

- आजादी का पर्व करीब,कोरिया कलेक्टरेट में 25 साल पुरानी ‘गुलामी’ कब खत्म होगी?
- कलेक्टर बदले,सरकारें बदलीं,आदेश बदले…नहीं बदली तो 25 साल पुरानी स्टेनो की कुर्सी!
- 15 अगस्त से पहले प्रशासन के लिए आखिरी परीक्षा—क्या 25 साल पुरानी प्रतिनियुक्ति होगी समाप्त?
- 25 साल से एक ही कुर्सी पर ‘स्थायी मेहमान’,क्या 15 अगस्त से पहले होगी मूल विभाग में वापसी?
- 3 साल में डेस्क बदलने का शासनादेश के बाद क्या कोरिया में 25 साल पुरानी कुर्सी बदलेगी?
- कमिश्नर का अनोखा पदस्थापना आदेश…कोरिया में पदस्थ स्टेनोग्राफर का काम एमसीबी में,वेतन कोरिया से,वर्षों से जमे स्टेनो टू कलेक्टर पर अब शासन की नई व्यवस्था की अग्निपरीक्षा
- एक पद,तीन जिले और 25 साल पुराना सवाल-आखिर कोरिया में चल क्या रहा है?
- जशपुर के स्टेनोग्राफर को कोरिया में पदस्थापना,काम एमसीबी में, कोरिया के पदोन्नत स्टेनोग्राफर को भी नई जिम्मेदारी—पुरानी व्यवस्था पर कब होगी निर्णायक समीक्षा?
- मत्स्य विभाग से जुड़े घनश्याम मिश्रा के वर्षों पुराने संलग्नीकरण/प्रतिनियुक्ति प्रकरण के बीच 3 अगस्त का नया शासन आदेश भी महत्वपूर्ण
-रवि सिंह-
बैकुण्ठपुर,13 अगस्त 2026 (घटती-घटना)। देश 15 अगस्त को आजादी का पर्व मनाने की तैयारी कर रहा है,लेकिन कोरिया कलेक्टरेट में करीब 25 वर्षों से जारी एक प्रतिनियुक्ति को लेकर सवाल अब भी जस के तस खड़े हैं,एक ओर शासन-प्रशासन तबादले,पदस्थापना और लंबे समय से एक ही स्थान पर जमे कर्मचारियों को हटाने की व्यवस्था की बात करता है,वहीं दूसरी ओर कलेक्टर कार्यालय के स्टेनो पद पर वर्षों से जमे मत्स्य विभाग से जुड़े कर्मचारी की व्यवस्था अब तक क्यों नहीं बदली—यह सवाल लगातार उठ रहा है, ऐसे में जिले में चर्चा है कि क्या 15 अगस्त से पहले कलेक्टर कार्यालय इस कथित ‘आजीवन प्रतिनियुक्ति’ से आजाद हो पाएगा, या फिर 25 साल पुरानी यह व्यवस्था एक और साल अपनी ‘आजादी’ मनाएगी? क्योकि सरकारी फाइलों में शब्द बहुत कुछ कहते हैं,लेकिन कई बार उन शब्दों के बीच छिपी व्यवस्था उससे भी ज्यादा सवाल खड़े कर देती है,कोरिया कलेक्टर कार्यालय में लंबे समय से स्टेनो टू कलेक्टर के रूप में कार्यरत घनश्याम मिश्रा को लेकर दैनिक घटती-घटना द्वारा लगातार दस्तावेजों के आधार पर सवाल उठाए जाते रहे हैं,अब सरगुजा संभाग आयुक्त कार्यालय से जारी एक नया पदोन्नति एवं पदस्थापना आदेश सामने आया है,जिसने इस पूरे मामले को फिर चर्चा के केंद्र में ला दिया है।
