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कोरिया@ हाईकोर्ट का आईना,कोरिया का ‘प्रभार प्रयोग’ और नई हलचल, क्या अब लौटेगा सीईओ को अधिकार?

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  • टूटी शिला पट्टिकाओं से शुरू हुआ विवाद अब पहुंचा प्रशासनिक अधिकारियों तक,
  • गैर-राजपत्रित को प्रभार और छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट बिलासपुर की टिप्पणी के बाद कोरिया में फैसलों पर गहराता संशय
  • हाईकोर्ट की टिप्पणी के बाद भी कोरिया में ‘प्रभार प्रयोग’ जारी, जिम्मेदारी अब भी सवालों में
  • सीईओ प्रभार विवाद में घिरा कोरिया,
  • हाईकोर्ट के बाद भी नहीं बदली व्यवस्था
  • राजपत्रित बाहर,गैर-राजपत्रित अंदर: कोरिया का नया प्रशासनिक मॉडल सवालों में
  • हाईकोर्ट की नसीहत के बाद भी कोरिया में वही हाल,जिम्मेदारी से बचता सिस्टम
  • प्रभार बदला,सवाल बढ़ा:हाईकोर्ट के बाद कोरिया में प्रशासनिक फैसलों पर बहस तेज

-रवि सिंह-
कोरिया,08 अप्रैल 2026(घटती-घटना)।
कभी एक आयोजन,कभी एक आदेश और अब एक टिप्पणी कोरिया जिले की प्रशासनिक कहानी इन दिनों लगातार नए अध्याय जोड़ रही है,कोरिया उत्सव 2026 के दौरान टूटी शिला पट्टिकाओं से शुरू हुआ विवाद अब केवल लापरवाही तक सीमित नहीं रहा, बल्कि यह प्रशासनिक अधिकार, जवाबदेही और निर्णय प्रक्रिया की पारदर्शिता तक पहुंच गया है,जहां पहले सवाल यह था कि शिलान्यास के बाद पट्टिकाएं क्यों टूटी, वहीं अब सवाल यह है कि उस घटना के बाद जो प्रशासनिक कार्रवाई हुई,वह कितनी वैध थी? इसी बीच छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट बिलासपुर की टिप्पणी ने इस पूरे मामले को एक नया मोड़ दे दिया है, कोर्ट ने साफ कर दिया कि जनपद सीईओ का प्रभार बदलना कलेक्टर के अधिकार क्षेत्र में नहीं आता, इस टिप्पणी के बाद कोरिया जिले में एक नई बहस शुरू हो गई है, जिन सीईओ को प्रभार से हटाकर जिला मुख्यालय में संलग्न किया गया था, क्या उन्हें अब पुनः उनके पद का प्रभार मिलेगा? या फिर प्रशासन अपने पुराने निर्णयों पर कायम रहेगा? स्थिति और भी जटिल तब हो जाती है जब यह सामने आता है कि राजपत्रित अधिकारियों को संलग्न कर,जनपद पंचायतों का संचालन गैर-राज पत्रित कर्म चारियों के हाथों में सौंप दिया गया है, यह व्यवस्था अस्थायी है या नई परंपरा यह अब तक स्पष्ट नहीं हो पाया है, अब कोरिया जिले में हर चर्चा का केंद्र यही है कि क्या हाईकोर्ट की टिप्पणी के बाद प्रशासन अपने फैसलों की समीक्षा करेगा, या फिर यह प्रभार प्रयोग आगे भी जारी रहेगा।
हाईकोर्ट की टिप्पणी के बाद बदला परिदृश्य
हाईकोर्ट की टिप्पणी क्या कहती है गौरेला-पेंड्रा-मरवाही जिले की जनपद सीईओ शुभ्रा दामोदर मिश्रा की याचिका पर सुनवाई करते हुए छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट बिलासपुर ने यह महत्वपूर्ण टिप्पणी की कि जनपद सीईओ का प्रभार बदलना कलेक्टर के अधिकार क्षेत्र में नहीं आता, कोर्ट ने संकेत दिया कि इस प्रकार के प्रशासनिक निर्णय राज्य सरकार के स्तर पर ही लिए जाने चाहिए, इस आदेश के बाद संबंधित जिले में सीईओ का प्रभार यथावत रखने की स्थिति बन गई है, इस टिप्पणी के बाद यह सवाल और गहरा हो गया है कि कोरिया जिले में लिए गए निर्णयों की स्थिति क्या होगी?
श्रेय ऊपर, जवाबदेही नीचे—कोरिया मॉडल?
