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अम्बिकापुर@चार महीने में दो बार अपचारी बालकों के फरार होने से हिली व्यवस्था

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  • संवेदनशील संस्थाओं में नियमित राजपत्रित अधिकारियों की जगह संविदा कर्मियों को प्रभार देने पर उठा सवाल…
  • करोड़ों की मिशन वात्सल्य योजना,लेकिन बाल संरक्षण संस्थाएं संविदा प्रभारियों के हवाले!
  • अपचारी बालक भागते रहे…जिम्मेदारी कौन लेगा? अंबिकापुर बाल संप्रेक्षण गृह की व्यवस्था कटघरे में…
  • नियमित अधिकारी नहीं,संविदा प्रभारी चला रहे बाल संरक्षण व्यवस्था! दो फरारी के बाद बढ़ी जवाबदेही की मांग
  • बाल संप्रेक्षण गृह में सुरक्षा संकट…संविदा प्रभार व्यवस्था पर घिरा प्रशासन…
  • संवेदनशील संस्थाओं में संविदा का ‘राज’, बाल सुरक्षा से समझौते के आरोप
  • करोड़ों का बजट, लेकिन जिम्मेदारी संविदा कर्मियों पर! बाल संरक्षण व्यवस्था की पड़ताल
  • बाल संरक्षण व्यवस्था में बड़ा सवालः क्या संविदा प्रभारियों के भरोसे सुरक्षित हैं अपचारी बच्चे?
  • बाल सुरक्षा पर संविदा का पहरा! दो फरारी के बाद भी नहीं जागा तंत्र, मिशन वात्सल्य की व्यवस्था कठघरे में


-संवाददाता-

अम्बिकापुर,29 जून 2026 (घटती-घटना)। किसी भी सभ्य समाज की पहचान इस बात से होती है कि वह अपने सबसे कमजोर और सबसे संवेदनशील वर्ग की सुरक्षा किस प्रकार सुनिश्चित करता है,बच्चों की सुरक्षा के लिए केंद्र और राज्य सरकारें हर वर्ष करोड़ों रुपये खर्च करती हैं,मिशन वात्सल्य (पूर्व आईसीपएस) जैसी योजनाओं का उद्देश्य कानून से संघर्षरत और संरक्षण की आवश्यकता वाले बच्चों को सुरक्षित वातावरण,परामर्श,शिक्षा,पुनर्वास और न्यायपूर्ण देखरेख उपलब्ध कराना है,लेकिन सरगुजा संभाग मुख्यालय अंबिकापुर में इन उद्देश्यों पर गंभीर प्रश्नचिह्न लगते दिखाई दे रहे हैं। पिछले चार महीनों में दो बार अपचारी बालकों के संप्रेक्षण गृह से फरार होने की घटनाओं ने न केवल सुरक्षा व्यवस्था की पोल खोल दी है,बल्कि पूरे प्रशासनिक ढांचे की कार्यप्रणाली पर भी सवाल खड़े कर दिए हैं,अब चर्चा केवल सुरक्षा चूक तक सीमित नहीं रह गई है,बड़ा प्रश्न यह है कि आखिर इतनी संवेदनशील संस्थाओं का संचालन नियमित राजपत्रित अधिकारियों के बजाय संविदा कर्मचारियों के भरोसे क्यों किया जा रहा है?
संविदा अधिकारी को जिला बाल संरक्षण अधिकारी का प्रभार-जानकारी के अनुसार जो संरक्षण अधिकारी (गैर संस्थागत) के संविदा पद पर कार्यरत हैं,उन्हें जिला बाल संरक्षण अधिकारी का प्रशासनिक प्रभार सौंपा गया है, विभागीय जानकारों का कहना है कि पूर्व में जब बिलासपुर जैसे बड़े जिलों में जिला बाल संरक्षण अधिकारी का पद रिक्त हुआ,तब अतिरिक्त प्रभार जिला महिला एवं बाल विकास अधिकारी अथवा परियोजना अधिकारी जैसे नियमित राजपत्रित अधिकारियों को दिया जाता था,ऐसे में अंबिकापुर में संविदा अधिकारी को यह जिम्मेदारी सौंपे जाने को लेकर सवाल उठना स्वाभाविक है,यदि कोई प्रशासनिक निर्णय विवादित होता है,वित्तीय अनियमितता सामने आती है या सुरक्षा में चूक होती है,तो अंतिम जवाबदेही किसकी होगी?
चार संस्थाओं का संचालन
भी संविदा कर्मियों के भरोसे

