
कोरिया में ‘कोयला-भट्ठा’ सिंडिकेट का खुलासा? कानून के रखवालों से लेकर राजनीति तक पर उठे सवाल
- अवैध ईंट भट्ठों के संचालन में अब पुलिसकर्मी भी हुए संलिप्त,पटना से लगे शंकर नगर के समीप पुलिसकर्मी का है अवैध ईंट भट्ठा,सूत्र
- अवैध ईंट भट्ठे का सीधा संबंध है कोयला चोरी से,कोयला चोरी रोकने वाले ही संलिप्त हुए चोरी में : सूत्र
- एक साल से बंद कोयला चोरी के कारोबार को मिल चुकी है हरि झंडी,सुशासन सरकार में कोयला चोरी वैध?
- कोयला चोरी के मामले में विपक्ष भी रहता है मौन,कोयला चोरी कारोबार को लेकर विपक्ष नहीं करता सरकार पर हमला
-रवि सिंह-
कोरिया/पटना,22 मार्च 2026 (घटती-घटना)। जिले के पटना नगर पंचायत से लगे शंकर नगर क्षेत्र से सामने आई एक सनसनीखेज जानकारी ने प्रशासनिक व्यवस्था, पुलिस तंत्र और राजनीतिक तंत्र तीनों की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं,सूत्रों के अनुसार, पटना थाना में पदस्थ एक आरक्षक का अवैध ईंट भट्ठा संचालित हो रहा है, और यह भट्ठा कथित तौर पर कोयला चोरी के संगठित नेटवर्क से जुड़ा हुआ है, यदि यह आरोप सही साबित होते हैं,तो यह मामला सिर्फ एक अवैध कारोबार का नहीं,बल्कि कानून के रखवालों के भीतर ही पनपते अवैध तंत्र का उदाहरण बन जाएगा।
तबादला आदेश बेअसर, अनुशासन पर सवाल
मामले में यह भी सामने आया है कि एक आरक्षक का तबादला करीब 6 महीने पहले हुआ और दूसरे का एक महीने पहले सूत्रों के अनुसार एक आरक्षक ने रवानगी ले ली, जबकि दूसरा अब तक पदस्थ बना हुआ है,इस स्थिति में पुलिस अधीक्षक के आदेशों की प्रभावशीलता पर भी सवाल उठ रहे हैं। यदि आदेशों का पालन ही नहीं हो रहा,तो यह प्रशासनिक नियंत्रण और अनुशासन के लिए गंभीर संकेत है।
स्थानांतरण के बाद भी ‘जमे’ आरक्षक,उठे गंभीर सवाल
पटना थाना क्षेत्र से सामने आ रही जानकारी के अनुसार,शंकर नगर के पास संचालित अवैध ईंट भट्ठा एक ऐसे आरक्षक का बताया जा रहा है,जिसका स्थानांतरण पहले ही हो चुका है,इसके बावजूद वह अब तक रवानगी नहीं ले रहा और उसी थाना क्षेत्र में पदस्थ बना हुआ है,यदि सूत्रों का दावा सही है,तो यह स्थिति बेहद गंभीर मानी जा रही है,क्योंकि एक ओर जहां पुलिसकर्मियों पर कानून व्यवस्था बनाए रखने की जिम्मेदारी होती है,वहीं दूसरी ओर उसी तंत्र का हिस्सा किसी अवैध कारोबार में संलिप्त बताया जाना पूरे सिस्टम की साख पर प्रश्नचिह्न खड़ा करता है।
ड्रोन शराब पर,कोयला क्यों नहीं? निगरानी पर उठते सवाल
हाल ही में जिले में अवैध कच्ची शराब के खिलाफ ड्रोन कैमरों के माध्यम से निगरानी कर कार्रवाई की गई, जिसे प्रशासन ने बड़ी उपलब्धि के रूप में प्रस्तुत किया, जंगलों में छिपे अवैध शराब कारोबारियों को तकनीक के जरिए पकड़ना निश्चित ही सराहनीय कदम है,लेकिन यही तकनीक कोयला चोरी जैसे बड़े और संगठित अपराध पर क्यों नहीं लागू की जा रही? सूत्रों के अनुसार,जिले में अवैध ईंट भट्ठों की संख्या तेजी से बढ़ रही है और इनमें से कई का संचालन प्रभावशाली लोगों—राजनीतिक, प्रशासनिक या पुलिस से जुड़े व्यक्तियों—द्वारा किया जा रहा है। ऐसे में यह सवाल और भी गंभीर हो जाता है कि इन गतिविधियों पर समान स्तर की निगरानी क्यों नहीं है,यदि ड्रोन तकनीक से जंगलों में शराब बनाने वालों को पकड़ा जा सकता है,तो खुलेआम सड़कों पर चल रहे कोयला परिवहन और भट्ठों की निगरानी क्यों नहीं हो सकती? यह स्थिति संकेत देती है कि या तो प्राथमिकताएं तय करने में असंतुलन है,या फिर कुछ क्षेत्रों में जानबूझकर नजरअंदाज किया जा रहा है, अंततः सवाल यही है की क्या निगरानी भी अब चयनित हो गई है?
