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सुरजपुर@ सुरजपुर कांग्रेस की कार्यकारिणी या पदों का महाकुंभ? अध्यक्ष-कोषाध्यक्ष छोड़ बाकी पर लंबी कतार

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  • एक अध्यक्ष, एक कोषाध्यक्ष…बाकी पदों पर भीड़-नई सूची ने बढ़ाई सियासी हलचल
  • तुम भी खुश,हम भी खुश फॉर्मूला! सुरजपुर कांग्रेस में पदों की बारिश
  • 51 सचिव,37 संयुक्त सचिव…संगठन विस्तार या रेवड़ी वितरण?
  • पदाधिकारियों की फौज तैयार-सुरजपुर कांग्रेस में जिम्मेदारी कम,पद ज्यादा?
  • कार्यकारिणी कम,नामों की परेड ज्यादा-नई सूची पर उठे सवाल
  • रेवड़ी मॉडल पर बनी टीम? कांग्रेस की नई कार्यकारिणी चर्चा में…
  • उद्योगपति बने कोषाध्यक्ष,क्या चुनावी तैयारी का संकेत?
  • नई टीम,नई रणनीति-संगठन मजबूत या आर्थिक गणित?

-न्यूज डेस्क-
सुरजपुर,10 फरवरी 2026 (घटती-घटना)।
छत्तीसगढ़ प्रदेश कांग्रेस कमेटी द्वारा जिला कांग्रेस कमेटी सुरजपुर की अनुमोदित कार्यकारिणी की सूची जारी होते ही जिले की सियासत में हलचल तेज हो गई है। चार पन्नों में फैली इस लंबी सूची को देखकर राजनीतिक गलियारों में व्यंग्य भी चल रहा है और चर्चा भी — क्योंकि अध्यक्ष और कोषाध्यक्ष जैसे दो अहम पदों को छोड़ दिया जाए तो बाकी लगभग हर स्तर पर पदाधिकारियों की लंबी कतार नजर आ रही है। कई कार्यकर्ता इसे संगठन विस्तार बता रहे हैं, तो कई इसे‘तुम भी खुश, हम भी खुश’ फॉर्मूले का नतीजा कह रहे हैं,सुरजपुर कांग्रेस की नई कार्यकारिणी ने जिले की राजनीति में नई बहस छेड़ दी है। किसी के लिए यह संगठन विस्तार का बड़ा कदम है,तो किसी के लिए‘पदों का महाकुंभ ‘। फिलहाल इतना तय है कि सूची ने सबको चर्चा का मौका जरूर दे दिया है—अब देखना यह है कि यह टीम मैदान में कितनी सक्रिय रहती है या फिर पदों की भीड़ में संगठन की दिशा कहीं खो न जाए।
‘रेवड़ी मॉडल’ या संगठन विस्तार? सूची सामने आते ही विरोधी दलों के साथ-साथ कांग्रेस के अंदर भी हल्की-फुल्की चुटकी शुरू हो गई। कुछ नेताओं ने नाम न छापने की शर्त पर कहा कि यह कार्यकारिणी कम और‘रेवड़ी वितरण योजना’ ज्यादा लग रही है, व्यंग्य में एक वरिष्ठ कार्यकर्ता ने कहा…‘पहले संगठन में जगह पाने के लिए मेहनत करनी पड़ती थी,अब सूची इतनी लंबी है कि मेहनत कम और संतुलन ज्यादा दिखता है।’हालांकि पार्टी के समर्थक इसे सकारात्मक कदम बताते हुए कहते हैं कि ज्यादा लोगों को जिम्मेदारी देने से संगठन जमीनी स्तर तक मजबूत होगा और चुनावी तैयारियों को गति मिलेगी।
सचिवों की फौज,कार्यकारिणी सदस्य पीछे : दिलचस्प पहलू यह भी है कि सचिव और संयुक्त सचिव पदों पर नियुक्तियां कार्यकारिणी सदस्यों से कई गुना ज्यादा हैं। इससे संगठनात्मक संरचना को लेकर सवाल उठ रहे हैं, राजनीतिक जानकारों का कहना है कि जब पद ज्यादा और अधिकार कम हों,तो संगठन में जिम्मेदारी का स्पष्ट बंटवारा करना चुनौती बन जाता है, कुछ लोग मजाक में कह रहे हैं—‘अब बैठक में कुर्सियां कम पड़ेंगी या माइक्रोफोन? ‘
कोषाध्यक्ष की नियुक्ति पर भी चर्चाओं का बाजार गर्म : नई कार्यकारिणी में कोषाध्यक्ष पद पर उद्योगपति वर्ग से जुड़े व्यक्ति की नियुक्ति ने अलग ही बहस छेड़ दी है। राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा है कि क्या आगामी चुनावों को देखते हुए पार्टी आर्थिक रूप से मजबूत चेहरा सामने लाना चाहती है, व्यंग्य में कुछ लोग यह भी कह रहे हैं कि—‘दौड़-भाग की जिम्मेदारी बाकी पदाधिकारियों की, और फंड की जिम्मेदारी उद्योगपति के पास।’ हालांकि पार्टी के करीबी लोग इसे वित्तीय प्रबंधन मजबूत करने की रणनीति बता रहे हैं।
पद इतने कि संगठन छोटा,सूची बड़ी लगने लगी
जारी सूची में जिलाध्यक्ष के रूप में सुश्री शशि सिंह का नाम शीर्ष पर है,कोषाध्यक्ष की नियुक्ति भी एकल है,लेकिन इसके बाद जैसे ही पदों का सिलसिला शुरू होता है,आंकड़ा तेजी से बढ़ता जाता है,उपाध्यक्ष,महामंत्री,मीडिया प्रभारी,प्रवक्ता से लेकर संयुक्त महामंत्री और सचिव तक—हर पद पर संख्या इतनी बढ़ी कि कार्यकारिणी कम और पदाधिकारियों की फेहरिस्त ज्यादा दिखाई देने लगी, सबसे ज्यादा चर्चा सचिव पद को लेकर है,जहां 51 नाम शामिल किए गए हैं। वहीं संयुक्त सचिवों की संख्या 37 तक पहुंच गई है,स्थायी और विशेष आमंत्रित सदस्यों की सूची भी किसी मिनी सम्मेलन से कम नहीं दिख रही। राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि इतनी बड़ी टीम बनाकर पार्टी ने शायद यह सुनिश्चित कर लिया है कि‘कोई नाराज़ न रहे’,भले ही जिम्मेदारियों का गणित बाद में तय करना पड़े।
संख्या इतनी कि कार्यकारिणी कम,सूची ज्यादा लगे…
उपाध्यक्ष पद पर दर्जनभर नाम,
महामंत्री और मीडिया प्रभारी में भी एक से अधिक नियुक्तियां,
संयुक्त महामंत्री की लंबी सूची,
सचिव पद पर तो मानो रिकॉर्ड बना दिया गया हो — 51 नाम,
संयुक्त सचिव 37,
स्थायी आमंत्रित सदस्य 24 और विशेष आमंत्रित सदस्य 28 तक पहुंच गए।

