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अंबिकापुर@1952ः राष्ट्रपति ने नाम दिया ‘बसंत’ 2025ः राष्ट्रपति सुनेंगी बसंत की व्यथा

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8 साल का ‘गोलू’, 80 साल का ‘बसंत’… और 73 साल बाद राष्ट्रपति से दूसरी मुलाकात

  • 8 साल का ‘गोलू’ अब 80 की उम्र में राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू से मिलेगा…
  • भारत के प्रथम राष्ट्रपति से नाम मिला था ‘बसंत’, अब 15वीं राष्ट्रपति से होगी मुलाकात…
  • 1952 में 8 साल के ‘गोलू’ से पहली मुलाकात…2025 में 80 साल के ‘बसंत’ से दूसरी मुलाकात…
  • 73 साल बाद इतिहास दोहराने को तैयार सरगुजा…
  • इतिहास का चक्र पूरा…पहले राष्ट्रपति ने उठाया था गोद में…अब 15वीं राष्ट्रपति करेंगी मुलाकात…
  • जंगल का गोलू अब बुजुर्ग बसंत,राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू तक पहुँचने का 73 साल का सफर…
  • बसंत की आंखों में 1952,और 2025 में फिर वही ऐतिहासिक पल…
  • पंडो समाज की उम्मीदें आज राष्ट्रपति के सामने,बसंत पंडो होंगे प्रतिनिधि


-न्यूज डेस्क-
अंबिकापुर,19 नवम्बर 2025 (घटती-घटना)।

छत्तीसगढ़ के सरगुजा संभाग में 73 साल बाद एक ऐसा ऐतिहासिक पल लौटने वाला है,जिसने पंडो समाज की पहचान और सम्मान को नई ऊंचाइयों पर पहुंचाया था, 8 साल की उम्र में ‘गोलू’ कहलाने वाला छोटा बच्चा,जिसे देश के प्रथम राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने अपनी गोद में उठाकर ‘बसंत’ नाम दिया था,आज वही व्यक्ति 80 वर्षीय बसंत पंडो,देश की 15वीं राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू से मिलने जा रहे हैं। सरगुजा की मिट्टी आज उस पल की गवाह बनने जा रही है,जिसे इतिहास सुनहरे अक्षरों में लिखेगा,जिस बच्चे को देश के पहले राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने झोपड़ी में जाकर गोद में उठाया,प्यार दिया,नाम दिया,आज वही बच्चा, अब 80 वर्ष का हो चुका बसंत पंडो,देश की 15वीं राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू से मिलने जा रहा है, यह सिर्फ एक मुलाकात नहीं यह तीन पीढि़यों, दो राष्ट्रपतियों, और एक जनजाति की संघर्ष गाथा का संगम है।
20 नवंबर को अंबिकापुर में राष्ट्रपति का आगमन,बसंत पंडो के लिए विशेष व्यवस्था
आज अंबिकापुर में राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू का कार्यक्रम तय है,जिला प्रशासन ने पंडो समाज की ऐतिहासिक भावनाओं को देखते हुए बसंत पंडो को राष्ट्रपति से मुलाकात के लिए आधिकारिक सूची में शामिल कर लिया है, बसंत पंडो को अंबिकापुर में प्रशासनिक संरक्षण में रखा गया है, आवास,सुरक्षा,कार्यक्रम में एंट्री और मुलाकात का समय सब तय कर दिया गया है,आज ही बसंत पंडो राष्ट्रपति से आमने-सामने मुलाकात करेंगे। उनके साथ चार लोगों को मिलने की अनुमति दी गई है।
1952 – जब इतिहास बना था…
1952 में सरगुजा के दौरे पर आए डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने जंगल की एक झोपड़ी में जाकर पंडो परिवारों से मुलाकात की थी, उसी समय 8 वर्षीय ‘गोलू’ को अपनी गोद में उठाकर उन्होंने कहा था ‘आज से इसका नाम बसंत होगा।’ उन्होंने बसंत को अपना दत्तक पुत्र समान माना, नया कपड़ा पहनाया और साथ ले जाने की इच्छा भी जताई थी, उस पल ने पंडो समाज के इतिहास में एक नया अध्याय शुरू किया था बैल,बैलगाड़ी, बीज,जमीन और 13 नई बसाहटें उसी दौर में बनाई गईं।
2025 – अब वही बसंत राष्ट्रपति से फिर मिलने जा रहा है…
73 साल बाद वही बच्चा आज 80 साल के बुजुर्ग के रूप में उम्मीद लेकर बैठा है उसकी आवाज़ आज भी भावुक हो उठती है ‘1952 में आपके पहले राष्ट्रपति ने मुझे अपनाया था…अब आप हमारे समाज की पीड़ा सुनें, हमें न्याय दिलाएँ।’ बसंत पंडो इस मुलाकात में अपने समाज की मुख्य समस्याओं और ऐतिहासिक मांगों को भी राष्ट्रपति के सामने रखने वाले हैं।
बसंत के साथ राष्ट्रपति से मिलने चार अन्य लोग भी जाएंगे…
मुलाकात के दौरान बसंत अकेले नहीं होंगे,जिला प्रशासन ने पंडो समाज के प्रतिनिधि चार अन्य लोगों को भी अनुमति दी है,ताकि समाज अपनी सामूहिक मांगें सीधे राष्ट्रपति तक पहुँचा सके।
मुलाकात सिर्फ बसंत की नहीं…पूरी पंडो जनजाति की आवाज़ होगी,बसंत पंडो की राष्ट्रपति से मुलाकात, क्या-क्या मांगें पूरी हो सकती हैं?
जाति प्रमाण-पत्र समस्या का स्थायी समाधान
पंडो विकास प्राधिकरण का गठन
ओड़गी-बिहारपुर-बैजनपाठ क्षेत्र में सड़क,बिजली-बुनियादी सुविधाएँ
पंडो युवाओं के लिए विशेष भर्ती अभियान
सूरजपुर के ‘राष्ट्रपति भवन’ को पर्यटन स्थल का दर्जा