सूत्रों के अनुसार स्थिति केवल जिला बाल संरक्षण कार्यालय तक सीमित नहीं है,बताया जा रहा है कि बाल संप्रेक्षण गृह (बालक),बाल संप्रेक्षण गृह (बालिका),विशेष गृह (बालक), विशेष गृह (बालिका),प्लेस ऑफ सेफ्टी जैसी अत्यंत संवेदनशील संस्थाओं में भी कई स्थानों पर परिवीक्षा अधिकारी जैसे संविदा कर्मचारी प्रभारी की भूमिका निभा रहे हैं,यह व्यवस्था बाल संरक्षण की गंभीरता के अनुरूप नहीं मानी जा रही।
चार महीने में दो बार फरारी—क्या यह महज संयोग है?-बीते चार महीनों में दो बार अपचारी बालकों के फरार होने की घटनाएं सामने आई हैं,यह कोई साधारण प्रशासनिक त्रुटि नहीं है,ऐसे बच्चे न्यायिक प्रक्रिया के अधीन होते हैं और उनकी सुरक्षा की जिम्मेदारी पूरी तरह शासन की होती है,यदि लगातार सुरक्षा में सेंध लग रही है तो यह केवल किसी एक कर्मचारी की गलती नहीं,बल्कि पूरी निगरानी व्यवस्था की विफलता का संकेत माना जाएगा।
2021 की घटना भी नहीं बनी सबक– सूत्रों के अनुसार वर्ष 2021 में भी सूरजपुर-भैयाथान क्षेत्र का एक बालक संस्था से फरार हुआ था,आरोप है कि उस समय भी जिम्मेदार अधिकारियों के विरुद्ध प्रभावी कार्रवाई नहीं हुई, यदि वर्षों से ऐसी घटनाएं दोहराई जा रही हैं और प्रत्येक बार मामला ठंडे बस्ते में चला जाता है, तो यह प्रशासनिक जवाबदेही पर गंभीर प्रश्न खड़ा करता है।
नियम कहते हैं-अधीक्षक संस्था में रहेगा,लेकिन पालन कौन कराएगा?- जानकारों का कहना है कि नियमों के अनुसार संस्था अधीक्षक का निवास परिसर में होना चाहिए ताकि किसी भी आपात स्थिति में तत्काल हस्तक्षेप किया जा सके,लेकिन आरोप है कि अंबिकापुर की किसी भी शासकीय बाल संरक्षण संस्था में अधीक्षक या प्रभारी अधीक्षक संस्था परिसर में निवास नहीं करते,यदि यह तथ्य सही है तो रात के समय निगरानी,आकस्मिक निरीक्षण और सुरक्षा व्यवस्था प्रभावित होना स्वाभाविक है।
नियुक्तियों में भी अनियमितता के आरोप-सूत्रों के अनुसार बाल संप्रेक्षण गृह बालक में शासन द्वारा केवल एक परिवीक्षा अधिकारी का पद स्वीकृत था,इसके बावजूद दो लोगों की नियुक्ति कर वेतन भुगतान किए जाने की शिकायत सामने आई है,अब जबकि एक परिवीक्षा अधिकारी के त्यागपत्र देने की जानकारी मिल रही है,यह सवाल उठ रहा है कि अतिरिक्त नियुक्ति किस आधार पर हुई? यदि अतिरिक्त वेतन भुगतान हुआ तो उसकी प्रशासनिक और वित्तीय जिम्मेदारी किसकी है?
जिन सवालों का जवाब सरकार और विभाग को देना चाहिए…
– करोड़ों रुपये खर्च होने के बावजूद नियमित जिला बाल संरक्षण अधिकारी क्यों नहीं?
– संविदा कर्मियों को प्रशासनिक प्रभार किस नियम और आदेश के तहत दिया गया?
– चार महीने में दो बार बालक फरार होने की जिम्मेदारी किसकी तय हुई?
– क्या सुरक्षा चूक के बाद किसी अधिकारी पर विभागीय कार्रवाई हुई?
– अधीक्षक संस्था परिसर में क्यों नहीं रहते?
– एक स्वीकृत पद पर दो नियुक्तियां और वेतन भुगतान कैसे हुआ?
– क्या पूरे प्रदेश के बाल संरक्षण संस्थानों का सामाजिक एवं वित्तीय ऑडिट कराया जाएगा?
– क्या मिशन वात्सल्य की गाइडलाइन का पालन वास्तव में हो रहा है या केवल कागजों में?
– करोड़ों की योजनाएं, लेकिन प्रशासन संविदा के भरोसे?-
मिशन वात्सल्य के तहत बाल संप्रेक्षण गृह, विशेष गृह, प्लेस ऑफ सेफ्टी, बाल गृह तथा अन्य संरक्षण संस्थाओं के संचालन के लिए हर वर्ष करोड़ों रुपये खर्च किए जाते हैं, बच्चों के भोजन, चिकित्सा, शिक्षा, सुरक्षा, पुनर्वास, कर्मचारियों के वेतन और अन्य व्यवस्थाओं पर सरकारी धन खर्च होता है, ऐसे में यह सवाल स्वाभाविक है कि जब योजना करोड़ों रुपये की है तो उसका प्रशासनिक नेतृत्व नियमित और जवाबदेह अधिकारियों के हाथों में क्यों नहीं है? क्या संविदा कर्मियों को प्रशासनिक प्रभार देना केवल अस्थायी व्यवस्था है, या फिर इसे स्थायी रूप दे दिया गया है?
क्या शिकायतों का भी
कोई परिणाम नहीं निकलता?

