मुहर के बिना ही कुर्सी पर कब्जा? कोरिया साहू समाज में अध्यक्ष पद पर संग्राम

- पहले घोषणा,फिर मान्यता!’ जिला साहू संघ में स्वयंभू अध्यक्ष का विवाद
- प्रदेश की सहमति अधूरी,फिर भी अध्यक्ष पूरी तैयारी में!
- कुर्सी की जल्दी या संगठन की मर्यादा?’
- साहू समाज में बढ़ता टकराव लेटर पैड से अध्यक्ष बनेंगे?’
- कोरिया साहू संघ में वैधता पर सवाल
- घोषणा बनाम मान्यता’-जिला साहू संघ में दो धाराओं की आहट
- सहमति के बिना विस्तार!’ क्या साहू समाज में बढ़ रही है गुटबाजी?
–घटती-घटना फॉलोअप–
कोरिया,24 फरवरी 2026 (घटती-घटना)। पहले भी इस मुद्दे पर कई खबरें प्रकाशित हो चुकी हैं, लेकिन मामला शांत होने के बजाय और उलझता जा रहा है, जिला साहू संघ कोरिया में अध्यक्ष पद को लेकर चल रहा विवाद अब खुलकर ‘घोषणा बनाम मान्यता’ की लड़ाई बनता नजर आ रहा है। समाज के एक वर्ग का आरोप है कि जब प्रदेश साहू संघ रायपुर से अब तक सैद्धांतिक और लिखित सहमति नहीं मिली, तो आखिर किस अधिकार से जगदीश साहू स्वयं को जिला अध्यक्ष घोषित कर कार्यकारिणी विस्तार पर उतारू हैं? क्या यह संगठनात्मक प्रक्रिया है या ‘पहले कुर्सी पकड़ो, बाद में कागज देखेंगे’ वाली रणनीति?
लेटर पैड भी बना चर्चा का विषय
विवाद सिर्फ पद की घोषणा तक सीमित नहीं है, कथित रूप से जारी लेटर पैड और आदेशों की प्रतिलिपि प्रदेश अध्यक्ष और प्रदेश उपाध्यक्ष को नहीं भेजे जाने का भी आरोप है, समाज के एक पदाधिकारी ने व्यंग्य में कहा — ‘अगर पत्र की कॉपी प्रदेश तक ही नहीं पहुँची, तो यह आदेश समाज के लिए है या सिर्फ समर्थकों के लिए?’ यह सवाल अब खुलकर पूछा जा रहा है कि क्या यह सब संगठन को मजबूत करने के लिए है, या फिर कुछ चुनिंदा लोगों के साथ मिलकर ‘अपनी अध्यक्षीय पारी’ खेलने की कोशिश?
स्वयंभू अध्यक्ष’ का नया अध्याय?
समाज के वरिष्ठजनों का कहना है कि जब प्रदेश स्तर से नाम पर मुहर ही नहीं लगी, तब जिला स्तर पर आदेश जारी करना, बैठकें बुलाना और पद बांटना क्या दर्शाता है? कुछ लोगों ने तंज कसते हुए कहा — ‘लगता है अब अध्यक्ष बनने के लिए चुनाव या सहमति की नहीं,आत्मविश्वास की जरूरत है।’ आरोप है कि बिना वैधानिक प्रक्रिया पूरी किए जारी किए गए आदेश समाज में भ्रम की स्थिति पैदा कर रहे हैं,जिला साहू संघ कोरिया के भीतर यह सवाल जोर पकड़ रहा है कि क्या संगठन अब दो समानांतर धाराओं में बंटने की ओर बढ़ रहा है?
समाज जोड़ने की कोशिश या तोड़ने की?
समाज के कई लोगों का मानना है कि जब प्रदेश संगठन की सहमति ही लंबित है, तब जल्दबाजी में कार्यकारिणी विस्तार करना संगठनात्मक अनुशासन पर प्रश्न खड़े करता है, व्यंग्यात्मक चर्चा में यह भी कहा जा रहा है कि — ‘प्रदेश की मुहर बाद में लगे या न लगे, लेकिन बधाई संदेश पहले ही तैयार हैं।’ समाज के वरिष्ठजनों ने साफ कहा है कि जब तक प्रदेश स्तर से स्पष्ट लिखित सहमति नहीं मिलती, तब तक किसी भी प्रकार की अध्यक्षीय घोषणा को वैध नहीं माना जाएगा।
बड़ा सवालः महत्वाकांक्षा या संगठन? अब सवाल यह उठ रहा है कि यह पूरी कवायद आखिर किसलिए?
क्या यह व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा का परिणाम है? या संगठन के भीतर किसी गुटबाजी की नई पटकथा लिखी जा रही है? पूर्व में प्रकाशित खबरों के बाद भी यदि स्थिति स्पष्ट नहीं हो पा रही है, तो यह संकेत है कि मामला सिर्फ पद का नहीं, बल्कि प्रक्रिया और पारदर्शिता का भी है, अब निगाहें प्रदेश नेतृत्व पर टिकी हैं, क्या प्रदेश साहू संघ रायपुर इस पूरे विवाद पर आधिकारिक स्पष्टता जारी करेगा? या फिर जिला स्तर पर ‘घोषणा बनाम मान्यता’ का यह खेल आगे भी चलता रहेगा? फिलहाल समाज के भीतर चर्चा यही है — ‘अध्यक्ष बनने की जल्दी ज्यादा है या संगठन की मर्यादा की चिंता? ‘
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