

- धान की खरीदी,जमीन की रजिस्ट्री और समिति के चेहरे-शिवप्रसादनगर में ‘कनेक्शन’ का रहस्य गहराया
- शिवप्रसादनगर में रिकॉर्ड कुछ और कहानी कह रहे,सवाल कुछ और—हदीस मोहम्मद,साधना कुशवाहा,रिजवान और मोहम्मद सोहराब के नामों की कडि़यां जांच के घेरे में…
- धान खरीदी से जमीन तक पहुंची ‘सहकारिता’ की कहानी,शिवप्रसादनगर में हदीस अंसारी और समिति से जुड़े नामों ने बढ़ाए सवाल…
- समिति प्रभारी,धान खरीदी प्रभारी और हदीस अंसारी के बीच जमीन की साझेदारी?
- सहकारिता विभाग की भूमिका पर उठे सवाल किसान के धान पर नियमों की पहरेदारी,जमीन के सौदों पर ‘सहकारिता’ की मेहरबानी?
- धान का हिसाब पूछो तो फाइल बंद, जमीन का हिसाब देखो तो नाम ही नाम—शिवप्रसादनगर में सहकारिता का नया गणित
- धान किसान का,जमीन साझीदारों की—शिवप्रसादनगर समिति में कागजों ने खोली ‘सहकारिता’ की पोल…
- धान खरीदी केंद्र से जमीन की रजिस्ट्री तक पहुंचा कनेक्शन, शिवप्रसादनगर में सहकारिता विभाग की चुप्पी पर तंज
- धान खरीदी से जमीन तक पहुंचा ‘सहकारिता’ का कनेक्शन! शिवप्रसादनगर में 7.7 एकड़ भूमि, 205 क्विंटल धान और समिति से जुड़े नामों ने खड़े किए गंभीर सवाल
- हदीस अंसारी,समिति प्रभारी मोहम्मद सोहराब तथा धान खरीदी प्रभारी बताए जा रहे साधना कुशवाहा-रिजवान के बीच जमीन के लेनदेन की कडि़यां जांच के घेरे में,जमीन रिकॉर्ड ने बढ़ाई हलचल
-ओंकार पाण्डेय-
सूरजपुर/भैयाथान,13 अगस्त 2026 (घटती-घटना)। सहकारिता विभाग का उद्देश्य किसानों को बिचौलियों से बचाना है,लेकिन सूरजपुर जिले के भैयाथान क्षेत्र की आदिम जाति सेवा सहकारी समिति शिवप्रसादनगर से जुड़े दस्तावेजों को देखकर ऐसा लगता है कि यहां कहानी कुछ उलटी चल रही है, किसान को अपनी फसल बेचने के लिए नियमों की लंबी कतार पार करनी पड़ती है, जबकि जमीन,फसल और समिति से जुड़े नामों की कडि़यां सामने आने पर सवाल यह उठता है कि कहीं व्यवस्था के दरवाजे कुछ लोगों के लिए अपेक्षाकृत आसान तो नहीं हैं? यह सवाल इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि उपलब्ध दस्तावेजों में एक ओर भूमि रिकॉर्ड में हदीस मोहम्मद और मोहम्मद सोहराब जैसे नाम दिखाई देते हैं, दूसरी ओर उपयोगकर्ता द्वारा उपलब्ध कराए गए विवरण में साधना कुशवाहा और रिजवान को धान खरीदी व्यवस्था से जुड़ा बताया गया है,और इसी पृष्ठभूमि में जमीन की खरीद-बिक्री तथा धान खरीदी के रिकॉर्ड को लेकर गंभीर सवाल उठ रहे हैं, व्यंग्य यही है कि किसान अगर एक बोरा धान में नमी ज्यादा कर दे तो व्यवस्था की नजरें तेज हो जाती हैं, लेकिन जमीन, फसल और समिति से जुड़े रिकॉर्ड एक साथ दिखाई दें तो वही व्यवस्था अचानक चश्मा उतारकर बैठ जाती है!
कहानी धान की है या जमीन की?
