

- रकबा कागज़ पर बढ़ा,गोदाम में धान घटा—और खातों में चला पैसा!
- धान के नाम पर धन की बारिश? शिवप्रसादनगर समिति में नामजद शिकायत से हड़कंप
- 23 किसानों के नाम पर हजारों मि्ंटल धान खरीदी का आरोप, समिति प्रबंधक, तत्कालीन शाखा प्रबंधक जगदीश कुशवाहा और कथित दलाल पर मिलीभगत के गंभीर सवाल
-ओंकार पाण्डेय-
सूरजपुर,01 मार्च 2026(घटती-घटना)। जिले के भैयाथान क्षेत्र की शिवप्रसादनगर सहकारी समिति इन दिनों चर्चा में है, किसानों के पसीने से नहीं, कागज़ों के रकबे से उगी फसल के कारण, शिकायतकर्ता ने नामजद आरोप लगाते हुए कहा है कि ओड़गी क्षेत्र के किसानों के नाम पर फर्जी पंजीयन कर धान विक्रय दर्शाया गया, और धान से ज्यादा धन की आवक-जावक पर जोर रहा, आरोपों की सूची लंबी है और पात्र भी—समिति प्रबंधक,बैंक शाखा से जुड़े अधिकारी, कथित दलाल/धान कारोबारी हदीस अंसारी (ग्राम सोनपुर), तथा पूर्व प्रकरण में उल्लेखित अजीत सिंह (तत्कालीन शाखा प्रबंधक) के साथ अब शिकायत में तत्कालीन शाखा प्रबंधक जगदीश कुशवाहा का नाम भी जोड़ा गया है। नोटः सभी आरोप शिकायत के आधार पर हैं;आधिकारिक जांच/पुष्टि शेष है।
रकबा बढ़ा खेत नहीं- शिकायत का दावा है कि वर्ष 2024-25 की धान खरीदी में कम से कम 23 किसानों के नाम पर फर्जी रकबा जोड़कर खरीदी दर्शाई गई। यानी खेत उतने ही रहे, पर कागज़ों पर “हरित क्रांति” हो गई, कथित तौर पर कई मामलों में 15 से 20 हजार मि्ंटल तक खरीदी दिखाए जाने का संदेह है, जनता पूछ रही है—”इतना धान आया कहां से?” जवाब शायद फाइलों की उपजाऊ मिट्टी में मिलेगा।
बीमा भी ‘बीमा’ नहीं रहा?- आवेदन में आरोप है कि किसानों के खातों से प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना की राशि का भी फर्जी आहरण हुआ, यानी फसल सूखे से नहीं, सिस्टम से प्रभावित हुई! शिकायतकर्ता का कहना है कि बैंकिंग प्रक्रिया और शासन के निर्देशों की अनदेखी कर आहरण किए गए, यहां तत्कालीन शाखा प्रबंधक जगदीश कुशवाहा की भूमिका पर भी सवाल उठाए गए हैं, क्या नियमों की किताब अलमारी में बंद थी, या पढ़ी ही नहीं गई?
ऋण की बारिश, कमीशन की फुहार?- पशुपालन ऋण के नाम पर भी कथित खेल की चर्चा है की पात्रता से अधिक ऋण वितरण, आहरण राशि पर कथित कमीशन, दलालों की सक्रियता, जनता कह रही है—”यह योजना है या योजना के नाम पर योजना?”
2023 का मामला: सबक या सिर्फ कागज़?- दस्तावेजों में उल्लेख है कि 4 जनवरी 2023 को थाना झिलमिली (भैयाथान) में धारा 420, 409, 34 भादवि के तहत अपराध पंजीबद्ध हुआ था, पूर्व शाखा प्रबंधक अजीत सिंह का नाम भी सामने आया था; जमानत के लिए लगभग ₹62,61,930 जमा होने का उल्लेख है, सवाल यह है—इतने बड़े प्रकरण के बाद सिस्टम ने सीखा क्या? या फिर “प्रक्रिया जारी है” का पोस्टर चिपका कर आगे बढ़ गए?
पहले भी शिकायत, फिर भी ‘सब ठीक’?- आवेदन में दावा है कि 22 मई 2025 को भी शिकायत दी गई थी। मगर कथित तौर पर जांच का पहिया वहीं अटका रहा, शिकायतकर्ता का आरोप है कि जांच के नाम पर फाइलें घूमती रहीं, पर कार्रवाई की स्याही सूखती रही।
आरोप, किस और क्या?- शिकायत में जिन पर सवाल उठाए गए, उनमें समिति प्रबंधक, शिवप्रसादनगर, तत्कालीन शाखा प्रबंधक जगदीश कुशवाहा (जिला सहकारी केंद्रीय बैंक, भैयाथान), पूर्व शाखा प्रबंधक अजीत सिंह (पूर्व प्रकरण संदर्भ) हदीस अंसारी (ग्राम सोनपुर)—कथित दलाल/धान कारोबारी का नाम प्रमुखता से है। आरोप है कि इनकी मिलीभगत से फर्जी पंजीयन, धान विक्रय और राशि आहरण का जाल बुना गया, दोहराव: ये सभी आरोप शिकायत पर आधारित हैं; आधिकारिक जांच की प्रतीक्षा है।
धान के दाने बनाम फाइल के पन्ने- शिकायतकर्ता का दावा है कि 37 पन्नों के दस्तावेज संलग्न हैं। अब देखने वाली बात यह है कि फाइल के पन्ने भारी पड़ते हैं या धान के दाने? यदि आरोप सही निकले, तो यह मामला केवल एक समिति का नहीं, बल्कि धान खरीदी व्यवस्था की पारदर्शिता पर बड़ा प्रश्नचिन्ह होगा।
मांगें क्या हैं?
फर्जी पंजीयन की उच्च स्तरीय जांच
तकनीकी व वित्तीय ऑडिट
फर्जी आहरण की वसूली
जिम्मेदारों पर आपराधिक कार्रवाई
जांच रिपोर्ट सार्वजनिक प्रतिलिपि मुख्यमंत्री, संबंधित मंत्रियों और समाचार पत्रों को भी भेजी गई है—ताकि “सूचना” केवल सूचना न रहे, कार्रवाई भी बने।
प्रशासन की बारी- अब गेंद प्रशासन के पाले में है। क्या निष्पक्ष जांच होगी? क्या नामजद आरोपों की तह तक पहुंचा जाएगा? या फिर “प्रक्रिया जारी है” का बैनर फिर से टांगा जाएगा? जिले की जनता की एक ही मांग है— “धान खरीदी में पारदर्शिता हो, और धान के नाम पर धन’ की फसल बंद हो, मैच अभी बाकी है—अंपायर की सीटी का इंतजार है।
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