100 निजी कॉलेज, लेकिन नौकरी नहीं, फार्मेसी छात्रों का भविष्य अधर में
फार्मेसी शिक्षा या डिग्री कारोबार? छत्तीसगढ़ में बढ़ते निजी कॉलेजों पर उठे सवाल
नॉन-अटेंडिंग से निकल रहे फार्मासिस्ट! प्रदेश की स्वास्थ्य व्यवस्था पर मंडराया खतरा
हर साल 7 हजार नए फार्मासिस्ट, लेकिन रोजगार के नाम पर सन्नाटा
फार्मेसी कॉलेजों की बाढ़, रोजगार का अकाल: युवा पूछ रहे—डिग्री लेकर जाएं कहाँ?
फार्मा शिक्षा की ‘फैक्ट्री’ बनता छत्तीसगढ़, गुणवत्ता और रोजगार दोनों संकट में
दवा से जुड़ी पढ़ाई पर सवाल, बिना क्लास, बिना प्रैक्टिकल बन रहे फार्मासिस्ट!
फार्मेसी डिग्री का बढ़ता बाजार, लेकिन सरकारी नौकरियों के दरवाजे बंद
स्वास्थ्य व्यवस्था से खिलवाड़? फार्मेसी शिक्षा में नकल, नॉन-अटेंडिंग और बेरोजगारी का खेल
प्रदेश में फार्मासिस्टों की फौज तैयार, लेकिन रोजगार नीति गायब
फार्मेसी शिक्षा की अंधाधुंध मंजूरी पर सवाल, युवाओं का भविष्य संकट में
-न्यूज़ डेक्स-
रायपुर/अंबिकापुर/कोरिया 19 मई 2026 (घटती-घटना)। छत्तीसगढ़ में फार्मेसी शिक्षा आज ऐसे मोड़ पर खड़ी दिखाई दे रही है, जहां डिग्रियों का उत्पादन तेजी से बढ़ रहा है, लेकिन रोजगार, गुणवत्ता और भविष्य लगातार सिकुड़ता जा रहा है। प्रदेश में पिछले कुछ वर्षों के भीतर निजी फार्मेसी कॉलेजों की संख्या विस्फोटक रूप से बढ़ी है, आंकड़ों के अनुसार प्रदेश में करीब 100 निजी फार्मेसी संस्थान संचालित हो रहे हैं, जबकि शासकीय स्तर पर स्वतंत्र फार्मेसी कॉलेजों की संख्या बेहद सीमित है।
हालांकि रायपुर के पंडित रविशंकर शुक्ल विश्वविद्यालय, गुरु घासीदास विश्वविद्यालय, गहिरागुरु विश्वविद्यालय तथा शासकीय पॉलिटेक्निक रायपुर में फार्मेसी पाठ्यक्रम संचालित हैं, लेकिन राज्य में अब तक स्वतंत्र और व्यापक स्तर पर सरकारी फार्मेसी शिक्षा व्यवस्था विकसित नहीं हो सकी है, इसी बीच निजी कॉलेजों की बढ़ती संख्या ने शिक्षा व्यवस्था को “व्यवसाय मॉडल” में बदलने के आरोपों को जन्म दिया है, विशेषज्ञों का कहना है कि यदि समय रहते इस क्षेत्र में नियंत्रण और सुधार नहीं किए गए, तो आने वाले वर्षों में हजारों फार्मेसी स्नातक बेरोजगारी, आर्थिक शोषण और मानसिक तनाव का सामना करने को मजबूर होंगे।

शिक्षा या सिर्फ डिग्री वितरण?- फार्मेसी शिक्षा मूल रूप से मानव स्वास्थ्य से जुड़ा अत्यंत संवेदनशील क्षेत्र माना जाता है, एक प्रशिक्षित फार्मासिस्ट केवल दवा विक्रेता नहीं होता, बल्कि मरीज तक सही दवा, सही मात्रा और सुरक्षित उपयोग सुनिश्चित करने में उसकी महत्वपूर्ण भूमिका होती है, लेकिन प्रदेश के कई निजी कॉलेजों पर गंभीर आरोप लग रहे हैं कि वहां नियमित पढ़ाई और प्रैक्टिकल प्रशिक्षण के बजाय “डिग्री वितरण मॉडल” हावी हो चुका है।
