- शैलेश-भानु के अनुभव से प्रशांत गुप्ता की नई सोच तक,भाजपा में टिकट को लेकर मंथन तेज
- बैकुंठपुर में भाजपा का टिकट संग्राम में पुराने अनुभव पर भरोसा या युवाओं को मिलेगा मौका?
- बैकुंठपुर भाजपा में टिकट की जंग में अनुभव बनाम युवा नेतृत्व,किसके नाम पर लगेगी मुहर?
- भाजपा के सामने बड़ा सवाल…पुराने चेहरे या नई पीढ़ी? बैकुंठपुर अध्यक्ष पद पर दावेदारों की लंबी कतार
- सीए प्रशांत गुप्ता समेत युवा चेहरों ने बढ़ाई दावेदारी,अनुभवी नेताओं के सामने नई चुनौती…
- बैकुंठपुर की कुर्सी पर किसका दावा मजबूत? शैलेश शिवहरे,भानु पाल से लेकर प्रशांत गुप्ता तक कई नाम चर्चा में…
- शैलेश शिवहरे,भानु पाल से लेकर सीए प्रशांत गुप्ता,कमलेश शर्मा और शारदा गुप्ता तक दावेदारों की लंबी कतार…
- पटना नगर पंचायत के चुनाव परिणाम को बताया जा रहा सबक,अब बैकुंठपुर में क्या पुराने अनुभव पर भरोसा करेगी भाजपा या नई पीढ़ी को सौंपेगी शहर की कमान?
-रवि सिंह-
बैकुंठपुर,19 सितम्बर 2026 (घटती-घटना)। दिसंबर 2026 में प्रस्तावित नगर पालिका चुनाव जैसे-जैसे करीब आता जा रहा है, बैकुंठपुर की राजनीति में सबसे बड़ा सवाल चुनाव जीतने से पहले टिकट का बनता जा रहा है,खासकर भाजपा के भीतर नगर पालिका अध्यक्ष पद को लेकर दावेदारों की बढ़ती संख्या ने संगठन के सामने ऐसा राजनीतिक गणित खड़ा कर दिया है,जिसमें एक ओर वर्षों से नगर की राजनीति में सक्रिय अनुभवी चेहरे हैं तो दूसरी ओर नई पीढ़ी के युवा दावेदार अपनी राजनीतिक जमीन तलाशते हुए सामने आ रहे हैं। इस बार अध्यक्ष पद अनारक्षित होने की स्थिति ने दावेदारों के लिए मैदान और बड़ा कर दिया है। चर्चा है कि करीब दो दर्जन नाम अध्यक्ष पद की दौड़ में अपनी-अपनी संभावनाएं तलाश रहे हैं,इनमें लंबे समय से नगर पालिका की राजनीति में सक्रिय शैलेश शिवहरे और भानु पाल जैसे अनुभवी चेहरे हैं, तो दूसरी तरफ सीए प्रशांत गुप्ता,पत्रकार कमलेश शर्मा और शारदा गुप्ता जैसे नाम भी चर्चा में हैं,ऐसे में भाजपा के सामने केवल उम्मीदवार चुनने की चुनौती नहीं है। असली चुनौती यह होगी कि किस चेहरे को टिकट देकर पार्टी शहर में भविष्य की राजनीति का संदेश देना चाहती है,क्या भाजपा एक बार फिर उस चेहरे पर भरोसा करेगी जिसके पास नगर की राजनीति का लंबा अनुभव है? या फिर पार्टी यह मानकर आगे बढ़ेगी कि बदलते राजनीतिक माहौल में युवाओं को मौका देना ही आने वाले वर्षों की मजबूत राजनीतिक नींव तैयार कर सकता है? यही सवाल इस समय बैकुंठपुर की चुनावी चर्चा के केंद्र में है।
शैलेश शिवहरे की दावेदारी अनुभव,संगठन और नगर राजनीति का लंबा सफर…
