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अंबिकापुर@एक आरक्षक,एक वकील और शहर की चुप्पी के बीच खड़ा न्याय

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  • अंबिकापुर मारपीट विवाद पर सोशल मीडिया फटा…वकील परिवार पर हमले की निंदा,लेकिन पुलिसकर्मी के समर्थन में भी उठी आवाजें
  • ‘पूरा सच सामने आए,आधा-अधूरा नहीं’लोग दोनों पक्षों की निष्पक्ष जांच की मांग कर रहे…


-न्यूज डेस्क-
अंबिकापुर,18 नवम्बर 2025 (घटती-घटना)। अधिवक्ता राजेश तिवारी और उनके परिवार के साथ प्रधान आरक्षक संतोष कश्यप द्वारा की गई मारपीट की घटना पर शहर में जहां भारी आक्रोश है,वहीं सोशल मीडिया पर इस मामले ने दो धड़ तैयार कर दिए हैं,बड़ी संख्या में लोग पुलिसकर्मी की कार्रवाई को निंदनीय बता रहे हैं,जबकि कुछ लोग यह भी कह रहे हैं कि‘दोनों पक्षों का पक्ष सुने बिना घटना को एकतरफा न बताया जाए। ‘अंबिकापुर की सड़कों पर एक सवाल गूंज रहा है,‘कानून किसके लिए है?’ कमजोर के लिए या वर्दी वालों के लिए? या उन लोगों के लिए जो अपने पद,पहचान और नेटवर्क के बल पर न्याय को मोड़ लेते हैं? एक ओर वरिष्ठ वकील का घायल परिवार है। दूसरी ओर एक प्रधान आरक्षक है जिस पर‘मारपीट और दुर्व्यवहार’ के आरोप हैं और बीच में खड़ा है प्रशासन जो लाइन अटैच की पुरानी, घिसी-पिटी औपचारिकता को ‘कार्रवाई’ बताकर खुद पर से बोझ हटाने में लगा है,लेकिन असली सवाल यही है,क्या कानून सिफऱ् किताबों में सख्त है या सख्ती सिफऱ् उन्हीं पर होती है जो आवाज़ नहीं उठा पाते? शहर यह भी पूछ रहा है जब सड़क पर मनचले दहशत फैलाएँ,बाइक बाज़ आतंक मचाए,तो पुलिस कागज़ों में ‘फर्जी चालान’ से अपनी कार्रवाई दिखाती है,लेकिन जब मामला एक सीधे-साधारण परिवार बनाम पुलिसकर्मी का हो…तब वही पुलिस अचानक ‘सिस्टम में बंधी’ हो जाती है। क्या यही न्याय है? क्या यही व्यवस्था है? क्या यही कानून की हुकूमत है? फेसबुक पर उठते सवाल हमें आईना दिखाते हैं कुछ लोग वकील का पक्ष ले रहे हैं,कुछ पुलिसकर्मी की ‘छिपी कहानी’ बता रहे हैं, लेकिन एक बात दोनों पक्षों में साफ दिखती है लोगों को प्रशासन पर भरोसा नहीं है,लोगों को जांच पर भरोसा नहीं है,लोगों को कानून के बराबरी के सिद्धांत पर भरोसा नहीं है, और यही सबसे बड़ा खतरा है,अगर शहर को यह महसूस होने लगे कि ‘न न्याय मिलेगा,न कानून सुनेगा ’,तो यह डर नहीं,यह व्यवस्था की हार है। एसपी का यह कहना कि ‘कड़ी कार्रवाई होगी, मैं स्वयं जांच कर रहा हूँ’ एक उम्मीद की किरण है,लेकिन शहर पूछता है क्या इस उम्मीद पर सिस्टम खरा उतरेगा? या यह आश्वासन भी किसी फाइल की धूल में खो जाएगा? कानून किसके लिए है…आज अंबिकापुर यह पूछा है,कल कोई और शहर पूछेगा और अगर जवाब सच में नहीं मिला तो न्याय की कुर्सी खाली नहीं,पर बेहिसाब डगमगाती ज़रूर दिखाई देगी।
एक पक्ष का आरोप…पुराना
बदमाश है…अब बर्दाश्त से बाहर