एक आदेश में कोरिया,एमसीबी और जशपुर…प्रशासनिक नक्शे पर स्टेनोग्राफर की नई कहानी-11 जून 2026 को आयुक्त,सरगुजा संभाग कार्यालय, अंबिकापुर से जारी आदेश में राजस्व विभाग के अंतर्गत संभागीय कार्यालयों और जिलों में पदस्थ स्टेनोग्राफर वर्ग-3 को स्टेनोग्राफर वर्ग-2 के पद पर पदोन्नत करते हुए पदस्थापना की गई है, इसी आदेश में संजय कुमार कुशवाहा को कार्यालय कलेक्टर,जिला कोरिया में पदस्थ किया गया,लेकिन आदेश की शर्त में उन्हें उपस्थिति देने के तत्काल बाद आगामी आदेश तक कार्यालय कलेक्टर,जिला एमसीबी में कार्य करने की व्यवस्था दी गई है,उनके वेतन-भत्तों का भुगतान पदस्थी कार्यालय से किए जाने की बात भी आदेश में दर्ज है,दूसरी ओर सुरेश कुमार यादव को स्टेनोग्राफर वर्ग-2 के पद पर पदोन्नत कर कार्यालय कलेक्टर,जिला जशपुर में पदस्थ किया गया है,यहीं से सवाल उठता है—यदि कोरिया में स्टेनोग्राफर की आवश्यकता थी तो पदस्थ कर्मचारी को उसी कार्यालय में काम क्यों नहीं कराया गया? और यदि एमसीबी में आवश्यकता थी तो कोरिया में पदस्थापना का ढांचा क्यों बनाया गया? यह प्रशासनिक आवश्यकता के आधार पर लिया गया निर्णय हो सकता है,लेकिन आदेश की इस असामान्य दिखाई देने वाली व्यवस्था का कारण सार्वजनिक रूप से स्पष्ट किया जाना अब जरूरी हो गया है,यदि इसमें कोई विसंगति है तो वर्षों से उस पर कार्रवाई क्यों नहीं हुई? दैनिक घटती-घटना इस विषय पर लगातार समाचार प्रकाशित करता रहा है,अब तक इस प्रकरण से जुड़े 14 समाचार और दस्तावेजी खुलासे सामने रखे जा चुके हैं,प्रतिनियुक्ति से जुड़े पुराने आदेशों से लेकर सेवा पुस्तिका, वेतन,संविलियन के प्रयास,पदस्थापना और प्रशासनिक व्यवस्था को लेकर सवाल उठाए गए हैं,लेकिन इन सवालों के जवाब में अभी तक वैसी स्पष्ट प्रशासनिक कार्रवाई दिखाई नहीं देती,जिसकी अपेक्षा इतने लंबे समय से उठ रहे सवालों के बाद की जाती है।
घनश्याम मिश्रा के लिए रास्ता खुला या महज संयोग?-यही वह बिंदु है जहां इस खबर का सबसे तीखा सवाल पैदा होता है,यदि कोरिया कलेक्टर कार्यालय में नए स्टेनोग्राफर की पदस्थापना की गई है,लेकिन उसे एमसीबी में कार्य करने की व्यवस्था दी गई है,तो स्वाभाविक रूप से यह जानना जरूरी है कि कोरिया कलेक्टर कार्यालय में स्टेनोग्राफर का वास्तविक कार्य कौन करेगा? क्या वहां पहले से कार्यरत कर्मचारी ही वही भूमिका निभाता रहेगा? यदि हां, तो उसके लिए वर्तमान प्रशासनिक आधार क्या है?क्या उसकी प्रतिनियुक्ति/ संलग्नीकरण वैध रूप से अभी प्रभावी है? क्या सक्षम विभाग ने उसकी अवधि बढ़ाई है? क्या मूल विभाग ने उसकी वापसी के संबंध में कोई निर्णय लिया है? इन प्रश्नों का उत्तर आदेशों और सेवा रिकॉर्ड से दिया जा सकता है,यह कहना कि नया आदेश जानबूझकर किसी व्यक्ति को लाभ पहुंचाने के लिए ही बनाया गया है ये कहना गलत नहीं होगा।