भाजपा के संभावित दावेदारों की चर्चा शैलेश शिवहरे के नाम के बिना पूरी नहीं होती,नगर पालिका अध्यक्ष पद की राजनीति में उनका लंबा अनुभव रहा है,करीब 15 वर्षों से नगर पालिका अध्यक्ष पद की राजनीति में सक्रिय रहने वाले शैलेश शिवहरे अध्यक्ष पद का चुनाव दो बार लड़ चुके हैं,एक बार उन्हें जीत मिली तो एक बार हार का सामना करना पड़ा,यही लंबा राजनीतिक अनुभव उनकी सबसे बड़ी ताकत माना जा रहा है। नगर पालिका के कामकाज, स्थानीय समीकरण,वार्ड स्तर की राजनीति और संगठन के भीतर की राजनीतिक गतिविधियों से उनकी पुरानी पहचान है,लेकिन इस बार उनके सामने एक अलग तरह की चुनौती है, राजनीतिक चर्चा में यह भी कहा जा रहा है कि वे सार्वजनिक तौर पर अध्यक्ष पद का चुनाव लड़ने की इच्छा से इनकार करते दिखाई देते हैं, लेकिन अंदरूनी स्तर पर उनकी दावेदारी को पूरी तरह समाप्त नहीं माना जा रहा। यही वजह है कि उनके नाम को लेकर चर्चा लगातार बनी हुई है, इतना ही नहीं, उनके परिवार की ओर से भी राजनीतिक निरंतरता की तस्वीर सामने आती है,उनकी पत्नी के नाम को भी अध्यक्ष पद की संभावित दावेदारी के रूप में देखा जा रहा है,ऐसे में सवाल सिर्फ यह नहीं रह जाता कि शैलेश शिवहरे मैदान में उतरेंगे या नहीं, बल्कि सवाल यह भी है कि क्या परिवार की राजनीतिक सक्रियता नगर पालिका की राजनीति में आगे भी बनी रहेगी? भाजपा यदि अनुभव को प्राथमिकता देती है तो शैलेश शिवहरे का नाम स्वाभाविक रूप से मजबूत दावेदारों में रहेगा, लेकिन अगर पार्टी नई पीढ़ी को मौका देने की रणनीति बनाती है, तो यही लंबा राजनीतिक अनुभव इस बार उनके सामने चुनौती भी बन सकता है।
कमलेश शर्मा : पत्रकारिता के अनुभव से राजनीति में नई संभावना
दावेदारों में पत्रकार कमलेश शर्मा का नाम भी सामने आ रहा है,पत्रकारिता का अनुभव किसी भी शहर की राजनीति में एक अलग तरह की राजनीतिक पूंजी बन सकता है,पत्रकार के तौर पर शहर की समस्याओं,जनता के सवालों और स्थानीय प्रशासन की कार्यप्रणाली से लगातार जुड़ाव रहने के कारण उन्हें शहर की जमीनी समस्याओं की समझ होने का दावा किया जा सकता है,हालांकि चुनावी राजनीति और पत्रकारिता दोनों की प्रकृति अलग है। इसलिए उनकी दावेदारी का वास्तविक परीक्षण संगठन, जनता और चुनावी समीकरणों के स्तर पर ही होगा,फिर भी उनकी मौजूदगी भाजपा के भीतर यह संकेत देती है कि अध्यक्ष पद की दौड़ अब केवल पारंपरिक राजनीतिक चेहरों तक सीमित नहीं रह गई है।
शारदा गुप्ता का नाम भी दावेदारों में…
भाजपा संगठन से जुड़ी शारदा गुप्ता का नाम भी अध्यक्ष पद के संभावित दावेदारों में चर्चा में है, संगठन से जुड़ाव किसी भी राजनीतिक दल में टिकट के लिए महत्वपूर्ण आधार माना जाता है, यदि भाजपा संगठनात्मक सक्रियता और पार्टी के भीतर लंबे समय के काम को महत्व देती है तो शारदा गुप्ता की दावेदारी भी समीकरण को प्रभावित कर सकती है,इस तरह देखा जाए तो भाजपा के सामने दावेदारों का एक ऐसा समूह है,जिसमें अनुभव,संगठन,युवा नेतृत्व,पेशेवर पृष्ठभूमि और स्थानीय पहचान…सभी तरह के विकल्प मौजूद हैं,यही विकल्पों की अधिकता अब भाजपा के लिए सबसे बड़ी ताकत भी है और सबसे बड़ी चुनौती भी।
दो दर्जन नाम,लेकिन टिकट एक : असली परीक्षा अब शुरू
