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अंबिकापुर@ जिसे जेल में होना था,वह वोटर लिस्ट में कैसे पहुंच गया?

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  • 13 साल तक फरार गैंगस्टर का शहर में ‘वैध’ जीवन,अब कटघरे में पूरा तंत्र
  • 13 साल तक शहर में छिपा रहा उम्रकैद का गैंगस्टर…वोटर आईडी भी बन गया…अब कटघरे में पूरा सिस्टम
  • उम्रकैद का फरार गैंगस्टर,वोटर आईडी और 13 साल की चुप्पी… आखिर जिम्मेदार कौन?
  • दैनिक घटती-घटना के खुलासे के बाद एफआईआर…लेकिन सवाल अब भी कायम, गैंगस्टर कैसे बना ‘वैध नागरिक’?
  • सिर्फ गैंगस्टर नहीं,पूरा सिस्टम जांच के घेरे में…13 साल तक अंबिकापुर में कैसे छिपा रहा साबिर आलम?
  • वोटर आईडी से लेकर करोड़ों के कारोबार तक…उम्रकैद के फरार गैंगस्टर ने कैसे बनाया अपना नेटवर्क?
  • छह दिन बाद जागी पुलिस,तब तक गैंगस्टर भी फरार और संरक्षण देने वाले भी गायब
  • सजायाफ्ता गैंगस्टर का वोटर आईडी कैसे बना? एफआईआर के बाद उठे कई कानूनी और प्रशासनिक सवाल
  • 13 साल तक पहचान छिपाकर रहा फरार गैंगस्टर…अब पुलिस,प्रशासन और चुनावी तंत्र पर उठे सवाल

-संवाददाता-
अंबिकापुर,09 जुलाई 2026 (घटती-घटना)।
झारखंड के धनबाद स्थित बहुचर्चित वासेपुर दोहरे हत्याकांड में आजीवन कारावास की सजा प्राप्त फरार गैंगस्टर साबिर आलम का मामला अब केवल एक अपराधी की फरारी का मामला नहीं रह गया है,यह अब प्रशासनिक जवाबदेही,पुलिस की कार्यप्रणाली, पहचान दस्तावेजों की वैधता,चुनावी रिकॉर्ड,स्थानीय सत्यापन तंत्र,अंतरराज्यीय पुलिस समन्वय और कथित संरक्षण नेटवर्क तक पहुंच चुका है। इस पूरे प्रकरण में सबसे महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि 29 जून 2026 को हुई घटना की जानकारी सबसे पहले दैनिक घटती-घटना को मिली और 1 जुलाई 2026 के अंक में प्रमुखता से प्रकाशित भी हुई,इसके बाद भी स्थानीय पुलिस ने तत्काल कोई अपराध दर्ज नहीं किया,दूसरी ओर, झारखंड पुलिस लगातार इस मामले में संपर्क और कार्रवाई का प्रयास करती रही। इसके बावजूद छत्तीसगढ़ पुलिस की ओर से तत्काल प्रभावी कार्रवाई सामने नहीं आई, बाद में 5 जुलाई 2026 को दैनिक घटती-घटना ने दोबारा इस विषय को प्रमुखता से प्रकाशित किया, तब तक कई अन्य मीडिया संस्थानों में भी यह मामला प्रकाशित हो चुका था, इसके बाद थाना अंबिकापुर में अपराध क्रमांक 454/2026 दर्ज किया गया, जिसमें मोमिनपुरा निवासी बस संचालक बैदुल खान एवं अन्य के विरुद्ध भारतीय न्याय संहिता की धारा 249 के अंतर्गत अपराध पंजीबद्ध किया गया, लेकिन अपराध दर्ज होने के साथ ही अनेक ऐसे प्रश्न सामने आ गए, जिनका उत्तर अभी तक सार्वजनिक रूप से सामने नहीं आया है।