शंकर नगर का मामलाः जब पुलिसकर्मी ही बन जाए ‘व्यवसायी’
कोरिया जिले के नगर पंचायत पटना से लगे शंकर नगर क्षेत्र से एक बेहद गंभीर और चिंताजनक मामला सामने आ रहा है, सूत्रों के अनुसार, पटना थाना में पदस्थ एक आरक्षक का अवैध ईंट भट्ठा इसी क्षेत्र में संचालित हो रहा है। खास बात यह है कि उक्त आरक्षक का स्थानांतरण हो चुका है, लेकिन वह अब तक रवानगी नहीं ले रहा, और इसके पीछे कारण बताया जा रहा है उसका यही कथित अवैध कारोबार, सूत्रों का दावा है कि इस ईंट भट्ठे का सीधा संबंध कोयला चोरी से है, जहां चोरी का कोयला भट्ठों में खपाया जाता है। यदि यह सच है, तो यह स्थिति अत्यंत गंभीर है, क्योंकि जिस पुलिस पर कानून व्यवस्था बनाए रखने और अवैध गतिविधियों को रोकने की जिम्मेदारी है, वही यदि इन गतिविधियों में शामिल पाई जाए, तो यह पूरे सिस्टम की साख पर गहरा धब्बा है, बताया जा रहा है कि एक वर्ष तक सीमित स्तर पर चल रहा कोयला चोरी का कारोबार अब फिर से पूरी सक्रियता के साथ शुरू हो गया है। रात के समय कोयला से भरी गाडि़यां तेज रफ्तार से परिवहन करती नजर आ रही हैं। ऐसे में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या इस अवैध गतिविधि को कहीं न कहीं संरक्षण मिल रहा है?
राजनीति और कोयला : जहां विरोध भी थम जाता है…
कोरिया जिले में कोयला चोरी का कारोबार कोई नया नहीं है,लेकिन इसकी सबसे चिंताजनक बात यह है कि इसमें विभिन्न राजनीतिक दलों से जुड़े लोगों के नाम समय-समय पर सामने आते रहे हैं, यह भी कहा जाता है कि इस अवैध व्यापार में शामिल लोग अलग-अलग दलों से जुड़े होने के बावजूद एक साझा समझ के तहत काम करते हैं, यही कारण है कि यह मुद्दा कभी भी राजनीतिक बहस का केंद्र नहीं बन पाता। जहां एक ओर विपक्ष अन्य अवैध गतिविधियों जैसे अफीम की खेती पर खुलकर सरकार को घेरता है,वहीं कोयला चोरी जैसे बड़े और संगठित अपराध पर उसकी चुप्पी कई सवाल खड़े करती है, अब सूत्रों के हवाले से यह भी सामने आ रहा है कि इस कारोबार में कानून के रखवालों की भी कथित भागीदारी बढ़ रही है,यदि ऐसा है, तो यह न केवल प्रशासनिक विफलता है, बल्कि यह दर्शाता है कि अवैध लाभ के इस नेटवर्क में प्रभावशाली वर्गों की हिस्सेदारी सुनिश्चित है, सबसे बड़ा सवाल यही है,क्या यह ऐसा व्यापार बन चुका है,जहां राजनीति और प्रशासन दोनों की सीमाएं धुंधली हो गई हैं?
जब नेता उतरे मैदान मेंः एक साल थमा कोयला खेल,अब फिर क्यों सक्रिय?