अध्यक्ष पद की दौड़ में करीब दो दर्जन नामों की चर्चा अपने आप में बताती है कि भाजपा के भीतर इस पद को लेकर कितनी राजनीतिक दिलचस्पी है, लेकिन राजनीति में दावेदारों की संख्या जितनी ज्यादा होती है,टिकट मिलने के बाद असंतोष की संभावना भी उतनी ही बढ़ती है,भाजपा के सामने इसलिए दो चरणों की चुनौती होगी,पहला—उम्मीदवार का चयन, दूसरा—उम्मीदवार चयन के बाद सभी दावेदारों और उनके समर्थकों को एकजुट करना,किसी एक चेहरे को टिकट मिलने के बाद बाकी दावेदारों की राजनीतिक भूमिका क्या होगी,यह चुनाव परिणाम पर सीधा असर डाल सकता है, अगर पार्टी टिकट वितरण के बाद सभी दावेदारों को एक मंच पर लाने में सफल रहती है तो दावेदारों की लंबी सूची भाजपा के लिए ताकत में बदल सकती है,लेकिन यदि टिकट के बाद असंतोष,भीतरघात या गुटबाजी सामने आती है तो यही लंबी सूची पार्टी के लिए मुश्किल भी बन सकती है।
युवा बनाम पुराने चेहरे : बैकुंठपुर में उठ रहा बड़ा सवाल
बैकुंठपुर की राजनीति में इस बार सबसे महत्वपूर्ण बदलाव यह दिखाई दे रहा है कि युवाओं में राजनीतिक नेतृत्व को लेकर उत्साह बढ़ा है,शहर का एक वर्ग चाहता है कि अब 50 वर्ष से कम उम्र के चेहरों को आगे आने का मौका मिले,नई पीढ़ी की यह इच्छा केवल किसी एक व्यक्ति के पक्ष में नहीं है,बल्कि इसे व्यापक राजनीतिक बदलाव की मांग के रूप में देखा जा रहा है,युवा दावेदारों की बढ़ती सक्रियता से उन पुराने नेताओं के लिए भी चुनौती पैदा हो रही है जो वर्षों से नगर की राजनीति में अपनी जगह बनाए हुए हैं,सवाल यह नहीं है कि पुराने नेता योग्य हैं या नहीं,सवाल यह है कि क्या पार्टी भविष्य के नेतृत्व के लिए अभी से नए चेहरों को तैयार करने का जोखिम उठाएगी? यही सवाल भाजपा के टिकट चयन को निर्णायक बना सकता है।
पटना नगर पंचायत का चुनाव बना राजनीतिक सबक?
बैकुंठपुर की चुनावी चर्चा में पटना नगर पंचायत के हालिया चुनाव का उदाहरण भी महत्वपूर्ण तरीके से सामने आ रहा है,स्थानीय राजनीतिक विश्लेषण के अनुसार वहां भाजपा को नए चेहरों को अवसर देने से लाभ मिला और कई पुराने राजनीतिक चेहरों को जनता ने स्वीकार नहीं किया, इसे भाजपा के भीतर इस बात के सबक के रूप में देखा जा रहा है कि केवल लंबे समय तक राजनीति करने वाला होना ही चुनाव जीतने की गारंटी नहीं है, मतदाता अब यह भी देखता है कि उम्मीदवार के पास नई सोच क्या है, शहर के विकास को लेकर उसका दृष्टिकोण क्या है और वह भविष्य की चुनौतियों से कैसे निपटेगा,यदि भाजपा इस उदाहरण को गंभीरता से लेती है तो बैकुंठपुर में भी टिकट चयन के दौरान युवा चेहरों की संभावना बढ़ सकती है, लेकिन यह भी उतना ही महत्वपूर्ण है कि हर नगर की परिस्थितियां अलग होती हैं। इसलिए पटना के प्रयोग को हूबहू बैकुंठपुर में लागू करना भी आसान नहीं होगा, फिर भी यह उदाहरण भाजपा के सामने एक सवाल जरूर रखता है…क्या हर बार पुराने राजनीतिक समीकरण ही चुनाव जिताने के लिए पर्याप्त हैं?
