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खड़गवां/रतनपुर@मंत्री के गृहग्राम में ही विकास ध्वस्त…करोड़ों की नहर एक महीने में दरक गई

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  • घटिया निर्माण का आरोप, किसानों को सिंचाई संकट का डर — जांच की मांग तेज
  • मंत्री के गृहग्राम में ही घटिया निर्माण!
  • करोड़ों की नहर लाइनिंग एक माह भी नहीं टिक पाई, जगह-जगह दरारें


-राजेन्द्र शर्मा-
खड़गवां/रतनपुर,17 मार्च 2026 (घटती-घटना)। छत्तीसगढ़ शासन की महत्वाकांक्षी सिंचाई योजनाओं में शामिल तामडाड़ जलाशय से जुड़ी नहर लाइनिंग परियोजना अब गंभीर सवालों के घेरे में आ गई है। खास बात यह है कि यह परियोजना राज्य के स्वास्थ्य मंत्री के गृहग्राम रतनपुर में ही संचालित की गई थी, जहां विकास कार्यों की गुणवत्ता को लेकर आदर्श उदाहरण पेश किए जाने की उम्मीद थी। लेकिन वास्तविकता इसके उलट सामने आई है, स्थानीय ग्रामीणों और किसानों के अनुसार करोड़ों रुपये की लागत से तैयार की गई नहर लाइनिंग एक माह भी नहीं टिक सकी और अब कई स्थानों पर दरारें साफ दिखाई दे रही हैं। यह स्थिति न केवल निर्माण कार्य की गुणवत्ता पर सवाल खड़े करती है, बल्कि पूरे सिस्टम की जवाबदेही पर भी गंभीर प्रश्नचिह्न लगाती है।
क्या है पूरा मामला?
तामडाड़ जलाशय से निकलने वाली इस नहर का उद्देश्य आसपास के गांवों के खेतों तक सिंचाई के लिए पानी पहुंचाना था, इसके लिए नहर की दीवारों और तल को मजबूत बनाने हेतु कंक्रीट लाइनिंग का कार्य कराया गया था, ताकि पानी का रिसाव रोका जा सके और अधिकतम खेतों तक पानी पहुंच सके, लेकिन निर्माण के कुछ ही समय बाद नहर की सतह पर दरारें पड़ना शुरू हो गईं। कई स्थानों पर कंक्रीट की परत उखड़ने लगी है और किनारों पर टूट-फूट साफ नजर आ रही है, ग्रामीणों का आरोप है कि जहां उच्च गुणवत्ता वाली सामग्री का उपयोग होना चाहिए था, वहां घटिया मिश्रण और मानकों की अनदेखी की गई, यही कारण है कि नहर की लाइनिंग इतनी जल्दी कमजोर पड़ गई।
गुणवत्ता नियंत्रण पर बड़ा सवाल
इस घटना ने एक बार फिर निर्माण कार्यों में गुणवत्ता नियंत्रण प्रणाली पर सवाल खड़े कर दिए हैं, सामान्यतः ऐसे प्रोजेक्ट्स में तकनीकी स्वीकृति,साइट निरीक्षण,सामग्री परीक्षण,कार्य पूर्ण होने के बाद निरीक्षण जैसी प्रक्रियाएं अनिवार्य होती हैं,लेकिन यदि एक माह के भीतर ही निर्माण टूटने लगे,तो यह संकेत देता है कि या तो इन प्रक्रियाओं का पालन नहीं हुआ या फिर कागजों में ही पूरा कर दिया गया।
मंत्री के गृहग्राम से उठे बड़े सवाल
यह मामला इसलिए और गंभीर हो जाता है क्योंकि यह परियोजना मंत्री के गृहग्राम में ही बनाई गई थी,ऐसे में यह सवाल उठना स्वाभाविक है यदि मंत्री के अपने क्षेत्र में ही निर्माण की यह स्थिति है,तो दूरदराज के क्षेत्रों में क्या हाल होगा? क्या निगरानी तंत्र वास्तव में काम कर रहा है? या फिर योजनाएं सिर्फ कागजों और उद्घाटन तक ही सीमित रह गई हैं?