शिवप्रसादनगर समिति को लेकर उठ रहे सवालों का केंद्र अब सिर्फ धान खरीदी नहीं रहा, मामला जमीन के रिकॉर्ड तक पहुंच गया है,उपलब्ध रिकॉर्ड में ग्राम भंवराही,तहसील भैयाथान,जिला सूरजपुर के खसरा नंबर 188/2 का रकबा 0.6000 हेक्टेयर दर्ज है,रिकॉर्ड में संबंधित खातेदारों में हदीस मोहम्मद और मोहम्मद सोहराब के नाम दिखाई देते हैं, यानी जमीन के रिकॉर्ड ने खुद एक ऐसा सवाल खड़ा कर दिया है जिसे अब किसी राजनीतिक बयान या मौखिक आरोप से दबाया नहीं जा सकता, और मजेदार बात यह है कि यही रिकॉर्ड पीएसीएस शिव प्रसादनगर से संबंधित बैंक विवरण भी दिखाता है तथा उसमें 01 मई 2025 से संबंधित बैंक कनेक्शन का उल्लेख है, अब सवाल यह है कि जमीन का मालिक कौन,फसल किसकी,किसान पंजीयन किसका और समिति से संबंध किसका? अगर सब कुछ सामान्य है तो जवाब देने में दिक्कत कैसी?
खसरा 188/2 की कहानी में धान भी है और नाम भी…
उपलब्ध कृषि रिकॉर्ड में खसरा 188/2, रकबा 0.6000 हेक्टेयर तथा संबंधित कृषि विवरण दर्ज हैं,रिकॉर्ड में हदीस मोहम्मद और सोहराब से जुड़े नाम दिखाई देते हैं, एक अन्य उपलब्ध रिकॉर्ड में भी इसी खसरे का रकबा 0.6000 हेक्टेयर दर्ज है और ग्राम, तहसील तथा जिला विवरण शिवप्रसादनगर-भैयाथान-सूरजपुर से संबंधित है,अब यहां पत्रकारिता का सबसे सरल सवाल खड़ा होता है—अगर जमीन सामान्य है तो उसकी जांच सामान्य तरीके से कर दीजिए,अगर धान सामान्य है तो उसकी खरीदी का रिकॉर्ड दिखा दीजिए,और अगर समिति की भूमिका सामान्य है तो समिति की पूरी कार्यवाही सामने रख दीजिए,फिर आखिर परेशानी किस बात की?
समिति प्रभारी और खरीदीप्रभारी के साथ जमीन संयोग कितना बड़ा है?
उपलब्ध जानकारी में साधना कुशवाहा और रिजवान को धान खरीदी प्रभारी तथा मोहम्मद सोहराब को समिति प्रभारी बताया गया है,इसी पृष्ठभूमि में हदीस अंसारी के साथ जमीन के सह-स्वामित्व अथवा खरीद-बिक्री के संबंध सामने आने की बात कही जा रही है,यहां भी सवाल जमीन खरीदने के अधिकार पर नहीं है,कोई भी पात्र व्यक्ति जमीन खरीद सकता है, असली सवाल है—क्या धान खरीदी व्यवस्था से जुड़े व्यक्ति और धान कारोबार से जुड़े बताए जा रहे व्यक्ति के बीच संपत्ति संबंध हैं? अगर हैं तो—क्या विभाग को इसकी जानकारी थी? क्या किसी स्तर पर हितों के टकराव की जांच हुई? क्या संबंधित व्यक्तियों की संपत्ति और आय के स्रोत का परीक्षण हुआ? क्या खरीदी अवधि और जमीन खरीद की तारीखों का मिलान किया गया? अगर नहीं हुआ तो फिर सहकारिता की निगरानी व्यवस्था आखिर कर क्या रही थी?