टिकट किसी एक को,लेकिन चुनाव सभी को मिलकर लड़ना होगा
भाजपा की सबसे बड़ी परीक्षा टिकट घोषित होने के बाद होगी, करीब दो दर्जन दावेदारों में से एक को टिकट मिलेगा। बाकी को अपनी दावेदारी छोड़कर पार्टी प्रत्याशी के पक्ष में खड़ा होना होगा,यहीं संगठन की असली क्षमता सामने आएगी,यदि शैलेश शिवहरे,भानु पाल,प्रशांत गुप्ता,कमलेश शर्मा,शारदा गुप्ता और अन्य संभावित दावेदारों के समर्थकों को पार्टी एकजुट करने में सफल रही तो टिकट विवाद चुनावी ताकत में बदल सकता है,लेकिन यदि टिकट के बाद दावेदारों के बीच असंतोष कायम रहा तो विपक्षी दलों को इसका फायदा उठाने का अवसर मिल सकता है,इसलिए उम्मीदवार चुनना भाजपा की पहली परीक्षा होगी और उम्मीदवार के पीछे पूरी पार्टी को खड़ा करना दूसरी और उससे भी बड़ी परीक्षा।
अब सवाल सिर्फ कौन जीतेगा का नहीं,किसे मौका मिलेगा का है…
बैकुंठपुर नगर पालिका चुनाव की राजनीति अब धीरे-धीरे उस मुकाम पर पहुंच रही है जहां हर दावेदार अपनी राजनीतिक संभावना तलाश रहा है,एक तरफ शैलेश शिवहरे का लंबा राजनीतिक अनुभव है। दूसरी तरफ भानु पाल की नगर राजनीति में सक्रियता है,वहीं सीए प्रशांत गुप्ता नई पीढ़ी,शिक्षा और पेशेवर सोच का चेहरा बनकर सामने आ रहे हैं, कमलेश शर्मा पत्रकारिता के अनुभव के साथ दावेदारी में हैं और शारदा गुप्ता संगठनात्मक आधार के साथ संभावित विकल्प हैं,इसके अलावा भी कई नाम टिकट की दौड़ में हैं, लेकिन अंतिम निर्णय में सबसे बड़ा सवाल यही रहेगा कि भाजपा अतीत के अनुभव को प्राथमिकता देती है या भविष्य के नेतृत्व को, यदि पार्टी पुराने चेहरों पर भरोसा करती है तो चुनाव का संदेश होगा कि भाजपा अनुभव और स्थापित राजनीतिक नेटवर्क को अभी भी सबसे महत्वपूर्ण मानती है,अगर प्रशांत गुप्ता जैसे युवा चेहरे को अवसर मिलता है तो यह संदेश जाएगा कि पार्टी अब नगर की राजनीति में नई पीढ़ी को नेतृत्व सौंपने का प्रयोग करना चाहती है,और यदि किसी अन्य नए चेहरे पर दांव लगाया जाता है तो यह भी भाजपा की रणनीतिक सोच में बदलाव का संकेत माना जाएगा।
सबसे बड़ा सवाल : बैकुंठपुर में भाजपा का अगला चेहरा कौन?
