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बैकुंठपुर/कोरिया@ क्या अपने समाज के आरोपियों पर मौन हैं सामाजिक संगठन? दो गंभीर मामलों ने छेड़ी नई बहस….

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  • गंभीर धाराओं में अपराध दर्ज,आरोपी अब भी आज़ाद,न्याय की लड़ाई में मौन क्यों?
  • जब आरोपी अपने समाज के हों तो चुप क्यों? दो गंभीर मामलों ने खड़े किए असहज सवाल
  • गिरफ्तारी का इंतजार,न्याय अधूरा,दो गंभीर मामलों में पुलिस और समाज दोनों कटघरे में…
  • दो एफआईआर,गंभीर धाराएं और फरार आरोपी,आखिर कार्रवाई कब?
  • एससी/एसटी एक्ट के दो गंभीर मामलों में गिरफ्तारी नहीं…आखिर किसका संरक्षण?
  • कानून सबके लिए बराबर या नहीं? दो गंभीर मामलों में गिरफ्तारी न होने से उठा सवाल
  • गंभीर अपराधों में फरार आरोपी, सामाजिक संगठन मौन,क्या न्याय के भी अलग-अलग पैमाने?
  • अपराध गंभीर,आरोपी फरार… आखिर चुप्पी किस बात की?

रवि सिंह
बैकुंठपुर/कोरिया,14 जुलाई 2026 (घटती-घटना)।
कोरिया जिले में कानून-व्यवस्था को लेकर एक बार फिर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं, थाना कोतवाली बैकुंठपुर में दर्ज दो गंभीर आपराधिक मामलों में भारतीय न्याय संहिता की गंभीर धाराओं के साथ अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम के तहत अपराध दर्ज होने के बावजूद आरोपियों की अब तक गिरफ्तारी नहीं हो सकी है, इसी बीच जिले में अन्य चर्चित घटनाएं सुर्खियों में रहीं, जिसके चलते यह प्रश्न भी उठने लगा है कि क्या इन गंभीर मामलों पर अपेक्षित सार्वजनिक और प्रशासनिक ध्यान नहीं गया, स्थानीय लोगों का कहना है कि यदि किसी मामले में बलात्कार,गंभीर हिंसा या एससी/एसटी अत्याचार निवारण अधिनियम जैसी धाराओं के तहत अपराध दर्ज है तो कानून के अनुसार त्वरित और प्रभावी कार्रवाई अपेक्षित होती है, लेकिन इन मामलों में गिरफ्तारी नहीं होना लोगों के मन में कई तरह की शंकाएं पैदा कर रहा है।
दो मामलों में गंभीर धाराओं के तहत अपराध दर्ज- पहला मामला थाना कोतवाली बैकुंठपुर का अपराध क्रमांक 209/26 है, इस प्रकरण में भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 115(2),64, 91,64(2)(h), 64(2)(m),70(1) तथा एससी/एसटी अत्याचार निवारण अधिनियम की धारा 3(5) के तहत अपराध दर्ज किया गया है, दूसरा मामला अपराध क्रमांक 214/26 है, जिसमें ख्हृस् की धारा 296,107,308(2), 309(4) तथा एससी/एसटी अधिनियम की धारा 3(2)(1) के तहत अपराध पंजीबद्ध किया गया है,दोनों मामलों में पुलिस ने अपराध दर्ज तो किया,लेकिन आरोपियों की गिरफ्तारी अब तक नहीं हो पाई है।
गंभीर धाराएं बताती हैं अपराध की प्रकृति– कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि जिन मामलों में एससी/एसटी अत्याचार निवारण अधिनियम और भारतीय न्याय संहिता की गंभीर धाराएं लगाई जाती हैं,वे सामान्य प्रकृति के अपराध नहीं माने जाते,ऐसे मामलों में पुलिस की जांच और कार्रवाई दोनों पर विशेष संवेदनशीलता अपेक्षित होती है, इसी कारण यह सवाल उठ रहा है कि जब अपराध की प्रकृति गंभीर है तो फिर कार्रवाई अपेक्षित गति से क्यों नहीं बढ़ रही है।
क्या आरोपी प्रभावशाली होने से कार्रवाई प्रभावित?- स्थानीय स्तर पर यह चर्चा भी है कि एक आरोपी राजनीतिक रूप से प्रभावशाली माना जाता है,हालांकि इसकी किसी सरकारी दस्तावेज या सक्षम अधिकारी द्वारा आधिकारिक पुष्टि नहीं की गई है,कुछ लोगों का यह भी दावा है कि आरोपी पुलिस के संपर्क में आया था और थाने तक भी पहुंचा था,इन दावों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है,यदि इन आरोपों में सच्चाई है तो यह पुलिस की कार्यप्रणाली पर गंभीर प्रश्न खड़े कर सकता है, वहीं यदि ऐसा नहीं है तो पुलिस को भी पूरे मामले पर स्पष्ट स्थिति सामने रखनी चाहिए ताकि भ्रम समाप्त हो सके।