कोरिया जिले की वर्तमान स्थिति को एक लाइन में समझना हो तो कहा जा सकता है निर्णय ऊपर, जिम्मेदारी नीचे, मंच पर श्रेय लेने की होड़ है, और जमीन पर जिम्मेदारी तय करने की उलझन, कोरिया की यह पूरी कहानी केवल एक आयोजन या एक प्रशासनिक निर्णय की नहीं है, बल्कि यह उस व्यवस्था का आईना है जिसमें समन्वय, जवाबदेही और अधिकारों के बीच संतुलन कमजोर पड़ता दिखाई दे रहा है, छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट बिलासपुर की टिप्पणी ने अब इस मामले को एक नई दिशा दे दी है, अब देखना यह है कि कोरिया प्रशासन इस आईने में खुद को देखता है और सुधार करता है, या फिर यह पूरा मामला भी समय के साथ एक और फाइल बनकर रह जाएगा।
युवा अधिकारियों पर असर और सिस्टम की चुनौती
प्रभावित अधिकारी अपेक्षाकृत युवा हैं और उनका करियर अभी प्रारंभिक दौर में है, ऐसे में इस तरह की कार्रवाई उनके आत्मविश्वास और कार्यशैली पर प्रभाव डाल सकती है, यह प्रशासन के लिए भी एक चुनौती है कि वह जवाबदेही तय करते समय संतुलन बनाए रखे।
क्या अब होगा प्रभार वापस? सबसे बड़ा सवाल
अब पूरे मामले में सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या हाईकोर्ट की टिप्पणी के बाद कोरिया कलेक्टर अपने निर्णयों की समीक्षा करेंगी? क्या राज्य शासन से नियुक्त सीईओ को उनका प्रभार वापस मिलेगा? या फिर यह मामला भी समय के साथ ठंडा पड़ जाएगा?
शिलान्यास से विवाद तक : जहां से शुरू हुई पूरी कहानी
कोरिया उत्सव के दौरान हुए शिलान्यास और लोकार्पण कार्यक्रमों ने जिले में विकास की एक बड़ी तस्वीर पेश की थी, लेकिन कार्यक्रम के बाद मैदान में टूटी और बिखरी शिला पट्टिकाओं ने उस तस्वीर को धुंधला कर दिया था,यह केवल एक आयोजन की चूक नहीं थी, बल्कि इसने प्रशासनिक निगरानी और समन्वय की कमी को उजागर कर दिया था, इसके बाद जो कार्रवाई हुई, उसने मामले को और उलझा दिया था।
कार्यक्रम खत्म,कार्रवाई शुरू—और दिशा बदली
पट्टिकाओं के टूटने की घटना के बाद प्रशासन ने त्वरित कार्रवाई करते हुए जनपद सीईओ को उनके पद से हटाकर जिला मुख्यालय में संलग्न कर दिया,लेकिन स्थानीय चर्चाओं में यह सवाल लगातार उठता रहा कि निगरानी की जिम्मेदारी किसकी थी? और कार्रवाई किस पर हुई? यानी समस्या एक दिशा में थी और समाधान दूसरी दिशा में खोजा गया।
प्रभार प्रयोग ने बढ़ाई हलचल
अब इस पूरे मामले में नया मोड़ तब आया जब यह सामने आया कि राजपत्रित अधिकारियों को संलग्न कर, जनपद पंचायतों का प्रभार गैर-राजपत्रित कर्मचारियों को सौंप दिया गया है, यह व्यवस्था प्रशासनिक हलकों में चर्चा का विषय बन गई है, इसे लेकर दो तरह की राय सामने आ रही है, एक पक्ष इसे त्वरित प्रशासनिक समाधान बता रहा है, जबकि दूसरा इसे नियमों के विपरीत और असंतुलित व्यवस्था मान रहा है।
गैर-राजपत्रित को वित्तीय अधिकारः नियम या लचीलापन?
जनपद स्तर पर आहरण-संवितरण जैसे वित्तीय अधिकार सामान्यतः राजपत्रित अधिकारियों के पास होते हैं, ऐसे में यदि यह प्रभार गैर-राजपत्रित कर्मचारियों को दिया गया है,तो यह स्पष्ट होना आवश्यक है कि यह अस्थायी व्यवस्था है या नियमों में लचीलापन अपनाया गया है, विशेषज्ञों का मानना है कि यदि यह व्यवस्था लंबे समय तक जारी रहती है, तो यह प्रशासनिक संतुलन को प्रभावित कर सकती है।
न्यायालय नहीं गए—मर्यादा या मजबूरी?
इस पूरे मामले में एक महत्वपूर्ण पहलू यह भी है कि प्रभावित अधिकारियों ने अब तक न्यायालय का सहारा नहीं लिया, यदि वे जाते, तो संभवतः स्थिति अलग होती, उनका यह निर्णय एक ओर प्रशासनिक मर्यादा का संकेत है,तो दूसरी ओर यह भी दर्शाता है कि सिस्टम के भीतर संतुलन बनाए रखने की कोशिश की गई।


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