दैनिक घटती-घटना ने सबसे पहले किया था खुलासा, फिर भी छह दिन तक नहीं जागी पुलिस- इस मामले का दूसरा महत्वपूर्ण पहलू पुलिस की कार्रवाई का समय है, दैनिक घटती-घटना ने 1 जुलाई को खबर प्रकाशित की, 5 जुलाई को पुनः विस्तृत समाचार प्रकाशित किया,झारखंड पुलिस लगातार संपर्क में थी, अन्य मीडिया संस्थानों ने भी मामला उठाया,इसके बावजूद स्थानीय स्तर पर अपराध दर्ज होने में छह दिन का समय लग गया, यहीं सबसे बड़ा सवाल उठता है यदि पहले दिन ही विधिवत अपराध दर्ज कर तत्काल कार्रवाई होती,तो क्या साबिर आलम आज भी फरार रहता? क्या उसे संरक्षण देने वाले लोग भी फरार हो पाते? कई नागरिकों का मानना है कि शुरुआती कार्रवाई में हुई देरी का लाभ आरोपियों को मिला।
एफआईआर दर्ज हुई,लेकिन उसमें भी उठ रहे हैं कई तकनीकी प्रश्न-अपराध दर्ज होना निश्चित रूप से महत्वपूर्ण कदम है, लेकिन एफआईआर पढ़ने के बाद कई कानूनी प्रश्न भी सामने आ रहे हैं,एफआईआर में समाचार पत्र में प्रकाशित रिपोर्ट के आधार पर जानकारी मिलने का उल्लेख है,जबकि सार्वजनिक रूप से यह भी कहा गया कि धनबाद पुलिस आरोपी की तलाश में अंबिकापुर आई थी,ऐसी स्थिति में प्रश्न उठता है कि क्या धनबाद पुलिस के आधिकारिक पत्राचार, वारंट अथवा दस्तावेजों को भी विवेचना का आधार बनाया गया? कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि न्यायालय में अखबार की खबर स्वयं स्वतंत्र साक्ष्य नहीं होती, बल्कि उसे अन्य साक्ष्यों से प्रमाणित करना पड़ता है, इसी प्रकार एफआईआर में आरोपी का विस्तृत परिचय, शिकायतकर्ता का स्पष्ट उल्लेख तथा अन्य बिंदुओं को लेकर भी कई तकनीकी सवाल उठाए जा रहे हैं।
क्या केवल बैदुल खान ने संरक्षण दिया या पूरा नेटवर्क सक्रिय था?- एफआईआर में बैदुल खान एवं अन्य के विरुद्ध अपराध दर्ज किया गया है, यहीं से जांच का दायरा और बड़ा हो जाता है,यदि कोई व्यक्ति वर्षों तक फरार रहकर शहर में सक्रिय रहा,तो क्या केवल एक व्यक्ति के सहयोग से यह संभव था? क्या अन्य स्थानीय संपर्क भी थे? क्या आर्थिक सहयोग मिला? क्या व्यवसायिक गतिविधियों में साझेदार थे? क्या दस्तावेज बनवाने में भी किसी ने सहयोग किया? अब जांच का सबसे महत्वपूर्ण बिंदु यही माना जा रहा है।
फरार गैंगस्टर भी गायब, संरक्षण देने के आरोपी भी लापता-वर्तमान स्थिति और भी चिंताजनक बताई जा रही है,साबिर आलम अब भी फरार है,उसे संरक्षण देने के आरोप में नामजद बैदुल खान भी सार्वजनिक रूप से उपलब्ध नहीं है,अन्य संदिग्ध सहयोगियों के संबंध में भी पुलिस की ओर से कोई स्पष्ट सफलता सामने नहीं आई है,यानी मुख्य अपराधी भी फरार,उसे संरक्षण देने का आरोपी भी फरार,और जिन लोगों की भूमिका की चर्चा हो रही है, वे भी पुलिस की पकड़ से बाहर बताए जा रहे हैं, ऐसी स्थिति में शहर में यह चर्चा तेज है कि क्या केवल अपराध दर्ज कर देने से यह मामला अपने अंतिम मुकाम तक पहुंचेगा,या वास्तव में आरोपियों तक कानून पहुंचेगा।
क्या पुलिस अब पूरा नेटवर्क उजागर करेगी?- यह मामला अब केवल एक हत्या के दोषी की गिरफ्तारी तक सीमित नहीं है,जांच को यह भी स्पष्ट करना होगा क्या शहर में कोई संगठित संरक्षण तंत्र सक्रिय था? क्या आर्थिक नेटवर्क विकसित किया गया? क्या सरकारी दस्तावेज फर्जी तरीके से बनवाए गए? क्या स्थानीय स्तर पर सत्यापन प्रक्रिया में लापरवाही हुई? क्या किसी सरकारी कर्मचारी की भूमिका रही? यदि इन प्रश्नों के उत्तर नहीं खोजे गए, तो पूरा मामला अधूरा माना जाएगा।