हदीस अंसारी की पकड़ का सवाल भी यहीं से उठता है…
क्षेत्र में हदीस अंसारी को लेकर धान कारोबार में प्रभावशाली व्यक्ति होने के आरोप लगाए जाते रहे हैं,आरोप यह भी है कि उनके प्रभाव के अनुसार कुछ समितियों में समिति प्रबंधक और धान खरीदी प्रभारी की भूमिका प्रभावित होती रही,ये आरोप हैं, प्रमाणित निष्कर्ष नहीं,लेकिन यदि किसी व्यक्ति को लेकर वर्षों से ऐसी चर्चा है और उसी व्यक्ति का नाम समिति से जुड़े लोगों के साथ भूमि रिकॉर्ड में सामने आता है,तो विभाग के लिए जांच करना मुश्किल काम नहीं होना चाहिए,आखिर सहकारिता विभाग के पास रिकॉर्ड हैं,कौन समिति में है? कौन खरीदी प्रभारी है? किसने किसान पंजीयन किया? किसने सत्यापन किया? किसके हस्ताक्षर हैं? किसके खाते में भुगतान हुआ? किसके नाम जमीन है? बस फाइल खोलनी है।
7.7 एकड़ जमीन ने क्यों बढ़ाई बेचैनी?
पूर्व मामले में उपलब्ध जानकारी के अनुसार ग्राम सोनपुर की करीब 3.13 हेक्टेयर यानी 7.7 एकड़ कृषि भूमि के संबंध में हदीस मोहम्मद,रिजवान अंसारी और साधना कुशवाहा के नाम सामने आने की बात कही गई है, बताए गए खसरों में 397,398/1,496/2,497/1,591/3,595/1, 595/6,595/7,596/1,596/2,672/1,673/2,677/1 और 686 शामिल हैं, यहां फिर वही व्यंग्य लौटता है किसान की जमीन अगर दो नामों में हो तो राजस्व रिकॉर्ड में सवाल,तीन नामों में हो तो दस्तावेज,लेकिन समिति से जुड़े लोगों और धान कारोबार से जुड़े व्यक्ति के नाम एक साथ दिखें तो इसे जांचने के लिए शायद एक और समिति बनानी पड़े! भूमि का वास्तविक बाजार मूल्य रजिस्ट्री और स्थानीय दरों से ही निर्धारित होगा,इसलिए इसे सीधे करोड़ों की संपत्ति कहना उचित नहीं होगा, लेकिन 7.7 एकड़ कृषि भूमि का एक साथ कई नामों में जाना अपने आप में इतना बड़ा तथ्य जरूर है कि संबंधित रजिस्ट्री,भुगतान और नामांतरण की जांच की जाए।
धान बोया किसने और खरीदा किसने-205 क्विंटल का सवाल…
इस मामले की सबसे महत्वपूर्ण कड़ी 205 क्विंटल धान से जुड़ी बताई जा रही है, उपलब्ध जानकारी के अनुसार फसल की बुआई अगस्त 2025 में हुई और जमीन का विक्रय नवंबर 2025 में हुआ, इसके बाद किसान सूचना पोर्टल में फसल सत्यापन/प्राप्ति संबंधी प्रविष्टि दिखाई देने और 205 क्विंटल धान शिवप्रसादनगर खरीदी केंद्र में नए भू-स्वामियों के नाम से खरीदे जाने का दावा है,यदि रिकॉर्ड की तारीखें यही हैं,तो सवाल बिल्कुल सीधा है-जिस समय फसल बोई गई थी, उस समय जमीन किसके नाम थी? और उसके बाद—धान बेचने का अधिकार किस आधार पर तय हुआ? यहां किसी व्यक्ति को दोषी घोषित करना उद्देश्य नहीं है,लेकिन किसान पंजीयन,भूमि रिकॉर्ड,फसल पंजीयन,डीसीएस सत्यापन,धान खरीदी और भुगतान की तारीखों का मिलान होना चाहिए,क्योंकि सरकारी पोर्टल में तारीखें केवल सजावट के लिए नहीं होतीं।
आयकर विभाग की कार्रवाई का दावा—फिर जमीन खरीद का धन कहां से आया?
