहीं चला, सरकारी अधोसंरचना का मतलब केवल सड़क और पुल बनाना नहीं है,निर्माण के बाद उसका नियमित निरीक्षण और रखरखाव भी उतना ही महत्वपूर्ण है,अगर कोई पुलिया या पुल अपनी निर्धारित क्षमता से अधिक दबाव झेल रहा है, उसकी नींव या संरचना में कमजोरी है,जल निकासी ठीक नहीं है या सड़क के आसपास की मिट्टी कमजोर हो रही है, तो नियमित निरीक्षण में इन संकेतों की पहचान होनी चाहिए, लेकिन यहां स्थिति यह है कि जनता को मुख्य मार्ग बंद होने के बाद वैकल्पिक रास्ता तलाशना पड़ रहा है, यानी सरकारी व्यवस्था की निगरानी व्यवस्था वहां दिखाई नहीं दी,जहां उसे सबसे पहले दिखाई देना चाहिए था।
नेता प्रतिपक्ष लाल मुनि यादव ने सरकार पर साधा निशाना-पूर्व नगरपालिका अध्यक्ष एवं वर्तमान नेता प्रतिपक्ष लाल मुनि यादव ने पुलिया के क्षतिग्रस्त होने को लेकर सरकार और प्रशासन पर निशाना साधा है,उन्होंने कहा कि शिवपुर-चरचा मुख्य मार्ग क्षेत्र की करीब 25 हजार आबादी के लिए महत्वपूर्ण संपर्क मार्ग है,इसके बावजूद पुलिया की स्थिति को समय रहते गंभीरता से नहीं लिया गया, लाल मुनि यादव ने सवाल उठाया कि यदि पुलिया की स्थिति खराब थी तो समय रहते मरम्मत क्यों नहीं कराई गई और क्या प्रशासन किसी बड़े हादसे का इंतजार कर रहा था,उन्होंने मरीजों और आपातकालीन सेवाओं को लेकर तत्काल वैकल्पिक मार्ग उपलब्ध कराने की मांग की, साथ ही पुलिया का तकनीकी परीक्षण, मरम्मत अथवा पुनर्निर्माण तथा स्थायी समाधान होने तक सुरक्षित वैकल्पिक आवागमन की व्यवस्था करने की मांग रखी,उन्होंने कहा कि जनता को आश्वासन नहीं बल्कि तत्काल राहत और स्थायी समाधान चाहिए।
तकनीकी जांच से सामने आएगी असली तस्वीर-अब इस मामले में सबसे जरूरी कदम तकनीकी जांच है, पुलिया क्यों धंसी? निर्माण के समय कौन से तकनीकी मानक अपनाए गए? क्या निर्माण सामग्री और संरचना की गुणवत्ता की जांच हुई थी? पुलिया की भार वहन क्षमता कितनी थी? क्या भारी वाहनों के आवागमन का असर पड़ा? क्या जल निकासी व्यवस्था पर्याप्त थी? क्या निर्माण के बाद नियमित निरीक्षण हुआ? इन सवालों के जवाब तकनीकी जांच के बिना नहीं मिल सकते, इसलिए केवल जेसीबी लगाकर रास्ता खोल देना स्थायी समाधान नहीं होगा। पहले यह पता लगना जरूरी है कि संरचना विफल क्यों हुई।
जिम्मेदारी तय होगी या मामला मरम्मत तक सीमित रहेगा?-हर सरकारी निर्माण के बाद उसकी गुणवत्ता और सुरक्षा की जिम्मेदारी संबंधित एजेंसियों की होती है,यदि जांच में निर्माण संबंधी खामी सामने आती है तो केवल पुलिया की मरम्मत करना पर्याप्त नहीं होगा, जिम्मेदारी भी तय करनी होगी,क्योंकि यदि एक साल पुरानी संरचना तकनीकी रूप से विफल हो जाती है और उसके बाद केवल मरम्मत कराकर रास्ता खोल दिया जाता है,तो भविष्य में ऐसी घटना दोबारा होने की आशंका बनी रहेगी,जनता का सवाल इसलिए सिर्फ यह नहीं है कि पुलिया कब बनेगी? सवाल यह भी है कि पुलिया इस हालत में पहुंची क्यों?
