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खड़गवां@जंगल रो रहा, आरी हंस रही…खड़गवां में वन माफिया का ‘ग्रीन विकास मॉडल’!

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  • डिप्टी रेंजर के घर के सामने से गुजर रही लकड़ी,लेकिन वन विभाग को दिख रही सिर्फ हरियाली!
  • वन विभाग की ‘आरामदायक गश्त’, माफिया की तेज आरी-खड़गवां के जंगलों पर संकट
  • वनों की अवैध कटाईःवन अमले ने दे रखी है खुली छूट,हरियाली पर चल रही है खुलेआम आरी


-राजेन्द्र शर्मा-
खड़गवां,10 मार्च 2026 (घटती-घटना)। खड़गवां वन परिक्षेत्र इन दिनों एक अजीब तरह की ‘हरी-भरी त्रासदी’ का गवाह बनता जा रहा है,जहां कभी घने जंगल, सागौन और साल के विशाल पेड़ हवा के साथ झूमते थे,वहीं अब आरी की तीखी आवाजें जंगल की खामोशी को चीरती सुनाई दे रही हैं, ग्रामीणों के अनुसार यह कोई छिपी हुई गतिविधि नहीं है, बल्कि एक ऐसा ‘खुला खेल’ है जिसे दिन के उजाले में भी अंजाम दिया जा रहा है, फर्क बस इतना है कि इस खेल में खिलाड़ी लकड़ी माफिया हैं और दर्शक बने बैठे हैं वन विभाग के जिम्मेदार लोग।
प्रशासन की परीक्षा
अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या प्रशासन इस मामले को गंभीरता से लेगा या फिर यह मामला भी बाकी शिकायतों की तरह फाइलों में दब जाएगा? क्या वन विभाग सचमुच जंगलों की रक्षा के लिए ठोस कदम उठाएगा, या फिर लकड़ी माफिया इसी तरह जंगलों को उजाड़ते रहेंगे? खड़गवां के जंगल आज भी खामोश हैं, लेकिन उनकी खामोशी बहुत कुछ कह रही है, अगर समय रहते इस खामोशी को नहीं सुना गया,तो शायद आने वाली पीढि़यां यह पूछेंगी कि जब जंगल कट रहे थे,तब जंगल की रक्षा करने वाले लोग आखिर कर क्या रहे थे।
गश्त का नाम,लेकिन जंगल में सन्नाटा
वन क्षेत्र में नियमित गश्त होना वन विभाग की जिम्मेदारी होती है,लेकिन ग्रामीणों का आरोप है कि कई इलाकों में गश्त शायद कागजों में ही होती है, अगर वास्तव में नियमित गश्त हो रही होती तो इतनी बड़ी मात्रा में पेड़ काटना और लकड़ी का परिवहन करना संभव ही नहीं होता, स्थानीय लोगों का कहना है कि जंगलों में कई ऐसे रास्ते बन चुके हैं जिनसे लकड़ी आसानी से बाहर ले जाई जा रही है, यह रास्ते अचानक नहीं बनते — इसके लिए समय, मशीनें और लोगों की जानकारी की जरूरत होती है।
वन माफिया के हौसले बुलंद
जब निगरानी कमजोर हो जाती है तो अवैध गतिविधियों को बढ़ावा मिलना स्वाभाविक है,खड़गवां में भी कुछ ऐसा ही हो रहा है,लकड़ी माफिया अब इतने बेखौफ हो चुके हैं कि उन्हें न तो दिन का डर है और न ही प्रशासन का, ग्रामीणों का कहना है कि कई बार जंगल से रात में ट्रैक्टरों की आवाजें साफ सुनाई देती हैं,लेकिन शिकायत करने पर भी कोई कार्रवाई नहीं होती।
पर्यावरण पर गंभीर खतरा
