नियमों को ताक पर रख मशीनों से रेत का अवैध खेल
एमसीबी,पटना,12 फरवरी 2026 (घटती-घटना)। नियम किताबों में बंद हैं और मशीनें नदी की छाती पर चल रही हैं, केवई नदी के बिछियाटोला क्षेत्र में अवैध रेत उत्खनन का खेल खुलेआम जारी है, एनजीटी के स्पष्ट दिशा-निर्देशों को दरकिनार कर जलधारा के बीचों-बीच जेसीबी मशीनें उतारी जा रही हैं। सवाल सीधा है—जब नियम कहते हैं कि नदी में मशीनों से खनन वर्जित है,तो फिर यह साहस किसके संरक्षण में पनप रहा है? खनिज विभाग की हालिया कार्यवाही के दावों के बावजूद जमीनी सच्चाई कुछ और ही कहानी बयां कर रही है,नदी की कोख को उधेड़ती मशीनें बताती हैं कि यहां कानून की नहीं, बल्कि रसूख और सांठगांठ की सत्ता चल रही है।
प्रशासन के लिए कटघरे में खड़े सवाल
एनजीटी के प्रतिबंध के बावजूद मशीनें कैसे उतरीं?
हालिया कार्रवाई के बाद भी खनन क्यों नहीं रुका?
निगरानी और जवाबदेही किसकी है?
क्या अवैध उत्खनन पर नियमित निरीक्षण हो रहा है?
अब क्या?
मामला केवल अवैध रेत खनन का नहीं,बल्कि शासन व्यवस्था की विश्वसनीयता का भी है। यदि नियमों का पालन सुनिश्चित नहीं किया गया, तो कानून की धाराएं कागजी बनकर रह जाएंगी,केवई नदी का भविष्य इस बात पर निर्भर करेगा कि प्रशासन और संबंधित विभाग इस पर कितनी गंभीरता से कार्रवाई करते हैं। अन्यथा,नदी का यह मौन क्षरण कल एक बड़े पर्यावरणीय संकट का रूप ले सकता है।
एनजीटी के आदेशों की जलसमाधि?
नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) के निर्देश साफ हैं—नदी की जलधारा के भीतर मशीनों का उपयोग प्रतिबंधित है, केवल सीमित और नियंत्रित मैन्युअल उत्खनन की अनुमति दी जाती है ताकि पारिस्थितिकी तंत्र सुरक्षित रहे,लेकिन बिछियाटोला में जो दृश्य सामने आया,वह इन नियमों की खुलेआम अवहेलना जैसा है,दो जेसीबी मशीनें जलधारा के बीच खुदाई करती पाई गईं,यदि यह सच है,तो यह सिर्फ नियमों का उल्लंघन नहीं, बल्कि पर्यावरण के साथ सीधा खिलवाड़ है।
नियमों की बलि,मशीनों का शोर
रेत खनन के नियम इसलिए बनाए गए थे ताकि नदी का प्राकृतिक प्रवाह, जैव विविधता और भूजल संतुलन प्रभावित न हो,भारी मशीनों से खनन नदी की संरचना बदल देता है,कटाव बढ़ाता है और भविष्य में जल संकट की नींव रखता है,खनिज विभाग ने कुछ दिनों पहले कार्रवाई का दावा किया था,लेकिन सवाल यह उठता है कि यदि कार्रवाई हुई थी, तो फिर उत्खनन दोबारा कैसे शुरू हो गया? क्या वह कार्रवाई केवल कागजों तक सीमित थी?
प्रशासन की रहस्यमयी खामोशी
केल्हारी प्रशासन की भूमिका भी सवालों के घेरे में है,नदी किनारे चल रही गतिविधियों की भनक स्थानीय प्रशासन को न हो,यह मानना कठिन है, जनप्रतिनिधियों की चुप्पी ने भी संदेह बढ़ा दिया है,यदि नदी क्षेत्र की जीवनरेखा है,तो उसकी सुरक्षा पर सार्वजनिक आवाज क्यों नहीं उठ रही? क्या यह मौन सहमति का संकेत है या फिर जांच की प्रतीक्षा?
राजनीतिक विरोध, पर जमीनी बदलाव नहीं
ब्लॉक कांग्रेस अध्यक्ष (ग्रामीण) रामनरेश पटेल ने हाल ही में इस मुद्दे को उठाया था और प्रशासन पर सवाल खड़े किए थे,विरोध के बाद कुछ हलचल जरूर हुई,लेकिन जमीनी स्तर पर खनन गतिविधियां रुकती नजर नहीं आईं,यह स्थिति बताती है कि समस्या केवल एक विभाग की नहीं, बल्कि पूरे निगरानी तंत्र की है।
पर्यावरण की बलि—भविष्य पर संकट
रेत सिर्फ निर्माण सामग्री नहीं,बल्कि नदी के संतुलन का अहम हिस्सा है। अनियंत्रित उत्खनन से जलस्तर गिरता है,पुलों की नींव कमजोर होती है और बाढ़ का खतरा बढ़ता है,केवई नदी,जो इस क्षेत्र की जल आपूर्ति और कृषि की आधारशिला है,यदि इसी तरह दोही जाती रही तो आने वाले वर्षों में इसका असर गांवों और खेतों तक पहुंचेगा।
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