इस पूरे प्रकरण में एक और गंभीर आरोप यह है कि हदीस अंसारी के बैंक खातों पर आयकर विभाग की कार्रवाई के बाद लेनदेन पर रोक लगी थी और उनसे बड़ी राशि की रिकवरी का मामला था,इस दावे की स्वतंत्र पुष्टि के लिए आयकर विभाग के आदेश,बैंक रिकॉर्ड और संबंधित कार्रवाई के दस्तावेज देखना आवश्यक है,उपलब्ध कृषि दस्तावेज अकेले इस दावे को प्रमाणित नहीं करते,लेकिन यदि ऐसा आदेश वास्तव में मौजूद है, तो फिर भूमि खरीद के समय भुगतान का स्रोत जांच का बेहद महत्वपूर्ण विषय बन जाता है,रजिस्ट्री में पैसा कहां से आया? किस बैंक खाते से गया? किसने भुगतान किया? क्या भुगतान बैंकिंग माध्यम से हुआ? क्या किसी तीसरे व्यक्ति के खाते का इस्तेमाल हुआ? ये सवाल आयकर और प्रवर्तन से जुड़े रिकॉर्ड से आसानी से जांचे जा सकते हैं।
सहकारिता विभाग के लिए सबसे असहज सवाल…
सहकारिता व्यवस्था में ऊपर से नीचे तक निगरानी की व्यवस्था है, संभागीय स्तर से लेकर जिला और समिति स्तर तक अधिकारी मौजूद हैं,फिर यदि किसी समिति में लगातार धान खरीदी में अनियमितता के आरोप,धान शॉर्टेज के सवाल, परिवहन रिकॉर्ड पर सवाल,किसान पंजीयन पर सवाल,समिति कर्मचारियों की भूमिका पर सवाल और अब जमीन के लेनदेन से जुड़े सवाल एक साथ उठ रहे हैं,तो यह पूछना जरूरी है कि निरीक्षण के दौरान अधिकारियों ने क्या देखा? क्या उन्होंने केवल रजिस्टर देखा? अगर हां, तो रजिस्टर में सब ठीक मिला होगा,लेकिन जमीन का रिकॉर्ड रजिस्टर के बाहर भी होता है, यही वह जगह है जहां सरकारी फाइल और जमीन की मिट्टी आमने-सामने खड़ी हो जाती है।
कागजों में धान चलता है,जमीन पर पैसा चलता है-बीच में किसान कहां है?
सहकारी समिति की व्यवस्था में कागजों का महत्व बहुत है,लेकिन जब कागजों में एक किसान,जमीन के रिकॉर्ड में दूसरा नाम और धान खरीदी में तीसरा नाम दिखाई दे तो सवाल उठता है कि व्यवस्था किसे किसान मानती है? आम किसान को अपनी जमीन,फसल,पंजीयन,आधार,बैंक खाता और दस्तावेज लेकर घूमना पड़ता है,लेकिन यदि किसी मामले में जमीन का स्वामित्व बदलने के बाद फसल संबंधी रिकॉर्ड भी नए नामों के साथ जुड़ता दिखाई दे,तो सवाल पूछना स्वाभाविक है,कहीं ऐसा तो नहीं कि किसान के लिए नियम लोहे की सलाख हैं और प्रभावशाली लोगों के लिए वही नियम रबर की पट्टी?
धान शॉर्टेज और जमीन खरीद-दोनों का आपस में संबंध है या महज संयोग?
शिवप्रसादनगर समिति को लेकर धान की कमी और शॉर्टेज से संबंधित आरोप भी सामने आते रहे हैं,यदि वास्तव में किसी सीजन में धान की बड़ी कमी हुई है तो उसकी जांच के लिए खरीदी से लेकर मिलर तक पूरा स्टॉक ट्रैक किया जाना चाहिए, और यदि उसी अवधि में समिति तथा धान खरीदी व्यवस्था से जुड़े लोगों के नाम पर बड़ी भूमि खरीद होती है,तो दोनों घटनाओं को कम से कम जांच के दौरान एक साथ रखकर देखना चाहिए,यह कहना कि धान की कमी का पैसा जमीन में लगा,बिना वित्तीय जांच के उचित नहीं होगा,लेकिन यह पूछना पूरी तरह उचित है कि—क्या दोनों घटनाओं के बीच कोई वित्तीय संबंध है?