सरकार के सामने अब दोहरी चुनौती- एक तरफ तत्काल आवागमन बहाल करना जरूरी है,दूसरी तरफ पुलिया के धंसने की वजह का पता लगाना भी उतना ही जरूरी है,तत्काल राहत के लिए सुरक्षित वैकल्पिक मार्ग को दुरुस्त करना होगा,स्कूल बसों और एंबुलेंस के लिए प्राथमिकता व्यवस्था बनानी होगी,दूसरी ओर पुलिया का तकनीकी परीक्षण कराकर यह तय करना होगा कि मरम्मत पर्याप्त है या पूरा पुनर्निर्माण आवश्यक है,यदि संरचना को केवल ऊपर से ठीक कर दिया गया और मूल तकनीकी समस्या बनी रही तो कुछ समय बाद फिर वही स्थिति पैदा हो सकती है।
चरचा पूछ रहा है…लाइफलाइन की निगरानी कौन करेगा?-चरचा की करीब 25 हजार आबादी के सामने फिलहाल सबसे बड़ा सवाल आवागमन का है,लेकिन इस घटना ने उससे भी बड़ा सवाल सरकारी व्यवस्था के सामने खड़ा किया है,क्या महत्वपूर्ण सड़कों और पुल-पुलियों की नियमित तकनीकी निगरानी होती है? क्या खराब होती संरचनाओं की सूची बनाकर समयबद्ध मरम्मत कराई जाती है? क्या निर्माण पूरा होने के बाद उसकी गुणवत्ता और सुरक्षा की वास्तविक जांच होती है? और अगर होती है तो एक साल के भीतर पुलिया के धंसने की नौबत कैसे आई? इन सवालों का जवाब अब सिर्फ अधिकारियों के बयान से नहीं,बल्कि दस्तावेजी और तकनीकी जांच से सामने आना चाहिए, फिलहाल शिवपुर-चरचा की लाइफलाइन बंद है, स्कूल बसों के पहिए प्रभावित हैं,रोजमर्रा का आवागमन बाधित है और मरीजों के लिए रास्ते को लेकर चिंता बनी हुई है,उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार स्थानीय जनप्रतिनिधियों ने वैकल्पिक मार्ग को सुगम बनाने के लिए मौके पर हस्तक्षेप भी किया है,अब जनता की नजर इस बात पर है कि प्रशासन सिर्फ गड्ढा भरकर रास्ता खोलता है या पुलिया के धंसने की जड़ तक पहुंचकर जिम्मेदारी भी तय करता है,क्योंकि चरचा को सिर्फ रास्ता नहीं चाहिए…उसे ऐसी सड़क और पुलिया चाहिए जिस पर अगली बारिश या अगला भारी वाहन गुजरते समय लोगों को यह डर न रहे कि सरकारी निर्माण फिर धंस जाएगा।
25 हजार लोगों का संपर्क प्रभावित-शिवपुर
चरचा मार्ग चरचा कॉलरी क्षेत्र को आसपास के प्रमुख मार्गों और राष्ट्रीय राजमार्ग से जोड़ने वाली महत्वपूर्ण कड़ी है, इस मार्ग से स्कूल जाने वाले बच्चे, कर्मचारी,व्यापारी,मरीज और रोजमर्रा के काम से निकलने वाले लोग नियमित रूप से आवागमन करते हैं,पुलिया धंसने के बाद मुख्य मार्ग पर वाहनों की आवाजाही पूरी तरह प्रभावित हो गई है,स्कूल बसों के पहिए थमने की स्थिति बनी है। रोजाना सामान लेकर आने-जाने वाले वाहनों को भी परेशानी का सामना करना पड़ रहा है,एक पुलिया का क्षतिग्रस्त होना सामान्य तकनीकी घटना मानकर इसे टाला जा सकता है,लेकिन जब वही पुलिया 25 हजार लोगों के दैनिक आवागमन की प्रमुख कड़ी हो तो इसकी जिम्मेदारी और गंभीर हो जाती है।
सालभर में ही सवालों के घेरे में निर्माण
इस पूरे मामले का सबसे गंभीर पहलू यह है कि उपलब्ध रिपोर्टों के मुताबिक संबंधित रेलवे अंडरब्रिज करीब एक वर्ष पहले ही बनाया गया था,इतनी कम अवधि में महत्वपूर्ण संरचना के क्षतिग्रस्त होकर धंसने से निर्माण गुणवत्ता, तकनीकी निगरानी और रखरखाव पर सवाल उठना स्वाभाविक है,अगर संरचना नई थी तो उसकी तकनीकी मजबूती की जांच किस स्तर पर हुई थी? निर्माण के दौरान गुणवत्ता की निगरानी किसने की? निर्माण पूर्ण होने के बाद इसका निरीक्षण कब-कब किया गया? क्या बारिश,भारी वाहनों या अन्य दबाव के प्रभाव का आकलन किया गया था? और यदि पुलिया में पहले से कोई कमजोरी थी तो उसे समय रहते चिन्हित क्यों नहीं किया गया? इन सवालों का जवाब केवल निरीक्षण रिपोर्ट से नहीं,बल्कि जिम्मेदारी तय करने वाली कार्रवाई से मिलना चाहिए।
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