गत वर्ष कोरिया जिले में कोयला चोरी के कारोबार पर अचानक ब्रेक तब लगा,जब भाजपा जिलाध्यक्ष ने खुद मोर्चा संभाल लिया था, उन्होंने न सिर्फ छापेमारी की,बल्कि एक टीम बनाकर लगातार निगरानी भी की,इस सक्रिय हस्तक्षेप का असर यह हुआ कि वर्षों से जड़ें जमा चुके इस अवैध कारोबार की रफ्तार थम गई और करीब एक साल तक यह गतिविधि सीमित स्तर पर सिमट गई,उस दौरान कोयला चोरी से जुड़े लोगों के बीच मायूसी का माहौल देखने को मिला था,लेकिन इस घटनाक्रम ने एक बड़ा और असहज सवाल भी खड़ा किया—जिस अवैध कारोबार को दशकों तक पुलिस और प्रशासन मिलकर भी पूरी तरह नियंत्रित नहीं कर सके,उसे एक राजनीतिक पदाधिकारी ने अपने स्तर पर कैसे रोक दिया? क्या यह कानून व्यवस्था की विफलता नहीं दर्शाता? और उससे भी बड़ा सवाल यह है कि क्या किसी राजनीतिक दल के जिलाध्यक्ष का काम कानून लागू कराना है,या यह जिम्मेदारी प्रशासन और पुलिस की है? यदि कानून के रखवालों की मौजूदगी के बावजूद ऐसा अवैध कारोबार फलता-फूलता रहा और उसे रोकने के लिए गैर-प्रशासनिक हस्तक्षेप की जरूरत पड़ी,तो यह पूरे सिस्टम पर गंभीर प्रश्नचिह्न खड़ा करता है, चिंता की बात यह भी है कि इस वर्ष वही सख्ती नजर नहीं आ रही। भाजपा जिलाध्यक्ष का मौन और सक्रियता का अभाव अब चर्चा का विषय बन गया है, सूत्रों के अनुसार,इसी कारण कोयला चोरी का कारोबार फिर से अपने पुराने स्वरूप में लौट आया है और एक बार फिर रात के अंधेरे में यह अवैध व्यापार धड़ल्ले से चलने लगा है,आखिर सवाल यही है—क्या कानून व्यवस्था व्यक्तियों पर निर्भर है, या फिर सिस्टम खुद सक्षम है?
सीडीआर जांच से खुल सकते हैं बड़े राज
सूत्रों का मानना है कि यदि संबंधित आरक्षक और अन्य पुलिसकर्मियों की सीडीआर जांच की जाए,तो कोयला चोरी के नेटवर्क से जुड़े कई अहम खुलासे हो सकते हैं,किन लोगों से संपर्क था,किन समयों में गतिविधियां हुईं, किन-किन की भूमिका रही, ऐसी जांच पूरे नेटवर्क की सच्चाई सामने ला सकती है।
ईंट बेचकर ही थाने से रवानगी की तैयारी? आरक्षक पर उठे सवाल
सूत्रों के अनुसार,तबादला होने के बावजूद एक आरक्षक पुलिस थाना पटना से रवानगी लेने में देरी कर रहा है, आरोप है कि वह लगातार निर्माणाधीन भवनों के मालिकों, ठेकेदारों और सरपंचों से संपर्क कर ईंट बेचने की कोशिश में जुटा हुआ है, चर्चा है कि आरक्षक इस फिराक में है कि पर्याप्त ईंटों की बिक्री कर लेने के बाद ही वह थाने से औपचारिक रूप से रवानगी लेगा। इस पूरे मामले ने पुलिस विभाग की कार्यप्रणाली और अनुशासन पर सवाल खड़े कर दिए हैं।
कोयला चोरी पर विपक्ष की चुप्पी क्यों?
हाल के दिनों में प्रदेश में अवैध अफीम की खेती जैसे मामलों को लेकर विपक्ष काफी मुखर रहा है और सरकार पर लगातार हमला कर रहा है, लेकिन इसके उलट कोयला चोरी जैसे गंभीर और संगठित अपराध पर विपक्ष की चुप्पी कई सवाल खड़े करती है,यह स्थिति सोचने पर मजबूर करती है कि क्या यह मुद्दा राजनीतिक रूप से ‘संवेदनशील’ है? या फिर इसमें सभी पक्षों की कहीं न कहीं हिस्सेदारी है? सबसे बड़ा सवाल यही है क्या कोयला चोरी को उतनी गंभीरता से नहीं देखा जा रहा,जितनी अन्य अवैध गतिविधियों को?