विकास या दिखावा?
तामडाड़ जलाशय से जुड़ी यह नहर परियोजना किसानों के लिए उम्मीद की किरण बन सकती थी, लेकिन वर्तमान स्थिति ने इसे सवालों के घेरे में ला खड़ा किया है,यदि आरोप सही हैं और निर्माण में लापरवाही हुई है,तो यह सिर्फ एक परियोजना की विफलता नहीं,बल्कि पूरे विकास मॉडल पर सवाल है, अब निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि क्या इस मामले की निष्पक्ष जांच होगी? क्या दोषियों पर कार्रवाई होगी? या फिर यह मामला भी समय के साथ फाइलों में दब जाएगा? सबसे बड़ा सवालः जब मंत्री के गृहग्राम में ही विकास कार्यों की यह स्थिति है, तो बाकी क्षेत्रों में हो रहे निर्माण कार्यों की गुणवत्ता कैसी होगी?
ग्रामीणों का आक्रोश और सवाल
स्थानीय निवासियों और किसानों में इस पूरे मामले को लेकर नाराजगी साफ दिखाई दे रही है,उनका कहना है कि इतनी बड़ी राशि खर्च होने के बावजूद निर्माण इतना कमजोर कैसे हो गया? क्या निर्माण के दौरान किसी प्रकार का गुणवत्ता परीक्षण किया गया था? यदि किया गया था, तो फिर इतनी जल्दी दरारें क्यों आईं? एक किसान ने नाम न छापने की शर्त पर कहा हमने सोचा था कि अब खेतों तक पानी पहुंचेगा, लेकिन अब तो नहर ही टूटने लगी है,अगर यही हाल रहा तो पूरी योजना बेकार हो जाएगी।
किसानों के सामने संकट की आशंका
इस नहर का मुख्य उद्देश्य किसानों को समय पर सिंचाई सुविधा उपलब्ध कराना था,लेकिन लाइनिंग में आई दरारों के कारण अब पानी के रिसाव की आशंका बढ़ गई है,यदि नहर से पानी रिसने लगा तो खेतों तक पर्याप्त पानी नहीं पहुंचेगा,सिंचाई प्रभावित होगी,फसल उत्पादन पर सीधा असर पड़ेगा,यह स्थिति किसानों के लिए आर्थिक नुकसान का कारण बन सकती है,खासकर उन क्षेत्रों में जहां सिंचाई का यही मुख्य साधन है।
जांच की मांग तेज
मामले के सामने आने के बाद ग्रामीणों और स्थानीय जनप्रतिनिधियों ने उच्च स्तरीय जांच की मांग की है,उनका कहना है कि निर्माण कार्य की तकनीकी जांच हो,उपयोग की गई सामग्री की गुणवत्ता की जांच हो, जिम्मेदार अधिकारियों और ठेकेदार की भूमिका स्पष्ट की जाए,ग्रामीणों का यह भी कहना है कि यदि समय रहते कार्रवाई नहीं हुई,तो यह परियोजना भी अन्य योजनाओं की तरह भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ जाएगी।
प्रशासन की चुप्पी ने बढ़ाए सवाल
इस पूरे मामले में सबसे चिंताजनक बात यह है कि अब तक संबंधित विभाग या प्रशासन की ओर से कोई स्पष्ट बयान सामने नहीं आया है, प्रशासनिक चुप्पी के कारण लोगों में संदेह और गहरा रहा है,पारदर्शिता पर सवाल उठ रहे हैं,जवाबदेही तय नहीं हो पा रही है,विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसी स्थिति में प्रशासन को तुरंत सामने आकर स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए और जांच प्रक्रिया शुरू करनी चाहिए।


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