वनों की कटाई केवल लकड़ी की चोरी का मामला नहीं है, बल्कि यह पर्यावरण के लिए भी गंभीर खतरा है,सागौन और साल जैसे पेड़ न केवल जंगल की जैव विविधता को बनाए रखते हैं,बल्कि भूजल स्तर और जलवायु संतुलन में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं,अगर इसी तरह पेड़ों की कटाई जारी रही तो आने वाले समय में क्षेत्र में जल संकट और तापमान वृद्धि जैसी समस्याएं भी बढ़ सकती हैं।
पर्यावरण प्रेमियों की चिंता
स्थानीय पर्यावरण प्रेमियों और सामाजिक संगठनों ने इस मामले को गंभीर बताते हुए उच्च अधिकारियों से हस्तक्षेप की मांग की है,उनका कहना है कि अगर समय रहते सख्त कार्रवाई नहीं की गई तो खड़गवां के जंगल केवल नक्शों और सरकारी रिपोर्टों में ही बचकर रह जाएंगे।
डिप्टी रेंजर के घर के सामने से गुजर रही लकड़ी
ग्रामीणों का कहना है कि स्थिति इतनी विचित्र हो चुकी है कि लकड़ी से लदे ट्रैक्टर-ट्रॉली और बड़े ट्रक दिन दहाड़े निकलते हैं और वह भी वन विभाग के डिप्टी रेंजर के आवास के सामने से, अब सवाल यह उठता है कि अगर इतनी बड़ी मात्रा में लकड़ी खुलेआम परिवहन हो रही है, तो क्या वन विभाग के जिम्मेदार अधिकारियों की नजरें उस समय छुट्टी पर चली जाती हैं? ग्रामीणों का तंज है कि शायद जंगल की रक्षा के लिए बनाए गए नियम और गश्त के आदेश भी अब फाइलों के जंगल में खो गए हैं।
हरियाली का ‘सिस्टमेटिक सफाया’
खड़गवां वन क्षेत्र में सागौन, साल और अन्य बहुमूल्य प्रजातियों के पेड़ बड़ी तेजी से काटे जा रहे हैं,ये वही पेड़ हैं जिनकी एक-एक लकड़ी बाजार में हजारों रुपये की कीमत रखती है, ग्रामीणों का कहना है कि पहले चोरी-छिपे पेड़ काटे जाते थे,लेकिन अब यह काम इतने व्यवस्थित तरीके से हो रहा है कि मानो जंगल किसी ठेके पर दे दिया गया हो,कई स्थानों पर तो एक ही रात में दर्जनों पेड़ काट दिए जाते हैं और सुबह तक उनके ठूंठ ही जमीन पर रह जाते हैं,जंगल के बीचों-बीच पड़े ये ठूंठ इस बात की गवाही देते हैं कि हरियाली पर किस तरह बेरहमी से आरी चलाई जा रही है।
वन विभाग की ‘औपचारिक कार्रवाई’
जब भी इस मामले पर सवाल उठते हैं तो विभागीय कार्रवाई की कहानी सामने आ जाती है,कभी-कभी किसी छोटे वाहन से कुछ लकडि़यां पकड़ ली जाती हैं,किसी मजदूर को पकड़कर मामला दर्ज कर लिया जाता है, और फिर विभाग अपनी ‘सक्रियता’ का ढोल पीट देता है,लेकिन असली सवाल यह है कि जो बड़े पैमाने पर कटाई और परिवहन हो रहा है,उसके पीछे के असली सरगना कौन हैं? ग्रामीणों का कहना है कि छोटे लोगों पर कार्रवाई कर देने से असली खेल खत्म नहीं होता,बल्कि वह और मजबूत हो जाता है।
शिकायतें बहुत…कार्यवाही कम…
स्थानीय लोगों के अनुसार कई बार इस मामले की मौखिक शिकायत वन विभाग के अधिकारियों से की गई है,लेकिन हर बार जवाब लगभग एक जैसा ही मिलता है — देखते हैं,जांच करेंगे,गश्त बढ़ाई जाएगी। ग्रामीणों का कहना है कि इन आश्वासनों की उम्र उतनी ही होती है जितनी देर में जंगल से लकड़ी लदी ट्रॉली सड़क पार कर जाती है।


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