वरिष्ठता का गणित बना पहेली
इतनी बड़ी सूची जारी होने के बाद कई नए पदाधिकारी इस बात को लेकर असमंजस में हैं कि वरिष्ठता का पैमाना क्या होगा,सूची में नाम के क्रम से वरिष्ठता तय होगी या सभी को समान दर्जा मिलेगा—इस पर अभी स्पष्टता नहीं है, संगठन के पुराने नेताओं का कहना है कि जब पद ज्यादा और पदाधिकारी ज्यादा हों, तो सबसे बड़ी चुनौती तालमेल बनाए रखना होती है।
राजनीतिक संतुलन साधने की कोशिश?
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह कार्यकारिणी केवल संगठन विस्तार नहीं,बल्कि अंदरूनी गुटबाजी और असंतोष को संतुलित करने की रणनीति भी हो सकती है,जिले में लंबे समय से चल रही खींचतान को देखते हुए पार्टी ने शायद ज्यादा से ज्यादा चेहरों को शामिल कर‘सबको साथ’ रखने का संदेश देने की कोशिश की है,लेकिन सवाल यह भी उठ रहा है कि क्या इतनी बड़ी टीम मैदान में उतनी ही सक्रिय दिखाई देगी,या फिर सूची केवल कागजों में ही चमकती रह जाएगी।
आगे की राहः जिम्मेदारी या सिर्फ पद?
अब असली परीक्षा तब होगी जब संगठनात्मक कार्यक्रम शुरू होंगे और देखा जाएगा कि इतने पदाधिकारी जमीन पर कितना सक्रिय रहते हैं, राजनीतिक हलकों में चर्चा है कि अगर हर पदाधिकारी वास्तव में जिम्मेदारी निभाता है तो संगठन मजबूत हो सकता है, लेकिन अगर पद केवल नाम तक सीमित रहे तो यह सूची व्यंग्य का विषय बनती रहेगी।


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