दिसंबर का चुनाव अभी दूर है,लेकिन टिकट की राजनीति ने बैकुंठपुर में चुनावी तापमान बढ़ा दिया है,दावेदारों की बढ़ती संख्या ने भाजपा को एक ओर मजबूत विकल्प दिए हैं तो दूसरी ओर निर्णय को कठिन भी बना दिया है,शैलेश शिवहरे के पास अनुभव है,भानु पाल के पास लंबी नगर राजनीति है,प्रशांत गुप्ता के पास युवा और पेशेवर चेहरा होने की संभावना है,कमलेश शर्मा के पास शहर को देखने-समझने का पत्रकारिता अनुभव है और शारदा गुप्ता के पास संगठनात्मक जुड़ाव का आधार है,अब फैसला भाजपा को करना है कि वह इनमें से किस राजनीतिक संदेश के साथ चुनाव मैदान में उतरना चाहती है,क्या बैकुंठपुर में पुराने राजनीतिक अनुभव की वापसी होगी? क्या युवा चेहरों को अवसर देकर भाजपा नई राजनीतिक पारी शुरू करेगी? क्या सीए प्रशांत गुप्ता जैसे चेहरे को आगे बढ़ाकर पार्टी नई सोच और नई पीढ़ी का संदेश देगी? या फिर संगठन कोई ऐसा नाम सामने लाएगा जो इन सभी राजनीतिक समीकरणों को पीछे छोड़कर सभी गुटों को साथ लेकर चल सके? फिलहाल सबसे स्पष्ट बात यही है कि बैकुंठपुर नगर पालिका चुनाव में भाजपा के लिए असली मुकाबला विपक्ष से पहले अपने भीतर है,टिकट की दौड़ में जितने ज्यादा चेहरे हैं,उतनी ही बड़ी जिम्मेदारी संगठन की है,एक गलत चयन असंतोष को जन्म दे सकता है और एक संतुलित चयन पूरे संगठन को चुनावी ताकत में बदल सकता है,इसलिए बैकुंठपुर में आने वाला नगर पालिका चुनाव केवल अध्यक्ष पद की कुर्सी का चुनाव नहीं माना जा रहा,यह भाजपा के लिए पुराने और नए नेतृत्व के बीच संतुलन,संगठन की निर्णय क्षमता और जनता के बदलते राजनीतिक मूड को समझने की परीक्षा भी बनने जा रहा है,अब नजर इस बात पर है कि भाजपा बैकुंठपुर को अपना अगला राजनीतिक चेहरा किसे बनाती है…अनुभव को, संगठन को या नई पीढ़ी की नई सोच को।
भानु पाल भी मजबूत दावेदार,कई बार पार्षद रहने का अनुभव
दावेदारों की सूची में दूसरा प्रमुख नाम भानु पाल का है,वे कई बार पार्षद रह चुके हैं और नगर पालिका तथा भाजपा की राजनीति में उनका लंबा अनुभव है, अध्यक्ष पद के लिए उनकी दावेदारी का आधार भी यही राजनीतिक अनुभव है,लंबे समय तक वार्ड और नगर स्तर पर सक्रिय रहने के कारण उन्हें स्थानीय समस्याओं और राजनीतिक समीकरणों की समझ रखने वाला चेहरा माना जाता है,लेकिन यहां भी वही सवाल सामने आता है…क्या भाजपा इस बार अनुभव को प्राथमिकता देगी या अनुभव के साथ-साथ नई राजनीतिक ऊर्जा को महत्व देगी? भानु पाल जैसे पुराने राजनीतिक चेहरे के पक्ष में सबसे बड़ा तर्क यही हो सकता है कि नगर पालिका की जटिल राजनीति को समझने और उसे संभालने के लिए अनुभव जरूरी है,वहीं विरोधी तर्क यह हो सकता है कि यदि पार्टी हर बार पुराने चेहरों पर ही भरोसा करेगी तो नई पीढ़ी के लिए राजनीतिक नेतृत्व का रास्ता कब खुलेगा? यही द्वंद्व इस बार भाजपा के टिकट चयन को खास बना रहा है।
सीए प्रशांत गुप्ताः युवा चेहरे की दावेदारी ने बदला चुनावी विमर्श