’अपने कर्मचारी’ बनाम ‘दूसरे विभाग के कर्मचारी’ का सवाल-घनश्याम मिश्रा को लेकर उठ रहा सबसे संवेदनशील सवाल यही है कि यदि वे मूलतः किसी अन्य विभाग से संबंधित हैं, तो राजस्व प्रशासन में उनकी इतनी लंबी भूमिका का प्रशासनिक आधार क्या है? यहां किसी व्यक्ति को दोषी ठहराना उद्देश्य नहीं है,मुद्दा यह है कि सरकारी व्यवस्था व्यक्ति से बड़ी होती है,यदि किसी कर्मचारी को दूसरे विभाग में लंबे समय तक काम करने की आवश्यकता है,तो उसके लिए नियम होना चाहिए, यदि नियम है तो आदेश होना चाहिए, यदि आदेश है तो अवधि होनी चाहिए,यदि अवधि समाप्त होती है तो समीक्षा होनी चाहिए, और यदि विशेष परिस्थिति में व्यवस्था जारी रखनी है तो उसका कारण दर्ज होना चाहिए।
कलेक्टर बदलते गए,लेकिन स्टेनो की कुर्सी नहीं बदली!
कोरिया जिले के सरकारी रिकॉर्ड बताते हैं कि समय-समय पर जिले में कलेक्टर बदलते रहे हैं, जिला प्रशासन की आधिकारिक वेबसाइट पर भी विभिन्न समय में पदस्थ रहे कलेक्टरों की सूची उपलब्ध है,यानी कुर्सी बदलती रही, चेहरे बदलते रहे,सरकारें बदलीं,प्रशासनिक प्राथ मिकताएं बदलीं,लेकिन इस प्रकरण में सबसे बड़ा सवाल यही है कि एक ही कर्मचारी की कलेक्टर कार्यालय में मौजूदगी इतनी लंबी कैसे बनी रही? व्यंग्य तो अब यही किया जा रहा है कि कलेक्टर का तबादला सरकारी प्रक्रिया है, लेकिन स्टेनो की कुर्सी शायद प्राकृतिक धरोहर है,यह व्यंग्य कोई सरकारी तथ्य नहीं है,बल्कि लंबे समय से उठ रहे सवालों के बीच पैदा हुई सार्वजनिक चर्चा को दर्शाता है,और यही चर्चा प्रशासन के लिए सबसे बड़ी चुनौती है।
आजीवन प्रतिनियुक्ति के ताबूत में आखिरी कील कौन ठोकेगा?
और अब इस पूरे प्रकरण का सबसे बड़ा सवाल फिर वहीं पहुंचता है जहां से यह कहानी शुरू हुई थी, क्या यह वर्षों पुरानी प्रतिनियुक्ति/संलग्नीकरण व्यवस्था कभी समाप्त होगी? क्या संबंधित कर्मचारी को उसके मूल विभाग में वापस भेजा जाएगा? क्या शासन इस पूरे मामले की स्वतंत्र समीक्षा कराएगा? क्या सेवा पुस्तिका,प्रतिनियुक्ति आदेश,वेतन निर्धारण,पदोन्नति और सेवा निरंतरता की पूरी श्रृंखला की जांच होगी? या फिर यह व्यवस्था सरकारी फाइलों में इतनी पुरानी हो चुकी है कि अब उसे बदलना ही सबसे बड़ा प्रशासनिक काम बन गया है? व्यंग्य में कहा जा सकता है की कलेक्टर बदलते रहे,सरकारें बदलती रहीं,आदेश बदलते रहे…लेकिन कुर्सी नहीं बदली,अब देखना यह है कि 3 अगस्त का नया शासन आदेश इस कुर्सी तक पहुंचता है या नहीं? और सबसे बड़ा सवाल ही की आजीवन प्रतिनियुक्ति के ताबूत में आखिरी कील कौन ठोकेगा? क्या विभाग? क्या कलेक्टर? क्या संभाग आयुक्त? क्या शासन? या फिर 15 अगस्त आएगा,तिरंगा फहरेगा और कोरिया कलेक्टरेट की वह पुरानी व्यवस्था उसी कुर्सी पर बैठकर आजादी का जश्न देखेगी?