कई स्थानीय नागरिकों ने फेसबुक पर लिखा कि आरक्षक पहले भी विवादों में रहा है और इस बार उसने हद पार कर दी,एक यूजर ने लिखा ‘एक झूठ हो पलटे हैं…अब बर्दाश्त से बाहर है…पुराना बदमाश है।’ दूसरे लोगों ने कहा कि पुलिसकर्मी द्वारा की गई हरकत बेहद निंदनीय,कायराना, और ‘पुलिस की गरिमा के खिलाफ’ है।
दूसरे पक्ष का तर्क ‘दोनों पक्ष पड़ोसी हैं, मामला बढ़ा-चढ़ा कर पेश किया गया ’
कई लोगों ने कहा कि…‘वकील साहब का भी पक्ष जांच होना चाहिए।’ ‘दोनों पक्ष पड़ोसी हैं…झगड़ा हुआ तो पूरा मामला पुलिस बनाम वकील बना दिया।’ ‘बिना वजह कोई पुलिस वाला मारपीट नहीं करेगा… कुछ न कुछ छिपा है।’ एक कमेंट में लिखा गया ‘निष्पक्ष जांच होनी चाहिए,दबाव में आकर पुलिस को कोई कदम नहीं उठाना चाहिए।’ एक अन्य ने लिखा ‘आधा-अधूरा मत लिखिए…पूरा सच लिखिए।’
संतोष कश्यप के
समर्थन में भी आवाज उठी

कई यूजर्स ने पुलिसकर्मी के पक्ष को भी सामने लाने की मांग की और कहा कि‘पुलिस वालों ने ही पुलिसकर्मी के खिलाफ थाने में बैठकर षड्यंत्र रच दिया।’एक वरिष्ठ टिप्पणीकार ने लिखा ‘दो समाज के लोगों को लड़ाने का काम यह दो पुलिसकर्मी कर रहे हैं…दोनों पर जांच हो। कोई भी कानून से ऊपर नहीं हो सकता—न पुलिस,न वकील। ‘
वकील पक्ष का आरोपःपैर टूट गया,
महिला को धक्का दिया,बेटे को मारा

फिर भी सिर्फ लाइन अटैच! ‘- अधिवक्ता समुदाय व नागरिकों का कहना है कि वकील के बेटे को पीटा गया,वकील को भी मारा गया, चोटें आईं,पत्नी को भी धक्का-मुक्की की गई,इसके बाद भी आरोपी को सिर्फ लाइन अटैच किया गया जो ‘कमजोर कार्रवाई’ है
एसपी सरगुजा का बयानः कड़ी कार्रवाई करेंगे,मैं स्वयं जांच कर रहा हूँ…
पहल से बातचीत में एसपी ने कहा ‘मामला गंभीर है, लाइन अटैच तो प्रारंभिक कदम है, हम इससे भी कड़ी कार्रवाई करेंगे, मैं स्वयं इस मामले की जांच कर रहा हूँ। ‘
सोशल मीडिया पर इस पूरे विवाद में मुख्य तीन बातें सामने आईं…
शहर का एक बड़ा हिस्सा अधिवक्ता परिवार पर हुए हमले से आक्रोशित है, दूसरा पक्ष कह रहा है कि पुलिसकर्मी की भी बात सुनी जाए, मामला पड़ोस विवाद से उठा था, लोग खुलकर कह रहे—निष्पक्ष,दबाव-मुक्त जांच हो, किसी भी पक्ष को बचाया न जाए।


पुलिस का दृष्टिकोण (जैसा सोशल मीडिया पर सामने आया)
यह मामला ‘पड़ोस विवाद’ से उठा, पुलिसकर्मी अकेले दोषी नहीं

‘दोनों पक्षों की भूमिका जांच हो’ कुछ यूजर्स के अनुसार ‘वकील पक्ष ने आधा सच बताया’ आरोपः ‘थाने के अंदर ही पुलिसकर्मियों ने अपने ही साथी के खिलाफ षड्यंत्र बनाया’ नागरिक व वकील समुदाय का दृष्टिकोण- वकील के बेटे को पीटा गया वह भी मामूली बात पर वरिष्ठ वकील को भी चोटें आईं, पत्नी से धक्का-मुक्की गंभीर अपराध, इससे भी बड़ा सवाल ‘सिर्फ लाइन अटैच क्यों?’ आरोपः ‘मवाली नहीं पकड़ पाते, शरीफ पर ताकत दिखाते हैं ‘।
व्यवस्था का संकटः भरोसे की कमी…
यह मामला सिर्फ मारपीट नहीं, बल्कि ‘विश्वास संकट’ है लोग महसूस कर रहे, पुलिस मनचलों पर कमजोर, आम नागरिक पर कड़े, एकतरफा कार्रवाई की प्रवृत्ति बढ़ रही जाँच को लेकर संदेह गहरा है। प्रशासनिक चुनौती एसपी का बयान स्थिति सुधार सकता है, जांच वास्तव में निष्पक्ष हो दोनों पक्षों के बयान रिकॉर्ड हों, मेडिकल, सीसीटीवी, गवाह सब निष्पक्षता से देखे जाएँ दोषी चाहे पुलिस हो या नागरिक कार्रवाई समान हो यह मामला अब केवल ‘मारपीट’ का नहीं रहा यह पुलिस की विश्वसनीयता बनाम जनता के विश्वास की लड़ाई बन चुका है।


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