‘नॉन-अटेंडिंग’ संस्कृति ने बढ़ाई चिंता- प्रदेश के कई निजी संस्थानों में “नॉन-अटेंडिंग” व्यवस्था की चर्चाएं लगातार सामने आ रही हैं, आरोप हैं कि छात्रों से मोटी फीस लेकर उन्हें नियमित कक्षाओं में उपस्थित हुए बिना परीक्षा में बैठने की सुविधा दी जा रही है, शिक्षा जगत से जुड़े लोगों का कहना है कि कई छात्र कॉलेज परिसर तक पहुंचे बिना डिप्लोमा और डिग्री हासिल कर रहे हैं, हाल के वर्षों में तकनीकी माध्यमों और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) की मदद से सामूहिक नकल और परीक्षा प्रणाली में गड़बड़ियों की चर्चाओं ने भी फार्मेसी शिक्षा की साख पर बड़ा प्रश्नचिह्न लगा दिया है, विशेषज्ञों के अनुसार यदि बिना प्रैक्टिकल ज्ञान और कौशल के छात्र डिग्री लेकर निकलेंगे, तो इसका सीधा खतरा मरीजों की सुरक्षा और सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यवस्था पर पड़ेगा।

हर साल 7 हजार नए फार्मासिस्ट, लेकिन रोजगार के अवसर सीमित- प्रदेश में वर्तमान समय में लगभग 40 हजार पंजीकृत फार्मासिस्ट बताए जा रहे हैं, दूसरी ओर निजी कॉलेजों से हर वर्ष करीब 7 हजार नए छात्र फार्मेसी की डिग्री लेकर बाहर निकल रहे हैं, यदि यही स्थिति बनी रही, तो अगले पांच वर्षों में छत्तीसगढ़ में पंजीकृत फार्मासिस्टों की संख्या 80 हजार से लेकर 1 लाख तक पहुंच सकती है, सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर इतने युवाओं को रोजगार मिलेगा कहां? आज अधिकांश छात्र फार्मेसी को रोजगार और मेडिकल स्टोर लाइसेंस प्राप्त करने के माध्यम के रूप में देख रहे हैं, लेकिन मेडिकल स्टोरों की संख्या भी तेजी से बढ़ने के कारण प्रतिस्पर्धा तीव्र हो चुकी है, छोटे कस्बों और ग्रामीण क्षेत्रों में कई मेडिकल स्टोर सीमित आय के कारण टिक नहीं पा रहे।

सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था में भी गंभीर कमी, 6000 स्वास्थ्य केंद्र, लेकिन सिर्फ 1100 पद- जानकारी के अनुसार छत्तीसगढ़ में लगभग 6000 सरकारी स्वास्थ्य केंद्र संचालित हैं, लेकिन इनके मुकाबले केवल लगभग 1100 फार्मासिस्ट पद ही स्वीकृत हैं, स्थिति यह है कि अनेक स्वास्थ्य केंद्र बिना फार्मासिस्ट के संचालित हो रहे हैं, कई जगह दवा वितरण और औषधीय निगरानी की जिम्मेदारी अन्य कर्मचारियों के भरोसे चल रही है, स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि यह केवल रोजगार का नहीं, बल्कि जनस्वास्थ्य सुरक्षा का भी गंभीर मुद्दा है।

वर्षों से खाली पड़े तकनीकी पद- सीजीएमसी, शासकीय औषधि परीक्षण प्रयोगशालाओं और अन्य तकनीकी विभागों में भी लंबे समय से फार्मासिस्टों एवं फार्मा अधिकारियों के पद रिक्त बताए जा रहे हैं, युवाओं का आरोप है कि सरकार एक ओर निजी कॉलेजों को अनुमति दे रही है, वहीं दूसरी ओर रोजगार सृजन और भर्ती प्रक्रिया को लेकर गंभीर पहल नहीं कर रही, कई युवाओं का कहना है कि वे वर्षों तक पढ़ाई करने और लाखों रुपये खर्च करने के बाद भी नौकरी के लिए भटकने को मजबूर हैं।
ब्लड बैंक और वेटनरी अस्पतालों में भी अवसर की मांग- फार्मा क्षेत्र से जुड़े विशेषज्ञों का मानना है कि प्रदेश के शासकीय और निजी ब्लड बैंकों में प्रशिक्षित फार्मासिस्टों की नियुक्ति अनिवार्य की जानी चाहिए, इसी तरह वेटनरी अस्पतालों में भी फार्मासिस्ट पद सृजित करने की मांग लगातार उठ रही है, विशेषज्ञों का कहना है कि दवाओं की गुणवत्ता, सुरक्षित भंडारण, डोज प्रबंधन और औषधीय सलाह जैसे कार्यों में प्रशिक्षित फार्मासिस्टों की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण होती है।
फार्मासिस्ट संगठनों की प्रमुख मांगें