मत्स्य विभाग का कर्मचारी,लेकिन कलेक्टर कार्यालय में लंबी सेवा—किस नियम से?
प्रकरण का सबसे महत्वपूर्ण पहलू मूल विभाग से जुड़ा है,उपलब्ध दस्तावेजों और पूर्व में प्रकाशित सामग्री के अनुसार संबंधित कर्मचारी का संबंध मत्स्य महासंघ/मत्स्य विभाग से रहा है, वर्ष 2000 के आसपास मध्यप्रदेश पुनर्गठन के बाद सेवा संबंधी व्यवस्था और विकल्प को लेकर दस्तावेज सामने आए हैं, यहीं से मूल सवाल पैदा होता है,जब कर्मचारी का मूल संबंध मत्स्य क्षेत्र से था तो कलेक्टर कार्यालय में इतने लंबे समय तक स्टेनो के रूप में सेवा किस प्रशासनिक व्यवस्था के तहत जारी रही? यदि प्रतिनियुक्ति थी तो उसकी अवधि क्या थी? यदि अवधि समाप्त हुई तो आगे विस्तार किसने दिया? यदि संविलियन हुआ तो आदेश क्या है? और यदि संविलियन नहीं हुआ तो राजस्व विभाग में लंबे समय तक काम करने की स्थिति किस आधार पर बनी? इन सवालों का जवाब किसी राजनीतिक बयान से नहीं,बल्कि सरकारी फाइल और आदेश से मिलना चाहिए।
3 अगस्त का आदेश तत्काल प्रभाव से लागू-अब कार्रवाई की घड़ी
इस पूरे प्रकरण में सबसे महत्वपूर्ण नया दस्तावेज है—सामान्य प्रशासन विभाग, छत्तीसगढ़ शासन का 3 अगस्त 2026 का डेस्क आवंटन में फेरबदल आदेश,शासन ने अपने आदेश में कहा है कि राज्य के विभिन्न विभागों,विभागाध्यक्ष कार्यालयों, संभागीय आयुक्त कार्यालयों, कलेक्टर कार्यालयों और अधीनस्थ कार्यालयों में कई अधिकारी-कर्मचारी लंबे समय से एक ही स्थान अथवा एक ही कार्य-पटल पर कार्यरत हैं। शासन ने प्रशासनिक पारदर्शिता,जवाबदेही,कार्यकुशलता और सुशासन सुनिश्चित करने के उद्देश्य से ऐसे कार्य-पटल में बदलाव की आवश्यकता बताई है, इसके बाद शासन ने स्पष्ट निर्णय लिया है कि अधिकारियों और कर्मचारियों के कार्य-पटल का प्रत्येक तीन वर्ष में अनिवार्य रूप से परिवर्तन किया जाए,यही नहीं, यदि किसी विशेष परिस्थिति में किसी कर्मचारी को उसी कार्य-पटल पर बनाए रखना आवश्यक हो,तो सक्षम प्राधिकारी के लिखित एवं कारणयुक्त अनुमोदन के बाद ही ऐसा किया जा सकता है,यानी अब शासन ने खुद नियम के साथ अपवाद की शर्त भी स्पष्ट कर दी है,शासन ने अपने 3 अगस्त के आदेश को तत्काल प्रभाव से लागू किया है, इसमें कार्यालय स्तर पर आवश्यक अभिलेख एवं कार्य-पटल परिवर्तन का विवरण संधारित करने का निर्देश भी दिया गया है,इसका अर्थ यह है कि अब हर कार्यालय को यह देखना होगा कि कौन कर्मचारी कितने समय से किस कार्य-पटल पर है,यहीं से कोरिया के मामले में सबसे महत्वपूर्ण सवाल निकलता है— क्या कलेक्टर कार्यालय कोरिया भी अपने डेस्क आवंटन का रिकॉर्ड तैयार करेगा? यदि करेगा तो उसमें घनश्याम मिश्रा की स्थिति क्या दर्ज होगी?