भाजपा के संभावित दावेदारों में सीए प्रशांत गुप्ता का नाम इस पूरे समीकरण को सबसे ज्यादा अलग दिशा देता दिखाई देता है,प्रशांत गुप्ता की दावेदारी सिर्फ इसलिए महत्वपूर्ण नहीं है कि वे युवा हैं,उनकी पहचान शिक्षित,पेशेवर और नई सोच वाले चेहरे के रूप में सामने आती है,उनके परिवार का भाजपा से पुराना जुड़ाव भी उनकी राजनीतिक दावेदारी को एक अलग आधार देता है, यही वजह है कि यदि भाजपा इस बार युवा नेतृत्व को आगे बढ़ाने का निर्णय लेती है तो प्रशांत गुप्ता का नाम गंभीर विकल्प के तौर पर देखा जा सकता है,नगर राजनीति में लंबे समय से सक्रिय नेताओं के बीच किसी पेशेवर और युवा चेहरे का सामने आना अपने आप में एक राजनीतिक संदेश देता है, यह संदेश यह हो सकता है कि शहर को अब ऐसी राजनीति की जरूरत है जो केवल पारंपरिक राजनीतिक समीकरणों तक सीमित न रहे,बल्कि शहरी विकास, योजनाबद्ध कामकाज और भविष्य की जरूरतों को केंद्र में रखे,प्रशांत गुप्ता की दावेदारी का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यही है कि वे भाजपा के सामने पुराना अनुभव बनाम नई सोच का सवाल खड़ा करते हैं, अगर भाजपा का नेतृत्व यह मानता है कि आने वाले समय में नगर की राजनीति को युवा और शिक्षित नेतृत्व की जरूरत है,तो प्रशांत गुप्ता उस रणनीति के लिए उपयुक्त चेहरा हो सकते हैं, दूसरी ओर,यदि पार्टी का आकलन यह रहता है कि चुनावी राजनीति में पुराने संगठनात्मक नेटवर्क और लंबे अनुभव का कोई विकल्प नहीं है,तो फिर अनुभवी दावेदारों को प्राथमिकता मिल सकती है, इसलिए प्रशांत गुप्ता की दावेदारी को केवल एक और नाम मानना सही नहीं होगा,उनका नाम भाजपा के संभावित नेतृत्व परिवर्तन की बहस के केंद्र में है।
एमएलए फेस की राजनीति का असर नगर चुनाव पर कितना?
भाजपा की राजनीति में नेतृत्व चयन को लेकर बदलाव की चर्चा भी इस चुनाव में महत्वपूर्ण हो सकती है,स्थानीय स्तर पर यह बात कही जा रही है कि पार्टी अब कई जगहों पर पुराने समीकरणों से आगे बढ़कर नेतृत्व के नए चेहरों और बड़े राजनीतिक नेतृत्व के साथ तालमेल बैठाने वाले विकल्पों पर भी विचार कर रही है,यदि बैकुंठपुर में भी ऐसा प्रयोग होता है तो टिकट चयन में स्थानीय स्तर पर लंबे समय से प्रभाव रखने वाले चेहरों के बजाय अपेक्षाकृत नए चेहरे को अवसर मिल सकता है,यही स्थिति प्रशांत गुप्ता जैसे युवा दावेदारों के लिए राजनीतिक संभावना पैदा करती है, हालांकि अंतिम फैसला संगठन को ही करना है और अभी किसी नाम को आधिकारिक उम्मीदवार मानना जल्दबाजी होगी।
भाजपा के लिए चुनाव सिर्फ नगर पालिका का नहीं,जनमत का भी परीक्षण
भाजपा के सामने इस चुनाव का महत्व इसलिए भी बड़ा है क्योंकि पार्टी राज्य की सत्ता में है। ऐसे में नगर पालिका चुनाव को केवल स्थानीय चुनाव मानकर नहीं चलाया जा सकता,नगर की जनता सड़क,नाली, सफाई,पानी,प्रकाश,विकास कार्य और प्रशासनिक व्यवस्था जैसे मुद्दों पर स्थानीय जनप्रतिनिधियों का मूल्यांकन करती है। इसलिए भाजपा जिस उम्मीदवार को मैदान में उतारेगी,उसके साथ पार्टी की सरकार और संगठन की छवि भी किसी न किसी रूप में जुड़ेगी,यही वजह है कि अध्यक्ष पद के उम्मीदवार का चयन केवल जातीय,व्यक्तिगत या पुराने राजनीतिक समीकरणों के आधार पर करने के बजाय जीतने की क्षमता,जनस्वीकार्यता, संगठनात्मक स्वीकार्यता और भविष्य के नेतृत्व के संतुलन से करना पार्टी के लिए महत्वपूर्ण होगा।
घटती-घटना – Ghatati-Ghatna – Online Hindi News Ambikapur घटती-घटना – Ghatati-Ghatna – Online Hindi News Ambikapur