1. निजी कॉलेजों की सख्त जांच- फर्जी उपस्थिति, नॉन-अटेंडिंग व्यवस्था, सामूहिक नकल और शैक्षणिक अनियमितताओं की निष्पक्ष जांच कर कठोर कार्रवाई की मांग की जा रही है।
2. शासकीय फार्मेसी कॉलेज स्थापित हों- प्रदेश में गुणवत्तापूर्ण और सस्ती फार्मेसी शिक्षा के लिए नए स्वतंत्र शासकीय फार्मेसी कॉलेज खोलने की मांग तेज हो रही है।
3. रिक्त पदों पर तत्काल भर्ती- स्वास्थ्य केंद्रों, ब्लड बैंकों, औषधि परीक्षण प्रयोगशालाओं और वेटनरी अस्पतालों में रिक्त पदों को भरने की मांग उठ रही है।
फार्मासिस्ट केवल दवा विक्रेता नहीं- स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि डॉक्टर के बाद मरीज तक सही दवा और उसकी वैज्ञानिक जानकारी पहुंचाने में फार्मासिस्ट की भूमिका सबसे अहम होती है, यदि फार्मेसी शिक्षा केवल डिग्री बांटने तक सीमित हो गई, तो आने वाले समय में इसका असर प्रदेश की पूरी स्वास्थ्य व्यवस्था पर दिखाई देगा।
“सरकार को फार्मा सेक्टर विकसित करना होगा” — हीरा शंकर साहू- पूर्व निर्वाचित सदस्य छत्तीसगढ़ स्टेट फार्मेसी काउंसिल हीरा शंकर साहू ने कहा कि छत्तीसगढ़ सहित पूरे देश में फार्मेसी और फार्मासिस्टों की स्थिति चिंता का विषय बनती जा रही है, उन्होंने कहा कि लगातार डिग्री और डिप्लोमा प्राप्त कर रहे छात्र-छात्राएं रोजगार के लिए संघर्ष कर रहे हैं और फार्मेसी की डिग्री अब केवल मेडिकल स्टोर खोलने तक सीमित होती जा रही है, उनके अनुसार सरकार को नए रोजगार सृजन के लिए फार्मा सेक्टर को विकसित करना होगा। बड़ी दवा कंपनियों को छत्तीसगढ़ में निवेश के लिए मूलभूत सुविधाएं और प्रोत्साहन देना चाहिए ताकि प्रदेश के युवाओं को अपने ही राज्य में रोजगार मिल सके।
“नॉन-अटेंडिंग कॉलेजों की न्यायालयीन जांच हो” — राहुल वर्मा- इंडियन फार्मासिस्ट एसोसिएशन के प्रदेश सचिव राहुल वर्मा ने कहा कि फार्मासिस्ट सीधे जनस्वास्थ्य से जुड़ा प्रोफेशन है, उन्होंने कहा कि कोविड महामारी के बाद मेडिकल स्टोर खोलने की होड़ में फार्मेसी शिक्षा की ओर लोगों का रुझान तेजी से बढ़ा है, कई लोग केवल लाइसेंस और मेडिकल स्टोर के उद्देश्य से डी.फार्म कोर्स कर रहे हैं, राहुल वर्मा ने आरोप लगाया कि शॉर्टकट डिग्री लेने के लिए कई छात्र “नॉन-अटेंडिंग” कोर्स का सहारा ले रहे हैं, उन्होंने कहा कि ऐसे निजी कॉलेजों की न्यायालय की निगरानी में जांच कराने के लिए इंडियन फार्मासिस्ट एसोसिएशन जनहित याचिका दायर करेगा।
बड़ा सवाल — क्या सरकार समय रहते जागेगी?- छत्तीसगढ़ में फार्मेसी शिक्षा का यह तेजी से फैलता ढांचा अब कई गंभीर सवाल खड़े कर रहा है, क्या शिक्षा व्यवस्था को गुणवत्ता आधारित बनाया जाएगा? क्या रोजगार सृजन की दिशा में ठोस नीति बनेगी? क्या निजी कॉलेजों की जवाबदेही तय होगी? और सबसे महत्वपूर्ण — क्या हजारों युवाओं का भविष्य सुरक्षित किया जा सकेगा? फिलहाल इन सवालों के जवाब भविष्य के गर्भ में हैं, लेकिन एक बात साफ है कि यदि समय रहते सुधार नहीं किए गए, तो फार्मेसी शिक्षा का यह अनियंत्रित विस्तार आने वाले वर्षों में शिक्षा और स्वास्थ्य — दोनों क्षेत्रों के लिए बड़ी चुनौती बन सकता है।
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