संविलियन का सवाल भी अब फाइलों के कटघरे में…
इस पूरे प्रकरण में संविलियन की चर्चा भी महत्वपूर्ण है,पूर्व में सामने आए दस्तावेजों के आधार पर राजस्व विभाग में संविलियन के प्रयास को लेकर सवाल उठे हैं,लेकिन यहां भी दो ही स्थिति हो सकती है,संविलियन हुआ—तो आदेश सामने आए, संविलियन नहीं हुआ—तो फिर इतने वर्षों तक व्यवस्था किस आधार पर चली? सरकारी सेवा में पद,विभाग,वेतन, वरिष्ठता और सेवा अवधि केवल मौखिक सहमति से तय नहीं होते,इनके पीछे आदेश, नियम और सक्षम प्राधिकारी की स्वीकृति होती है,यही कारण है कि अब इस पूरे मामले की सबसे बड़ी मांग किसी व्यक्ति के पक्ष या विपक्ष में फैसला नहीं,बल्कि फाइलों की जांच है।
तीन साल वाली व्यवस्था बनाम 25 साल का सवाल…
अब सबसे बड़ा विरोधाभास यही है, एक तरफ लंबे समय से एक ही शाखा या स्थान पर पदस्थ कर्मचारियों को स्थानांतरित करने की नीति और आदेशों की चर्चा है,दूसरी तरफ कोरिया कलेक्टर कार्यालय में करीब 25 साल पुरानी व्यवस्था का सवाल खड़ा है,तो क्या नियम सभी के लिए समान हैं? यदि किसी कर्मचारी को तीन वर्ष बाद स्थानांतरण योग्य माना जाता है, तो 25 वर्ष की अवधि किस श्रेणी में आएगी? क्या इसके लिए कोई विशेष अनुमति है? क्या हर अवधि के लिए सक्षम अधिकारी की स्वीकृति ली गई? क्या प्रतिनियुक्ति का प्रत्येक विस्तार विधिवत दर्ज है? क्या मूल विभाग ने कर्मचारी की वापसी की मांग की? यदि की तो क्या हुआ? यदि नहीं की तो क्यों नहीं? इन सवालों का जवाब मिलने के बाद ही यह स्पष्ट होगा कि मामला नियम आधारित विशेष व्यवस्था है या वर्षों से चली आ रही प्रशासनिक परंपरा।
क्या 15 अगस्त से पहले कलेक्टर कार्यालय भी 25 साल पुरानी प्रतिनियुक्ति से आजाद हो पाएगा?