बताया जा रहा है कि कर्मचारियों और प्रशासनिक कार्यप्रणाली को लेकर गंभीर शिकायतें उच्च स्तर तक भेजी गईं,लेकिन अब तक किसी ठोस कार्रवाई की जानकारी सामने नहीं आई,यदि शिकायतें केवल फाइलों में दबकर रह जाएं तो फिर निगरानी तंत्र की उपयोगिता पर भी प्रश्न उठना स्वाभाविक है।
सबसे बड़ा सवाल-क्या बाल संरक्षण व्यवस्था जवाबदेही से मुक्त है?
आज पूरा मामला केवल अंबिकापुर का नहीं रह गया है, यदि पूरे प्रदेश में बाल संरक्षण संस्थाओं का संचालन इसी प्रकार संविदा व्यवस्था और अतिरिक्त प्रभार के सहारे हो रहा है तो शासन को इसकी व्यापक समीक्षा करनी चाहिए, यहां रहने वाले बच्चे अपराधी नहीं,बल्कि कानून के तहत संरक्षण और सुधार के अधिकार वाले किशोर हैं। उनकी सुरक्षा से समझौता किसी भी स्थिति में स्वीकार्य नहीं हो सकता।
शासन से अपेक्षा
मामला बच्चों की सुरक्षा,न्यायिक व्यवस्था और सरकारी जवाबदेही से जुड़ा है। इसलिए आवश्यक है कि महिला एवं बाल विकास विभाग तथा राज्य शासन इस पूरे प्रकरण की उच्चस्तरीय,निष्पक्ष और समयबद्ध जांच कराए,यदि कहीं प्रशासनिक लापरवाही, नियमों का उल्लंघन या वित्तीय अनियमितता पाई जाती है तो संबंधित अधिकारियों और कर्मचारियों के विरुद्ध कठोर कार्रवाई की जाए।


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