क्या न्याय के लिए अलग-अलग पैमाने?-जनचर्चा में सबसे बड़ा प्रश्न यही उभर रहा है कि क्या न्याय की मांग के लिए अलग-अलग पैमाने तय हो गए हैं? यदि आरोपी किसी दूसरे समाज से हो तो सामाजिक संगठन खुलकर सामने आते हैं, लेकिन यदि आरोपी उसी समाज से संबंधित हो तो क्या संगठन मौन रह जाते हैं? यह सवाल इसलिए भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि न्याय का आधार पीडि़त और अपराध होना चाहिए,न कि आरोपी की सामाजिक पहचान।
समाज के भीतर भी नाराजगी की चर्चा- स्थानीय स्तर पर यह भी चर्चा है कि संबंधित समाज के अनेक लोग स्वयं आरोपियों के पक्ष में नहीं हैं,लोगों का कहना है कि यदि किसी ने अपराध किया है तो उसे कानून के अनुसार दंड मिलना चाहिए,बताया जा रहा है कि समाज के भीतर भी आरोपियों को लेकर असंतोष है,लेकिन कोई संगठित नेतृत्व अब तक खुलकर सामने नहीं आया है। इस कारण आम लोगों की आवाज भी बिखरी हुई नजर आ रही है।
पुलिस की निष्पक्षता पर जनता की नजर-इन दोनों मामलों में अब सबसे बड़ी जिम्मेदारी पुलिस की है,लोगों का मानना है कि यदि पुलिस निष्पक्ष जांच कर शीघ्र गिरफ्तारी सुनिश्चित करती है तो कानून के प्रति जनता का विश्वास मजबूत होगा,लेकिन यदि गंभीर अपराधों में भी कार्रवाई लंबी खिंचती है तो इससे कई तरह की आशंकाएं जन्म लेती हैं और कानून के समान अनुपालन पर प्रश्न उठते हैं।
प्रशासन से स्पष्ट जवाब की अपेक्षा– जनता अब यह जानना चाहती है दोनों मामलों में अब तक कितनी जांच हुई? आरोपियों की गिरफ्तारी क्यों नहीं हो सकी? क्या गिरफ्तारी के लिए विशेष टीम बनाई गई है? क्या आरोपी फरार घोषित किए गए हैं? यदि आरोपी उपलब्ध नहीं हैं तो उनके विरुद्ध कानूनी प्रक्रिया किस स्तर पर है? इन प्रश्नों के उत्तर पुलिस और प्रशासन की ओर से सार्वजनिक रूप से सामने आने चाहिए ताकि भ्रम और अफवाहों पर विराम लग सके।
समान न्याय ही लोकतंत्र की कसौटी- कानून की सबसे बड़ी विशेषता उसकी समानता है, यदि अपराध समान है तो कार्रवाई भी समान दिखनी चाहिए,चाहे आरोपी किसी भी समाज,वर्ग, राजनीतिक दल या प्रभावशाली परिवार से जुड़ा हो, कानून का व्यवहार एक जैसा होना चाहिए,इसी प्रकार सामाजिक संगठनों की विश्वसनीयता भी तभी बनी रहेगी जब वे हर पीडि़त के लिए समान संवेदनशीलता दिखाएं और न्याय की मांग किसी पहचान के आधार पर नहीं,बल्कि अपराध की गंभीरता के आधार पर करें,अब पूरे जिले की निगाह इस बात पर है कि पुलिस इन दोनों मामलों में आरोपियों की गिरफ्तारी कब तक सुनिश्चित करती है और क्या सामाजिक संगठन भी इस विषय पर अपनी स्पष्ट भूमिका सामने रखते हैं।
क्या दूसरी चर्चित घटनाओं के बीच दब गया यह मामला?
जिले में हाल के दिनों में कई ऐसी घटनाएं सामने आईं जिन्होंने व्यापक जनचर्चा और मीडिया का ध्यान आकर्षित किया,ऐसे में यह सवाल उठने लगा है कि क्या इन दो गंभीर मामलों पर अपेक्षित चर्चा नहीं हो सकी,यह कहना उचित नहीं होगा कि किसी घटना को जानबूझकर दबाया गया,लेकिन यह अवश्य कहा जा सकता है कि इन मामलों में जितनी गंभीरता से सार्वजनिक विमर्श होना चाहिए था,वह अब तक दिखाई नहीं दिया।
सामाजिक संगठनों की चुप्पी पर भी सवाल…
इन मामलों का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष सामाजिक संगठनों की भूमिका को लेकर सामने आ रहा है, आमतौर पर जब किसी समाज विशेष के व्यक्ति के साथ अत्याचार या गंभीर अपराध होता है तो अनेक सामाजिक संगठन सड़क पर उतरते हैं,ज्ञापन देते हैं,धरना-प्रदर्शन करते हैं और गिरफ्तारी की मांग करते हैं, लेकिन इन दोनों मामलों में अब तक किसी बड़े आंदोलन या संगठित विरोध की तस्वीर सामने नहीं आई है,यही कारण है कि अब लोगों के बीच यह सवाल उठ रहा है कि क्या सामाजिक संगठनों का दृष्टिकोण सभी मामलों में समान है, या फिर उनकी सक्रियता परिस्थितियों और सामाजिक समीकरणों के अनुसार बदल जाती है।


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