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एमसीबी@एमसीबी का रुसनी: विकास के दावों के बीच अंधेरे में जीता एक गाँव

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सड़क नहीं, बिजली नहीं, पानी नहीं-बीमारों को खाट पर ढोते ग्रामीण; फाइलों में चमकता विकास, जमीनी हकीकत बदहाल


-संवाददाता-
एमसीबी,11 मार्च 2026 (घटती-घटना)। छत्तीसगढ़ के मनेंद्रगढ़-चिरमिरी-भरतपुर (एमसीबी) जिले के वनांचल में बसा छोटा सा गाँव रुसनी आज भी उस भारत की कहानी कहता है जो सरकारी दावों और योजनाओं के चमकते नारों से बहुत दूर है, जहाँ एक ओर देश डिजिटल युग और 5जी नेटवर्क की बात कर रहा है,वहीं रुसनी के लोग आज भी ढिबरी और लालटेन की रोशनी में रात गुजारने को मजबूर हैं।
यह गाँव उस विडंबना का प्रतीक बन गया है जहाँ सरकारी योजनाएँ कागजों में पूरी दिखाई देती हैं,लेकिन जमीनी हकीकत में विकास का कोई निशान नजर नहीं आता, बिजली,सड़क,पानी और स्वास्थ्य जैसी बुनियादी सुविधाओं से जूझते ग्रामीण आज भी उसी उम्मीद में जी रहे हैं कि शायद कभी प्रशासन की नजर उनके गाँव तक भी पहुँचेगी, ग्रामीणों का कहना है कि रुसनी विकास की मुख्यधारा से इतना दूर है कि यहाँ 21वीं सदी की आहट तक नहीं पहुँची।
सड़क नहीं,पगडंडियों के सहारे चलती जिंदगी
रुसनी गाँव की सबसे बड़ी समस्या सड़क है,यहाँ तक पहुँचने के लिए कोई पक्की सड़क नहीं है,गाँव तक जाने वाले रास्ते आज भी कच्ची पगडंडियों के भरोसे हैं,जो बरसात के मौसम में दलदल बन जाती हैं, गाँव के बुजुर्ग बताते हैं कि जब कोई व्यक्ति बीमार पड़ जाता है तो उसे अस्पताल तक पहुँचाना किसी युद्ध से कम नहीं होता,एक ग्रामीण की आँखों में दर्द झलकता है,वे कहते हैं-साहब, हमारे यहाँ अगर कोई गंभीर रूप से बीमार हो जाए तो एंबुलेंस बुलाना भी बेकार है, यहाँ तक आने के लिए सड़क ही नहीं है,ऐसे में मरीज को चारपाई पर लिटाकर चार लोग कंधे पर उठाकर कई किलोमीटर पैदल चलते हैं,गर्भवती महिलाओं के लिए स्थिति और भी भयावह हो जाती है,कई बार प्रसव पीड़ा में तड़पती महिलाओं को पथरीले रास्तों से खाट पर ढोते हुए अस्पताल ले जाना पड़ता है,बरसात के दिनों में यह रास्ता इतना खतरनाक हो जाता है कि हर कदम पर दुर्घटना का खतरा बना रहता है, ग्रामीण सवाल उठाते हैं कि क्या लोकतंत्र में वोट देने वाले नागरिकों को इतनी भी सुविधा नहीं मिल सकती कि उनके गाँव तक एक पक्की सड़क बन सके?
बिजली के नाम पर सोलर सिस्टम, जो अब कबाड़ बन चुके
बिजली के मामले में भी रुसनी की कहानी कम दर्दनाक नहीं है,सरकारी रिकॉर्ड के अनुसार गाँव में सौर ऊर्जा के कई उपकरण लगाए गए हैं, कहीं सोलर स्ट्रीट लाइट लगाई गई,तो कहीं घरों में सौर ऊर्जा कनेक्शन दिए गए, लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि इन उपकरणों का अधिकांश हिस्सा अब कबाड़ बन चुका है,घटिया गुणवत्ता और रखरखाव के अभाव के कारण ये सोलर सिस्टम कुछ ही वर्षों में खराब हो गए, अब स्थिति यह है कि रात होते ही गाँव फिर उसी पुराने अंधेरे में डूब जाता है, ग्रामीणों का कहना है कि यदि इन उपकरणों की नियमित देखरेख होती तो आज गाँव की तस्वीर अलग होती, लेकिन बिना रखरखाव के लगाए गए उपकरण अब केवल सरकारी योजनाओं के प्रतीक बनकर रह गए हैं।
जल जीवन मिशनः नल लगे,पानी नहीं आया
