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कोरिया/सोनहत@ होली से पहले मेहनतकशों पर सिस्टम का प्रहार,मजदूरी अटकी, मानदेय गायब

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  • पसीना बहाया, पैसा नहीं पाया, सोनहत में मजदूर-मितानिनों की सूनी होली
  • खाते में रकम, हाथ में शून्य, प्रशासनिक लापरवाही से फीके पड़े त्योहार के रंग
  • त्योहार पर भुगतान संकट, सोनहत में मजदूरों, मितानिनों और किसानों की बढ़ी चिंता
  • मनरेगा से मितानिन तक—भुगतान में देरी ने बढ़ाई ग्रामीण आर्थिक मुश्किलें
  • धान राशि जमा, पर निकासी बाधित, सिस्टम की सुस्ती से होली पर असर
  • साहब, बच्चों के लिए गुलाल कहाँ से लाएँ?’—सोनहत के गांवों का दर्द
  • रंगों से पहले इंतज़ार, मजदूरी और मानदेय के लिए तरसते हाथ
  • त्योहार की दहलीज पर भुगतान का सवाल, क्या सुनेगा प्रशासन?


-राजन पाण्डेय-
कोरिया/सोनहत,02 मार्च 2026 (घटती-घटना)।
होली का त्योहार खुशियों, रंगों और मेल-मिलाप का प्रतीक माना जाता है, लेकिन कोरिया जिले के सोनहत ब्लॉक के कर्री, किशोरी और परिहत पोड़ी जैसे गांवों में इस बार रंगों से पहले चिंता की लकीरें गहरी हो गई हैं, वजह—महीनों से अटका भुगतान, प्रदेश में विकास और ‘डबल इंजन’ सरकार के दावे भले ही जोरों पर हों, लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि जिन हाथों ने गांव की तस्वीर बदलने के लिए मिट्टी खोदी, तालाब बनाए और स्वास्थ्य सेवाओं को घर-घर तक पहुंचाया, उन्हीं के घरों में त्योहार से पहले आर्थिक सन्नाटा पसरा है।
दो माह से अटकी मजदूरी: मनरेगा श्रमिकों की मुश्किलें- सोनहत क्षेत्र में महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम (मनरेगा) के तहत काम करने वाले सैकड़ों मजदूरों को पिछले दो महीनों से मजदूरी नहीं मिली है, ग्रामीणों के अनुसार, उन्होंने तय समय पर कार्य पूरा किया, मस्टर रोल भरा गया, माप पुस्तिका भी बनी, लेकिन भुगतान फाइलों में अटक गया, मजदूरों का कहना है की दिन-भर धूप में काम किया, अब होली पर बच्चों के लिए कपड़े और गुलाल खरीदने तक पैसे नहीं हैं, गांवों में कई परिवार उधारी पर राशन और घरेलू सामान लेने को मजबूर हैं। स्थानीय दुकानदार भी कहते हैं कि बकाया बढ़ता जा रहा है।
पांच महीने से मानदेय लंबित: मितानिनों का दर्द- ग्रामीण स्वास्थ्य व्यवस्था की रीढ़ कही जाने वाली मितानिनें भी आर्थिक संकट से गुजर रही हैं, ब्लॉक समन्वयक, स्वास्थ्य पंचायत समन्वयक और हेल्प डेस्क की मितानिनों को पिछले पांच महीनों से मानदेय नहीं मिला, ये वही महिलाएं हैं जो टीकाकरण, प्रसव पूर्व जांच, पोषण अभियान और आपातकालीन स्वास्थ्य सेवाओं में दिन-रात सक्रिय रहती हैं, एक मितानिन ने नाम न छापने की शर्त पर कहा की हम गांव-गांव जाकर लोगों की सेवा करते हैं, लेकिन अपने घर में खर्च चलाना मुश्किल हो गया है, बिना मानदेय के इतने लंबे समय तक काम करना उनके लिए मानसिक और आर्थिक दबाव दोनों बढ़ा रहा है।
किसानों का पैसा ‘खाते में’, पर जेब तक नहीं- सरकार ने 28 फरवरी को धान की अंतर राशि किसानों के खातों में जमा करने का दावा किया, लेकिन सहकारी बैंकों में नकदी की कमी और निकासी पर तकनीकी सीमाओं ने किसानों की उम्मीदों पर पानी फेर दिया, सुबह से ही सहकारी बैंकों के बाहर लंबी कतारें देखी जा रही हैं, कई किसान घंटों इंतजार के बाद भी पूरी राशि नहीं निकाल पा रहे, एक किसान ने कहा की खाते में पैसा दिख रहा है, पर हाथ में नहीं आ रहा। ऐसे में त्योहार की तैयारी कैसे करें?
सवालों के घेरे में प्रशासन- मजदूरों को दो माह से मजदूरी नहीं, मितानिनों को पांच माह से मानदेय नहीं, किसानों को राशि मिली, पर निकासी में बाधा, त्योहार से पहले यह स्थिति प्रशासनिक तंत्र की सुस्ती और समन्वय की कमी की ओर इशारा करती है, सरकारें अक्सर “अंतिम व्यक्ति तक लाभ पहुंचाने” की बात करती हैं, लेकिन जब भुगतान समय पर न हो, तो दावे सवालों के घेरे में आ जाते हैं।
जनप्रतिनिधियों की प्रतिक्रिया
पुष्पेंद्र राजवाड़े, अध्यक्ष, कोरिया जन सहयोग समिति:


“होली से पहले मजदूरों को भुगतान न मिलना बेहद दुखद है। कम से कम त्योहार के दिन ही उनका बकाया दिया जाए।”
अनित दुबे, महामंत्री, जिला कांग्रेस:


“मजदूरों और मितानिनों का भुगतान अटका है। सरकार को तुरंत हस्तक्षेप कर राशि जारी करनी चाहिए।”
प्रकाश चंद्र साहू:


यदि जल्द भुगतान नहीं हुआ तो मजदूरों के हित में आंदोलन किया जाएगा।”
क्या हटेगा ‘सिस्टम’ का ग्रहण?- होली रंगों का त्योहार है, लेकिन सोनहत के कई घरों में इस बार चिंता और प्रतीक्षा के रंग ज्यादा गहरे हैं, मेहनत का पसीना सूखने से पहले मजदूरी मिलनी चाहिए—यह सिर्फ प्रशासनिक नहीं, मानवीय दायित्व भी है, अब सवाल यह है कि क्या प्रशासन होली से पहले इन बकाया भुगतान को जारी करेगा? या फिर गरीब परिवारों की होली फाइलों के ढेर में ही दबकर रह जाएगी? त्योहार पर ‘सिस्टम’ का यह ग्रहण कब हटेगा—यह देखने वाली बात होगी।


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