अब उठ रही एसआईटी जांच की मांग– मामले की गंभीरता को देखते हुए कई सामाजिक संगठनों,अधिवक्ताओं और नागरिकों द्वारा विशेष जांच दल गठित करने की मांग की जा रही है, मांग है कि केवल पुलिस ही नहीं बल्कि निर्वाचन विभाग, राजस्व विभाग,परिवहन विभाग,नगर निगम, आर्थिक अपराध अन्वेषण एजेंसियां, भी अपने-अपने स्तर पर जांच करें।
शहर का सबसे बड़ा सवाल अभी भी अनुत्तरित है-यदि एक आजीवन कारावास प्राप्त भगोड़ा अपराधी 13 वर्षों तक शहर में नई पहचान के साथ रह सकता है…यदि वह आर्थिक गतिविधियां चला सकता है…यदि उसके दस्तावेज बन सकते हैं…यदि वह मतदाता सूची तक पहुंच सकता है…यदि उसके विरुद्ध कार्रवाई होने से पहले वह फिर फरार हो सकता है…तो फिर सवाल केवल साबिर आलम का नहीं है, सवाल उस पूरी व्यवस्था का है,जिसे ऐसे अपराधियों की पहचान बहुत पहले कर लेनी चाहिए थी।
सबसे बड़ा सवाल—एक उम्रकैद का फरार अपराधी आखिर 13 वर्षों तक शहर में कैसे रहा?
यदि एफआईआर में दर्ज तथ्यों के अनुसार साबिर आलम वर्ष 2013 से अंबिकापुर में पहचान छिपाकर रह रहा था,तो यह केवल उसकी चतुराई का मामला नहीं माना जा सकता,सवाल यह है कि एक बाहरी व्यक्ति वर्षों तक शहर में रहा,मकान बनाया,कारोबार बढ़ाया,आर्थिक गतिविधियां संचालित कीं और फिर भी किसी एजेंसी को उसकी वास्तविक पहचान का पता नहीं चला? यदि ऐसा हुआ, तो स्थानीय सत्यापन व्यवस्था, पुलिस की सूचना प्रणाली और प्रशासनिक निगरानी पर गंभीर प्रश्न खड़े होना स्वाभाविक है।
वोटर आईडी कार्ड कैसे बना? क्या अन्य सरकारी दस्तावेज भी तैयार हुए?
इस पूरे प्रकरण का सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न अब चुनावी दस्तावेजों और पहचान पत्रों से जुड़ गया है,यदि एक आजीवन कारावास का सजायाफ्ता और फरार अपराधी अंबिकापुर में वर्षों तक रह रहा था,तो उसका वोटर आईडी कार्ड कैसे बना? क्या आधार कार्ड भी बना? क्या राशन कार्ड,बैंक खाते,मोबाइल सिम और अन्य सरकारी दस्तावेज भी तैयार हुए? क्या स्थानीय स्तर पर निवास सत्यापन किया गया था? यदि किया गया था, तो किसने किया? चुनाव आयोग वर्तमान में विशेष गहन पुनरीक्षण चला रहा है,जिसका उद्देश्य मतदाता सूची को शुद्ध करना है,ऐसे समय यदि किसी फरार सजायाफ्ता अपराधी का नाम मतदाता सूची में पाया जाता है, तो यह केवल एक प्रशासनिक त्रुटि नहीं बल्कि पूरे सत्यापन तंत्र पर प्रश्नचिह्न है।
अब जनता जानना चाहती है…- क्या पुलिस साबिर आलम को गिरफ्तार करेगी?
क्या बैदुल खान और अन्य नामजद आरोपियों की गिरफ्तारी होगी? क्या वोटर आईडी सहित सभी दस्तावेजों की जांच होगी? क्या दस्तावेज बनाने वालों की भूमिका सामने आएगी? क्या पूरे आर्थिक नेटवर्क का खुलासा होगा? या फिर यह मामला भी केवल एक एफआईआर और कुछ फाइलों तक सीमित रह जाएगा? अब निगाहें जांच पर हैं…क्योंकि इस बार कटघरे में सिर्फ एक फरार गैंगस्टर नहीं, बल्कि पूरी व्यवस्था खड़ी दिखाई दे रही है।


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