अब बात 15 अगस्त की,15 अगस्त भारत की स्वतंत्रता का पर्व है,लेकिन इस बार कोरिया में एक अलग तरह की चर्चा भी है की क्या 15 अगस्त से पहले कलेक्टर कार्यालय भी 25 साल पुरानी प्रतिनियुक्ति से आजाद हो पाएगा? यह सवाल व्यंग्य है,लेकिन इसके पीछे प्रशासनिक गंभीरता छिपी हुई है,यदि शासन मानता है कि व्यवस्था पूरी तरह सही है तो उसे सार्वजनिक रूप से नियम और आदेश सामने रखकर मामला समाप्त कर देना चाहिए,यदि कहीं कोई प्रशासनिक विसंगति है तो जांच कर उसे सुधारना चाहिए,और यदि व्यवस्था समाप्त करने का निर्णय लेना है तो संबंधित कर्मचारी को उसके मूल विभाग में वापस भेजना चाहिए, यानी तीनों रास्ते खुले हैं—स्पष्टीकरण, जांच या सुधार,लेकिन चौथा रास्ता—चुप्पी—सबसे ज्यादा सवाल पैदा करता है।
अब गेंद शासन के पाले में…
दैनिक घटती-घटना द्वारा लगातार उठाए गए सवालों के बाद अब गेंद पूरी तरह शासन-प्रशासन के पाले में है, खबर गलत है तो खंडन कीजिए,दस्तावेज गलत हैं तो दस्तावेज दिखाइए,व्यवस्था सही है तो नियम बताइए, व्यवस्था गलत है तो कार्रवाई कीजिए, जांच हो चुकी है तो रिपोर्ट बताइए,लेकिन यदि न खंडन होगा,न जांच होगी,न कार्रवाई और न ही स्पष्टीकरण—तो सवाल फिर वही रहेगा कि आखिर 14 खबरों के बाद भी शासन-प्रशासन ने आंखें क्यों मूंद रखी हैं? क्योंकि कलेक्टर बदलते रहे हैं और आगे भी बदलेंगे,सरकारी अधिकारी आते-जाते रहेंगे,पदाधिकारी बदलेंगे,सरकारें भी बदलती रहेंगी,लेकिन किसी एक कर्मचारी की पदस्थापना यदि 25 वर्ष तक एक ही जगह बनी रहती है,तो वह व्यवस्था से जुड़ा सवाल बन जाती है,और शायद इसीलिए इस बार 15 अगस्त के पहले कोरिया में एक अलग सवाल पूछा जा रहा है देश तो आजाद हो गया,अब क्या कोरिया कलेक्टरेट भी 25 साल पुरानी प्रतिनियुक्ति से आजाद होगा? या फिर 15 अगस्त आएगा,झंडा फहरेगा,मिठाई बंटेगी…और फाइल के किसी कोने से वही पुरानी आवाज आएगी या व्यवस्था यथावत रहेगी!
14 खबरों के बाद भी सन्नाटा, आखिर यह कैसी प्रशासनिक चुप्पी?
पत्रकारिता का मूल काम सवाल पूछना है, शासन का काम जवाब देना,लेकिन कोरिया के इस प्रकरण में स्थिति कुछ अलग दिखाई दे रही है,एक-दो खबर होती तो कहा जा सकता था कि मामला ध्यान में नहीं आया होगा,दो-चार सवाल होते तो कहा जा सकता था कि विभागीय स्तर पर परीक्षण चल रहा होगा,लेकिन जब 14 बार दस्तावेजों के आधार पर सवाल उठाए जा चुके हों,तब भी यदि संबंधित विभाग,जिला प्रशासन या शासन की ओर से स्पष्ट तथ्यात्मक जवाब सामने नहीं आता,तो चुप्पी स्वयं एक नया सवाल बन जाती है,यहां सवाल किसी व्यक्ति को दोषी ठहराने का नहीं है,सवाल यह है कि व्यवस्था सही है या नहीं? यदि संबंधित कर्मचारी की वर्षों पुरानी पदस्थापना नियमसम्मत है तो शासन को कहना चाहिए कि किस आदेश और किस नियम के तहत यह व्यवस्था लगातार चली, यदि प्रतिनियुक्ति की अवधि बढ़ाई गई तो हर विस्तार आदेश कहां है? मूल विभाग से बाहर इतने लंबे समय तक सेवा किस व्यवस्था के तहत जारी रही? खबर गलत है तो खंडन कीजिए, खबर सही है तो जांच कीजिए, जांच हो चुकी है तो रिपोर्ट बताइए,लोकतंत्र में इससे ज्यादा कठिन मांग आखिर है भी क्या?
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