सवाल कई,जवाब अभी बाकी
यह पूरा मामला सिर्फ एक आरक्षक या एक अवैध भट्ठे तक सीमित नहीं है,बल्कि यह व्यापक स्तर पर सिस्टम की कार्यप्रणाली और जवाबदेही को लेकर सवाल खड़ा करता है,क्या नियम सिर्फ कागजों तक सीमित हैं? क्या अवैध कारोबार के सामने प्रशासनिक आदेश कमजोर पड़ रहे हैं? इन सवालों के जवाब ही तय करेंगे कि कानून व्यवस्था मजबूत है या सिर्फ दिखावे तक सीमित।
क्या इसी कारोबार के लिए वह पटना थाना छोड़ने को तैयार नहीं
आरक्षक आज भी पटना थाने में पदस्थ है, वह तबादला होने उपरांत भी रवानगी लेने से बच रहा है,आरक्षक का अवैध ईंट भट्ठे का कारोबार है,वह कोयला चोरी में संलिप्त है,चोरी का कोयला उसके अवैध ईंट भट्ठे तक पहुंच रहा है ऐसा बतलाया जा रहा है,अब सवाल यह है कि क्या इसलिए वह पटना थाना नहीं छोड़ना चाहता।
आरक्षक वही है जिनका स्थानांतरण हो चुका है पर यहीं पर जमे हुए हैं
पटना से लगे शंकर नगर के पास संचालित ईंट भट्ठा एक आरक्षक का है जो पटना पुलिस थाने में पदस्थ है यह सूत्रों का दावा है,सूत्रों का दावा यदि सही है तो यह कानून व्यवस्था जिले की को लेकर गंभीर मामला है क्योंकि एक कानून का रखवाला अब अवैध कारोबार में खुलकर सामने है,वैसे यह वही आरक्षक है जिसका तबादला हो चुका है लेकिन वह अभी भी रवानगी लेने से बच रहा है और इसके पीछे की वजह उसका अवैध ईंट भट्ठा माना जा रहा है,आरक्षक का अवैध ईंट भट्ठा लगातार ईंट निर्माण कर विक्रय कर रहा है।
आरक्षक की सीडीआर निकाली जाए तो खुलेंगे राज
सूत्रों का कहना है कि यदि पटना पुलिस थाने में पदस्थ उस आरक्षक जिसके कि अवैध ईंट भट्ठे संचालन की बात सामने आई है सहित अन्य आरक्षकों की सीडीआर निकाली जाए,बड़े राज जो कोयला चोरी के कारोबार से जुड़ा राज है सामने लाने में कारगर साबित होगी,बताया जाता है पटना में कोयला चोरी में अधिकांश पुलिस कर्मियों के हाथ काले हैं,और इस बात की असलियत केवल सीडीआर से सामने आ सकती है।
क्या अवैध भट्ठा ही रोक रहा है रवानगी?
सूत्रों के मुताबिक,उक्त आरक्षक का अवैध ईंट भट्ठा लगातार संचालित हो रहा है और ईंट निर्माण व बिक्री का कार्य भी जारी है, यह भी कहा जा रहा है कि आरक्षक कोयला चोरी नेटवर्क से जुड़ा हुआ है,चोरी का कोयला उसके भट्ठे तक पहुंचता है,इसी कारण वह थाना छोड़ने से बच रहा है,ऐसे में बड़ा सवाल यही उठता है, क्या अवैध कारोबार की वजह से ही वह अपनी नई पोस्टिंग जॉइन नहीं कर रहा?
अफीम की खेती मामले में मुखर विपक्ष कोयला चोरी विषय में मौन क्यों है?
हाल के दिनों में प्रदेश में कई जगहों पर अफीम की अवैध खेती की घटनाएं सामने आई हैं,इसे लेकर विपक्ष सत्ता पक्ष पर हमलवार है,यह विपक्ष का एक सराहनीय कार्य भी माना जाएगा जो अवैध गतिविधियों पर लगाम के लिए सड़क की लड़ाई लड़ रहा है,वहीं यही विपक्ष कोयला चोरी के विषय पर मौन है,और ऐसा क्यों है यह एक विचित्रता है,विपक्ष आज का हो या कल का किसी ने कोयला चोरी को लेकर मुखरता विरोध स्थिति में दर्ज नहीं कराई जो इस सवाल को जन्म देती है कि क्या कोयला चोरी एक अवैध,और राष्ट्र राज्य द्रोह की श्रेणी का अपराध नहीं है।
एक आरक्षक का 6 महीने पहले तबादला,दूसरे आरक्षक का एक महीना पहले तबादला पर एसपी का आदेश सिर्फ आदेश की रह गया,पालन नहीं हुआ…
एक आरक्षक का तबादला 6 महीने पहले हुआ है वहीं एक का एक महीने पहले,एक ने रवानगी ली है ऐसा सूत्रों का कहना है,दूसरे ने नहीं ली है ,इस तरह देखा जाए तो पुलिस अधीक्षक का आदेश आदेश ही तक सीमित है,इन आदेशों का प्रभाव नहीं पड़ रहा है आरक्षक पर।
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