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लेख@ उपहार अइशन हो जेन कामयाबी के निशैनी बनै

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भंवरपुर नाम के एकठन गांव मा सुखवा नाम के एक मध्यम वर्गीय किसान रहय। सुखवा के गोसईन के नाम दुखवा रहय। दोनों प्राणी मिल के बढिया खेती किसानी ला करय। दोनों के मया ले एक झक सुग्घर बाबू लइका होते।अपन लइका के छट्ठी बरही करवाते अउ नाम संस्कार मा ओकर नाम शिव रखते। शिव के
पढ़ई लिखई मा सुखवा अउ दुखवा हा कोनो किस्म के कमी नइ करय।
शहर मा जा के शिव हा पूरा एम बीए के पढ़ई ला पूरा करते।पढ़त पढ़त शिव हा सती नाम के एकझिन छोकरी संग मया कर बइठते।अब शिव अउ सती करे ता करे काए दोनों मोटियारा हा अपन मया के बंधना मा बंध जते। शिव हा परीक्षा सिराए के बाद अपन गांव अउ अपन दाई ददा के तीर मा आ जते। गांव मा आए के बाद शिव बर सुखवा हा एकठक किराना दुकान खोल के दे देते।
सुखवा अउ दुखवा हा अब विचार करे ला लागते की, अब हमर टुरा हा कामाए ला धरले हे अउ जवान होगे, ता एकर बिहाव ला अब कर देना चाहिए। दोनों प्राणी शिव ला अपन तीर मा बलाते अउ कहिते देख बेटा तंय हा अब जवान होगेस अब तोर हमन बिहाव करबो अउ कालि तोर बर छोकरी देखे बर जाबो।दाई ददा के अतका बात ला सुन शिव कहिते दाई ददा हो मंय हा एक झन सती नाम के टुरी ले मया करतो। तु मन के विचार हा हो जतिस ता मंय हा सती संग बिहाव करतेव।
शिव के बात ला सुन सुखवा हा कहिते तंय तो हमर छोकरी खोजे के पइसा ला बचा देस रे।फेर अतका बात हे बाबू तंय हा हममन ला ओ छोकरी के दाई ददा अउ ओकर घर द्वार ला देखाबे।दाई ददा के बात ला सून शिव कहिते ददा सती हा अनाथ आए,अउ अनाथालय हा ओकर घर द्वार आए। अतका बात ला सुन सुखवा के आंखी हा डबडबा जते। सुखवा हा अपन लइका ला कहिते मंय हा तोर पसंद के मान रखत हो बेटा, तंय हा ओ नोनी ला फोन कर हममन ओ नोनी ला पचीस अगस्त के तोर बर बिहाए ला जाबो।
ददा के गोठ ला शिव हा गदगद हो जते, अउ अपन मयारू सती ला फोन मा कहिते की, मोर दाई ददा हा तोला पसंद कर डरे हे, अउ तोला हमन पच्चीस अगस्त के बिहा के अपन घर लाबो। शिव के गोठ ला सुन सती के मन मा खुशी के लड्डू फूटे ला लागते। पचीस अगस्त के दिन सुखवा अउ दुखवा हा अपन बेटा बर सती ला बहू बिहा के अपन गांव भंवरपुर ले जते। अब चारों प्राणी सुग्घर ढंग ले रहय ला लगते।
‌ सुखवा हा अपन बेटा बहू के सुवारथपन व्यवहार ला देख परेशान हो जत। सुखवा हा एक दिन बिलासपुर मा एकठन किस्त मा बने बनाए मकान लेते,जेकर आधा कीमत ला अपन पहली दे देते।घर मा अपन गोसईन दुखवा ला बताते मंय हा आज एक ठन बिलासपुर मा घर ले हो कहिके अतका ला सुन दुखवा हा खुश हो जते।
सुखवा ला पता रहय की अवैया पुन्नी मा शिव के जन्म दिन रहय। जन्म दिन मा सुखवा हा अपन बेटा बहू ला उपहार मा बिलासपुर के घर ला दे थे, सुखवा हा कहिते तुमन दोनों देवारी के बाद बिलासपुर मा रहिहौ।ससुर के गोठ ला सुन सती हा खुश हो जते,पर शिव कहिते नही ददा हमन गांवें मा ही रहिबो। नहीं अब तुमन हा शहर के नवा घर मा रहो। अपन आदमी के गोठ ला सुन के दुखवा के अकाबका नइ रहय। दुखवा हा सुखवा ला पुछते तंय हा तो जी शिव के पसंद ला अपन पसंद मान के शिव अउ सती के बिहाव ला करें हस,फेर काबर ओ मन ला बिलासपुर मा रहय ला कहत हस।गोसईन के गोठ ला सुन सुखवा हा कहिते,ये मन दूनो प्राणी उहां रहि मकान के किस्त अउ बिजली अउ नल के बिल पटाही तब समझ मा आही की पइसा के कीमत का होते।
शिव अउ सती हा बिलासपुर मा रहय ला लगते तब समझ मा आते की पल पल मा पइसा के जरूरत पड़ते अउ पइसा के का कीमत होते।शिव ला अब एक सौ एक प्रतिशत बात समझ मा आ जते कि, ददा हा मोला किस्त मा घर ले के उपहार मा काबर दिस।अब कम से कम मंय हा अपना परिवार ला तो अच्छा से चला सकतो, काकरो आघु मा मोला हाथ फैलाए के जरूरत नइ पड़े,आज मंय हा पूरा पूरा आत्मनिर्भर होगे हव ।
लक्ष्मीनारायण सेन
खुटेरी गरियाबंद (छ.ग.)


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