- 24.98 लाख का सवाल…शिकायत,जांच और आंशिक जमा…पर अंतिम जवाब अब तक गायब
- दस साल की फाइलें,मगर जवाब शून्यः धान बोनस-फसल बीमा निकासी का रहस्य
- जांच हुई, राशि जमा हुई…फिर भी सच अधूरा क्यों? 24.98 लाख का मामला सवालों में
- 186 किसानों के खाते,24.98 लाख की निकासी…एक दशक बाद भी निष्कर्ष नहीं
- फाइलों में जांच,रिकॉर्ड में राशि…लेकिन अंतिम फैसला कहाँ?
- 2015 में निकासी, 2016 में आंशिक जमा… 2026 में भी निष्कर्ष नहीं
- शिकायत से जांच तक सब दर्ज,लेकिन फैसला गायब—24.98 लाख की कहानी
- सहकारी व्यवस्था पर सवालः किसानों की राशि के प्रकरण का अंत कहाँ?

ओंकार पाण्डेय
सूरजपुर,11 मार्च 2026 (घटती-घटना)। वर्ष 2014-15 में धान बोनस और फसल बीमा राशि से जुड़े एक प्रकरण में लगभग 24,98,580 की निकासी का उल्लेख आधिकारिक दस्तावेजों में दर्ज है, शिकायतें हुईं, विभागीय पत्राचार हुआ, जांच के आदेश जारी हुए, प्रतिवेदन तैयार हुआ,आंशिक राशि जमा होने का उल्लेख भी मिला,लेकिन दस वर्षों बाद भी अंतिम जवाब सार्वजनिक रूप से स्पष्ट नहीं है,दस्तावेजों के आधार पर तैयार यह फॉलोअप रिपोर्ट उस सवाल को सामने रखती है,जो समय के साथ और गहरा होता गया है,आखिर 10 साल बाद भी पूरा सच सामने क्यों नहीं आया? दस्तावेजों में दर्ज तथ्य यह संकेत देते हैं कि प्रकरण वास्तविक था, जांच हुई थी और वित्तीय लेन-देन दर्ज थे,लेकिन दस वर्षों बाद भी यदि अंतिम जवाब सार्वजनिक रूप से उपलब्ध नहीं है,तो यह केवल एक प्रकरण नहीं, बल्कि जवाबदेही और पारदर्शिता का प्रश्न बन जाता है,सवाल आज भी वही है, 24.98 लाख के इस प्रकरण का अंतिम निष्कर्ष क्या है? और यदि निष्कर्ष है, तो वह सार्वजनिक क्यों नहीं है?
शुरुआतः शिकायत और जांच
फाइल के पहले पृष्ठ पर कलेक्टर, सरगुजा को संबोधित शिकायत दर्ज है,जिसमें धान बोनस/फसल बीमा राशि के आहरण में अनियमितता का आरोप लगाया गया था। शिकायत में जांच की मांग की गई थी,इसके बाद सहकारिता विभाग द्वारा आदेश क्रमांक 2213 (15.10.2015) और 2820 (22.12.2015) जारी कर जांच के निर्देश दिए गए। दस्तावेजों में लगभग 24.98 लाख की राशि का उल्लेख मिलता है।
जांच रिपोर्ट : आहरण
और आंशिक जमा
जांच प्रतिवेदन (पृष्ठ 7-10) में दर्ज है किः 11.03.2015 को फसल बीमा मद से 7,48,492.17 का आहरण हुआ, कुल 17,58,000 की अतिरिक्त निकासी विभिन्न खातों से हुई, 28.06.2016 को 14,22,890 जमा किए जाने का उल्लेख है,यह स्पष्ट है कि मामला केवल आरोप नहीं रहा,आहरण और समायोजन दोनों दर्ज हुए।
186 किसानों की सूची
पृष्ठ 14 से 16 में 186 किसानों के नाम, खाता संख्या और राशि का विवरण उपलब्ध है। अंतिम पृष्ठ पर कुल योग 24,98,580.00 अंकित है, यह सूची संकेत देती है कि मामला व्यापक था और कई खातों से संबंधित था।
एक दशक की चुप्पी,दस्तावेजों के अनुसार जांच और आंशिक जमा 2016 तक दर्ज हैं। लेकिन उसके बादः
– क्या पूरी राशि की वसूली हुई?
– क्या विभागीय अंतिम आदेश पारित हुआ?
– क्या किसी के विरुद्ध आपराधिक मामला दर्ज हुआ?
– क्या किसानों को आधिकारिक सूचना दी गई? उपलब्ध दस्तावेज इन सवालों के स्पष्ट उत्तर नहीं देते।
कार्रवाई की स्थितिः अस्पष्टता क्यों? दस वर्षों की अवधि में सामान्यतः निम्न संभावनाएँ होती हैंः
- विभागीय कार्रवाई पूरी हुई पर सार्वजनिक नहीं हुई।
- मामला अपील/न्यायालय में लंबित रहा।
- आंशिक वसूली के बाद प्रकरण ठंडा पड़ गया।
- अंतिम निर्णय फाइलों में सीमित रह गया, हालांकि,इन संभावनाओं की पुष्टि संबंधित अभिलेखों से ही हो सकती है।
विश्वास का प्रश्न…
धान बोनस और फसल बीमा राशि किसानों के लिए महेज वित्तीय मद नहीं,बल्कि जीविका का आधार होती है,यदि इन योजनाओं से संबंधित प्रकरण वर्षों तक स्पष्ट निष्कर्ष तक न पहुंचे,तो इससे सहकारी बैंकिंग व्यवस्था की पारदर्शिता पर प्रश्न उठते हैं, दस्तावेज यह दिखाते हैं कि शिकायत हुई,जांच हुई,आंशिक राशि जमा हुई — लेकिन दस वर्ष बाद भी अंतिम स्थिति स्पष्ट नहीं है।
अब आगे क्या? यदि मामले की अंतिम स्थिति सार्वजनिक नहीं हुई है,तो पारदर्शिता के लिए
विभागीय अंतिम आदेश सार्वजनिक किए जा सकते हैं।
वसूली की स्थिति स्पष्ट की जा सकती है।
प्रभावित खाताधारकों को लिखित जानकारी दी जा सकती है।
यदि कोई आपराधिक प्रकरण लंबित है,तो उसकी स्थिति बताई जा सकती है।
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