भावनाओं से भरा एक ऐतिहासिक क्षण…
आज बसंत पंडो की राष्ट्रपति से मुलाकात सिर्फ एक वृद्ध व्यक्ति की पुरानी याद नहीं, बल्कि पूरे पंडो समाज के लिए सम्मान,न्याय और पहचान की लड़ाई का प्रतीक है, 73 साल बाद फिर वही इतिहास लौट रहा है, 1952 में राष्ट्रपति ने पंडो समाज को सम्मान दिया था 2025 में फिर वही सम्मान मिलने जा रहा है।
1952-झोपड़ी में बैठकर हुआ नामकरण… ‘आज से यह बसंत है ‘- 8 वर्षीय ‘गोलू’ उस दिन समझ ही नहीं पाया था कि इतिहास उसकी गोद में बैठा है, डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने उसे उठाया,नया कपड़ा पहनाया और कहा ‘आज से इसका नाम बसंत होगा।’ उसी दिन राष्ट्रपति ने उसे अपना दत्तक पुत्र जैसा सम्मान दिया था उस मुलाकात के बाद पंडो समाज पहली बार शासन की मुख्यधारा में आया था।
2025-बुज़ुर्ग बसंत की आँखों में वो ही चमक :अब 80 की उम्र में भी बसंत की आवाज़ में वही मासूम कंपन है ‘1952 में देश के राष्ट्रपति ने मुझे अपनाया था… आज मैं फिर अपने राष्ट्रपति से मिलना चाहता हूँ।’ वे राष्ट्रपति मुर्मू से सीधे पंडो समाज की समस्याएं,पीड़ा और मांगें बताने वाले हैं।
इतिहास का गोल चक्र,एक बच्चे से शुरू हुआ सफर, एक बुजुर्ग पर पूरा हो रहा है…
1952 में राष्ट्रपति ने सरगुजा को सम्मान दिया था, 2025 में वही सम्मान एक कदम आगे बढ़कर पूरा होने जा रहा है, बसंत पंडो की मुलाकात केवल एक व्यक्ति की कहानी नहीं, यह पंडो समाज के अधूरे विकास, भीतर दबे दर्द और न्याय की पुकार की कहानी है।


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