
घटती-घटना की खबर के बाद बढ़ी विभागीय हलचल…फर्जी आंकड़ों पर उठे सवाल…उप संचालक की भूमिका भी जांच के घेरे में…
-राजेन्द्र शर्मा-
खड़गवां/एमसीबी,14 जुलाई 2026 (घटती-घटना)। एमसीबी जिले के पशुपालन विभाग में पशुओं के टीकाकरण को लेकर सामने आए कथित फर्जीवाड़े के मामले ने अब नया मोड़ ले लिया है, दैनिक घटती घटना द्वारा इस पूरे मामले का खुलासा प्रमुखता से प्रकाशित किए जाने के बाद विभाग में अचानक हलचल तेज हो गई है, जिन गांवों के पशुपालकों का आरोप था कि वहां टीकाकरण दल कभी पहुंचे ही नहीं,उन्हीं गांवों में अब विभाग की टीमें तेजी से पहुंचकर टीकाकरण अभियान चला रही हैं। विभाग की इस अचानक सक्रियता ने कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं, सबसे बड़ा प्रश्न यही है कि यदि शासन को पहले ही पूरे जिले में 100 प्रतिशत टीकाकरण पूरा होने की रिपोर्ट भेजी जा चुकी थी,तो अब दोबारा गांव-गांव जाकर टीकाकरण करने की जरूरत आखिर क्यों पड़ रही है? क्या पहले भेजी गई रिपोर्ट वास्तविक थी या केवल कागजों में उपलब्धि दर्शाकर शासन को गुमराह किया गया?
खबर के बाद बदले हालात-ग्रामीणों का कहना है कि समाचार प्रकाशित होने से पहले तक कई गांवों में पशुओं का टीकाकरण नहीं हुआ था,पशुपालकों द्वारा लगातार शिकायत किए जाने के बावजूद विभाग की ओर से कोई गंभीर पहल नहीं की गई। लेकिन जैसे ही मामला सार्वजनिक हुआ और फर्जी आंकड़ों पर सवाल उठे,विभाग सक्रिय हो गया, अब टीकाकरण दल गांव-गांव पहुंच रहे हैं,इससे ग्रामीणों के बीच यह चर्चा तेज हो गई है कि यदि वास्तव में पहले ही टीकाकरण पूरा हो चुका था, तो वर्तमान अभियान किस आधार पर चलाया जा रहा है?
उप संचालक की भूमिका पर उठ रहे सवाल-इस पूरे मामले में जिला पशुपालन विभाग के उप संचालक की भूमिका भी सवालों के घेरे में आ गई है, आरोप है कि विभाग द्वारा शासन को भेजे गए कथित फर्जी आंकड़ों की जानकारी होने के बावजूद अब तक किसी भी जिम्मेदार अधिकारी या कर्मचारी के विरुद्ध कोई विभागीय कार्रवाई नहीं की गई, यदि बिना वास्तविक टीकाकरण के ही 100 प्रतिशत उपलब्धि दर्शाकर शासन को रिपोर्ट भेजी गई है, तो यह केवल प्रशासनिक लापरवाही नहीं बल्कि सरकारी अभिलेखों में गलत जानकारी प्रस्तुत करने का गंभीर मामला भी माना जा सकता है, ऐसे में सवाल यह भी उठ रहा है कि क्या वरिष्ठ अधिकारियों ने रिपोर्ट का सत्यापन किए बिना ही उसे स्वीकार कर लिया या फिर पूरी प्रक्रिया उनकी जानकारी में हुई?
क्या लाखों रुपये की राशि पर उठेंगे सवाल?-स्थानीय स्तर पर यह चर्चा भी तेज है कि यदि रिकॉर्ड में शत-प्रतिशत टीकाकरण दर्शाया गया और उसी आधार पर भुगतान भी जारी हुआ, तो सरकारी राशि के उपयोग की निष्पक्ष जांच आवश्यक है, हालांकि, यह कहना कि वास्तव में वित्तीय अनियमितता हुई है, जांच के बिना उचित नहीं होगा, लेकिन परिस्थितियां निश्चित रूप से इस आशंका को जन्म देती हैं कि यदि कार्य पूर्ण नहीं हुआ और भुगतान हुआ है, तो पूरी प्रक्रिया की जांच आवश्यक है, विशेषज्ञों का भी मानना है कि टीकाकरण जैसी योजनाओं में दवा, परिवहन, मानदेय और अन्य मदों पर सरकारी राशि खर्च होती है, ऐसे में यदि कार्य और रिकॉर्ड में अंतर पाया जाता है, तो वित्तीय जवाबदेही भी तय होना स्वाभाविक है।
किसानों और पशुपालकों ने उठाई निष्पक्ष जांच की मांग…
ग्रामीणों, किसानों और पशुपालकों ने शासन से मांग की है कि पूरे जिले के टीकाकरण अभियान की स्वतंत्र और निष्पक्ष जांच कराई जाए,जांच के दौरान निम्न बिंदुओं की पड़ताल करने की मांग की गई है शासन को भेजी गई टीकाकरण रिपोर्ट,गांववार टीकाकरण रजिस्टर एवं फील्ड रिकॉर्ड,लाभार्थी पशुपालकों का भौतिक सत्यापन,टीकाकरण में प्रयुक्त वैक्सीन का रिकॉर्ड, भुगतान एवं व्यय से संबंधित दस्तावेज, संबंधित अधिकारियों एवं कर्मचारियों की जवाबदेही, ग्रामीणों का कहना है कि यदि जांच में किसी भी स्तर पर फर्जीवाड़ा, लापरवाही या अनियमितता सामने आती है तो संबंधित अधिकारियों और कर्मचारियों के विरुद्ध कठोर विभागीय एवं कानूनी कार्रवाई की जानी चाहिए।
कई सवालों के जवाब अभी बाकी- इस पूरे घटनाक्रम के बाद अब कई महत्वपूर्ण प्रश्न सामने हैं यदि 100 प्रतिशत टीकाकरण हो चुका था, तो वर्तमान अभियान क्यों चल रहा है? क्या शासन को भेजे गए आंकड़े वास्तविक थे? क्या वरिष्ठ अधिकारियों ने रिपोर्ट का सत्यापन किया था?
यदि रिपोर्ट गलत थी, तो जिम्मेदार कौन है? क्या सरकारी धन के उपयोग की भी स्वतंत्र जांच होगी? इन सवालों के जवाब अब विभागीय जांच और शासन की कार्रवाई के बाद ही सामने आ पाएंगे। फिलहाल इतना स्पष्ट है कि समाचार प्रकाशित होने के बाद विभाग की सक्रियता बढ़ी है और जिस अभियान को पहले कागजों में पूरा बताया गया था, वह अब जमीन पर चलता दिखाई दे रहा है। यही तथ्य पूरे मामले को और अधिक गंभीर बनाता है।
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