अब जांच सिर्फ समिति की नहीं,पूरी चेन की होनी चाहिए…
अगर प्रशासन सचमुच इस मामले की तह तक जाना चाहता है तो केवल समिति प्रबंधक से जवाब मांगना पर्याप्त नहीं होगा,जांच में राजस्व रिकॉर्ड,रजिस्ट्री,नामांतरण,किसान पंजीयन,किसान सूचना पोर्टल,डीसीएस सत्यापन,खरीदी रजिस्टर,स्टॉक रजिस्टर,परिवहन दस्तावेज,बैंक भुगतान और संबंधित खातों का मिलान होना चाहिए, साथ ही यह भी देखा जाना चाहिए कि जमीन खरीद की रकम किस माध्यम से दी गई,खासकर खसरा 188/2 के मामले में उपलब्ध रिकॉर्ड में 0.6000 हेक्टेयर भूमि तथा हदीस मोहम्मद और मोहम्मद सोहराब से संबंधित विवरण सामने आते हैं,दूसरी ओर रिकॉर्ड में पीएसीएस शिवप्रसादनगर से संबंधित बैंक कनेक्शन भी दर्ज है, अब विभाग को केवल इतना बताना है कि इन रिकॉर्डों की वास्तविक प्रशासनिक स्थिति क्या है।
सवालों की फसल खूब है, अब जवाब की कटाई कब होगी?
शिवप्रसादनगर समिति की कहानी फिलहाल ऐसी फसल बन गई है जिसमें धान से ज्यादा सवाल उग आए हैं,एक तरफ 7.7 एकड़ जमीन, दूसरी तरफ 205 क्विंटल धान,एक तरफ हदीस मोहम्मद का नाम,दूसरी तरफ साधना कुशवाहा और रिजवान के नाम, एक तरफ समिति प्रभारी मोहम्मद सोहराब, दूसरी तरफ खसरा 188/2 का रिकॉर्ड,और बीच में सहकारिता विभाग की निगरानी व्यवस्था, अब यदि यह सब सामान्य है तो इससे अच्छी खबर क्या होगी? विभाग बस दस्तावेज सार्वजनिक कर दे,बताए—जमीन कब खरीदी गई? किसने खरीदी? पैसा किसने दिया? फसल किसने बोई? किसके नाम पंजीयन हुआ? डीसीएस ने किसका सत्यापन किया? 205 क्विंटल किसके नाम खरीदा गया? भुगतान किसे हुआ? और समिति से जुड़े व्यक्तियों की जमीन खरीद का धान खरीदी से कोई संबंध है या नहीं? इतने सवालों के जवाब मिल जाएं तो व्यंग्य भी समाप्त और कहानी भी समाप्त।
सबसे बड़ा सवाल : संयोगों की संख्या इतनी ज्यादा कैसे हो गई?
किसी एक व्यक्ति का जमीन खरीदना सामान्य है,किसी समिति कर्मचारी का जमीन खरीदना भी सामान्य है,किसी किसान के नाम फसल दर्ज होना भी सामान्य है,धान खरीदी होना भी सामान्य है,लेकिन जब जमीन,फसल,समिति, खरीदी प्रभारी,समिति प्रभारी और धान कारोबार से जुड़े बताए जा रहे व्यक्ति एक ही कहानी के अलग-अलग पन्नों पर बार-बार दिखाई दें,तब पत्रकारिता का काम निष्कर्ष सुनाना नहीं बल्कि फाइल खोलने का सवाल करना है,और फिलहाल शिवप्रसादनगर में यही सवाल सबसे बड़ा है— यह सिर्फ संयोगों की कहानी है या सहकारिता के भीतर किसी बड़े गठजोड़ की? इसका जवाब कागजों से ही निकलेगा—और इस बार कागजों को बोलना पड़ेगा।
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