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एमसीबी/मनेंद्रगढ़@अमृतधारा में बहा बजट, सूख गया जनउत्साह

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  • अमृतधारा में सूखा: करोड़ों का महोत्सव, सामने खाली कुर्सियां उत्सव किसके लिए?
  • जनता गायब, प्रोटोकॉल हाजिर, मंच सजा, माला चढ़ी भीड़ नहीं चढ़ी
  • अमृतधारा या प्रशासनिक औपचारिकता? फोटो खिंची, भाषण हुआ फिर खाली कुर्सियां रह गईं
  • जनता के नाम महोत्सव, जनता ही नदारद, उत्साह का आयोजन या बजट का प्रयोग?
  • अमृतधारा में अमृत कम, व्यय अधिक…खाली कुर्सियों ने पूछा—उत्सव आखिर किसके लिए?
  • महोत्सव की सफलता पर आत्ममंथन जरूरी…खर्च और परिणाम के बीच संतुलन का सवाल “

-रवि सिंह-
एमसीबी/मनेंद्रगढ़,17 फरवरी 2026(घटती-घटना)।
अमृतधारा महोत्सव-नाम सुनते ही लगता है कि उत्साह की धारा बहेगी,भीड़ उमड़ेगी,तालियां गूंजेंगी और क्षेत्र की पहचान नए आयाम छुएगी,पर इस बार तस्वीर कुछ और थी-मंच भव्य,लाइटें चमकदार,साउंड दमदार…और सामने सजी कतारों में खाली कुर्सियों की गंभीर उपस्थिति,कहते हैं, कुर्सियां भी बहुत कुछ कहती हैं,इस बार उन्होंने सवाल पूछा उत्सव किसके लिए था? करोड़ों का मंच,गिनती के दर्शक-सूत्रों के अनुसार आयोजन पर करीब एक करोड़ रुपये या उससे अधिक का व्यय हुआ,मंच निर्माण,साज-सज्जा,कलाकार,लाइट-साउंड, खानपान,स्वागत-सम्मान-सब कुछ प्रोटोकॉल के मुताबिक,लेकिन दर्शक दीर्घा में अपेक्षित भीड़ नहीं जुटी, स्थानीय लोगों का कहना है कार्यक्रम हमारे नाम पर होता है,पर हमें बुलाने की ठोस पहल नहीं होती, ग्राम पंचायतों से न पर्याप्त समन्वय,न परिवहन व्यवस्था, न जन-जागरूकता अभियान,परिणाम-खाली कुर्सियां और सोशल मीडिया पर वायरल तस्वीरें।
मुख्य अतिथि: प्रोटोकॉल पूरा, कार्यक्रम अधूरा- विशिष्ट अतिथियों का आगमन हुआ, माल्यार्पण हुआ, भाषण हुआ, फोटो खिंचीज् और फिर समय से पहले प्रस्थान, आलोचकों का व्यंग्य— “जब जनता नहीं, तो अतिथि भी क्यों ठहरें?” हालांकि प्रशासनिक सूत्र कहते हैं कि मुख्य अतिथि का कार्यक्रम पूर्व निर्धारित था, पर जनता का प्रश्न वही—यदि आयोजन जनता के लिए है, तो जनता कहां थी?
कलाकार बनाम खालीपन- मंच पर कलाकारों ने पूरी ऊर्जा से प्रस्तुति दी, पर सामने सन्नाटा—तालियों की जगह हवा की आवाज, एक स्थानीय कलाकार ने अनौपचारिक चर्चा में कहा—”हम तो कला के लिए आते हैं, पर दर्शक न हों तो मन भी बुझ जाता है, यह दृश्य न केवल आयोजन की सफलता पर प्रश्न है, बल्कि कलाकारों के मनोबल पर भी असर डालता है।
स्थापना दिवस बनाम अलग महोत्सव- कुछ बुद्धिजीवियों का सुझाव है—”उत्सव मनाना है तो जिला या प्रदेश स्थापना दिवस पर मनाएं, अलग से महोत्सव कर करोड़ों खर्च करना और भीड़ न जुटना समझ से परे है, जब क्षेत्र में सड़क, शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार जैसी बुनियादी जरूरतें हैं, तो प्राथमिकता पर भी सवाल उठना स्वाभाविक है।
सिस्टम पर तंज- सबसे तीखा व्यंग्य सिस्टम पर है, क्योंकि पैसा सरकारी खजाने से जाता है, आयोजन की जिम्मेदारी प्रशासन पर होती है, अस्थायी रोजगार कुछ लोगों को मिल जाता है, और जवाबदेहीज्वह अक्सर फाइलों में सो जाती है, आलोचकों का कहना है—”सिस्टम इतना संवेदनहीन हो गया है कि उसे खाली कुर्सियों से भी फर्क नहीं पड़ता।”
जनप्रतिनिधियों की अनदेखी?- स्थानीय पंच, सरपंच और जनपद सदस्यों का आरोप है कि आयोजन की रूपरेखा में उनकी भागीदारी सीमित रही, जब स्थानीय नेतृत्व को मंच पर सम्मान नहीं मिलेगा, तो ग्रामीणों में उत्साह कैसे पैदा होगा?
बड़ा सवाल आखिर—
करोड़ों रुपये खर्च कर भीड़ न जुटे तो क्या यह योजना सफल मानी जाएगी?
क्या पर्यटन और सांस्कृतिक पहचान केवल मंच और बैनर से बनती है?
क्या जनभागीदारी के बिना महोत्सव महज औपचारिकता नहीं बन जाता?

सुधार की गुंजाइश- यदि प्रशासन चाहे तो पंचायत स्तर पर सक्रिय भागीदारी सुनिश्चित करे, स्थानीय युवाओं और समूहों को आयोजन में नेतृत्व दे, परिवहन और प्रचार की प्रभावी व्यवस्था करे, कार्यक्रम को जनसरोकार से जोड़े तो यह महोत्सव सचमुच “अमृतधारा” बन सकता है।
अमृत या आत्ममंथन?- अमृतधारा महोत्सव का उद्देश्य क्षेत्रीय गौरव और पर्यटन संवर्धन है, पर इस बार आयोजन ने उत्सव से ज्यादा सवाल पैदा किए हैं, खाली कुर्सियां केवल लकड़ी और प्लास्टिक नहीं थीं—वे व्यवस्था से जवाब मांगती प्रतीक थीं, अब देखना है— क्या अगली बार मंच से पहले जनता को प्राथमिकता मिलेगी, या फिर कुर्सियां ही कार्यक्रम की स्थायी दर्शक बनी रहेंगी?


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