केंद्र और राज्य सरकार की महत्वाकांक्षी योजना जल जीवन मिशन का उद्देश्य था हर घर नल,हर घर जल, रुसनी में भी इस योजना के तहत नल तो लगाए गए हैं,लेकिन उनमें पानी कभी नहीं आया,गाँव में जगह-जगह खड़े नल इस बात की गवाही देते हैं कि योजना का ढांचा तो तैयार हुआ,लेकिन उसका संचालन कभी शुरू ही नहीं हुआ,पेयजल की समस्या के कारण ग्रामीण आज भी झरिया,ढोढ़ी और अन्य प्राकृतिक जल स्रोतों पर निर्भर हैं। बरसात के मौसम में यही पानी दूषित हो जाता है, जिससे ग्रामीणों को जलजनित बीमारियों का खतरा बना रहता है।
शिक्षा व्यवस्था भी बदहाल
रुसनी में शिक्षा की स्थिति भी चिंताजनक है,गाँव के बच्चों के लिए बेहतर स्कूल और शिक्षकों की उपलब्धता नहीं है, ग्रामीण बताते हैं कि स्कूल में शिक्षकों की नियुक्ति तो है, लेकिन उनकी उपस्थिति अनियमित रहती है,डिजिटल शिक्षा की बात तो दूर,यहाँ कई बच्चों के पास बुनियादी शैक्षणिक संसाधन भी नहीं हैं,संसाधनों की कमी के कारण कई बच्चे बीच में ही पढ़ाई छोड़ देते हैं,युवाओं का कहना है कि गाँव की बदहाल स्थिति के कारण यहाँ शादी के रिश्ते भी आने से कतराते हैं।
कब बदलेगी रुसनी की तस्वीर?
रुसनी की बदहाल स्थिति प्रशासन और शासन के उन दावों पर सवाल खड़े करती है,जिनमें अंतिम व्यक्ति तक विकास पहुँचाने की बात कही जाती है,यदि समय रहते इस गाँव की समस्याओं पर ध्यान नहीं दिया गया तो विकास के दावे केवल कागजों तक ही सीमित रह जाएंगे,आज रुसनी के लोग बस यही उम्मीद कर रहे हैं कि कभी न कभी प्रशासन की नजर उनके गाँव तक भी पहुँचेगी और विकास का उजाला उस अंधेरे को दूर करेगा,जिसमें वे वर्षों से जी रहे हैं।
अधिकारियों की फाइलों में विकास,जमीन पर सन्नाटा
ग्रामीणों का कहना है कि उनकी सबसे बड़ी पीड़ा यह है कि उन्हें सुनने वाला कोई नहीं है, बीते कई वर्षों में जिले के किसी बड़े अधिकारी ने गाँव का दौरा नहीं किया,जिला मुख्यालय में बैठकर योजनाओं की समीक्षा जरूर होती है,लेकिन रुसनी की पगडंडियों तक वह समीक्षा कभी नहीं पहुँचती,ग्रामीणों का आरोप है कि अफसरों की वातानुकूलित दफ्तरों में बैठकर बनाई गई योजनाएँ जमीन पर दम तोड़ देती हैं।
प्रशासन से उम्मीद
रुसनी गाँव की कहानी केवल एक गाँव की समस्या नहीं है,यह उस सच्चाई का आईना है जहाँ विकास के बड़े-बड़े दावे किए जाते हैं,लेकिन कई वनांचल आज भी बुनियादी सुविधाओं के लिए संघर्ष कर रहे हैं, ग्रामीणों की मांग है कि गाँव तक पक्की सड़क बनाई जाए,बिजली की स्थायी व्यवस्था की जाए, जल जीवन मिशन को सही तरीके से लागू किया जाए,शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाओं को मजबूत किया जाए।
रुसनी पहुँचने के तीन रास्ते,तीनों बदहाल
रुसनी गाँव को बाहरी दुनिया से जोड़ने के लिए तीन मुख्य मार्ग बताए जाते हैं,लेकिन हकीकत में ये मार्ग किसी भी वाहन के लिए लगभग अनुपयोगी हैं।
कोटाडोल-रुसनी मार्ग
यह रास्ता पूरी तरह कच्चा है और जगह-जगह गहरे गड्ढों से भरा हुआ है,बरसात के समय यह दलदल में बदल जाता है, ऐसे में यहाँ से गुजरना वाहन चालकों के लिए किसी जोखिम से कम नहीं।
जनौरा-बड़गांवकला-रुसनी मार्ग
इस मार्ग पर पत्थर और कंक्रीट का इतना जमाव है कि पैदल चलना भी मुश्किल हो जाता है, यहाँ दुपहिया वाहन चलाना भी चुनौती भरा काम है।
ढाब-बड़गांवकला-रुसनी मार्ग
यह रास्ता कीचड़ और नुकीले पत्थरों से भरा हुआ है,बरसात के मौसम में यह पूरी तरह अगम्य हो जाता है, इन तीनों मार्गों की हालत देखकर यह सवाल उठता है कि क्या प्रशासन को इस गाँव तक जाने की जरूरत कभी महसूस ही नहीं हुई?


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