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लेख@ साइकोलॉजी पर आधारित मानसिक रोग वैज्ञानिक तथ्य और कर्म बंधन की थ्योरी

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मानव को कुदरत ने सभी अन्य जीव जंतुओं से हटकर दिमाग प्रदान किया है जो मनुष्य को सोचने समझने की ताकत देता है। यदि जीवन को सुचारु रूप से चलना हो तो शारीरिक स्वास्थ्य के साथ-साथ मानव का मानसिक तौर पर स्वस्थ होना बेहद जरूरी है। यदि व्यक्ति अपना मानसिक संतुलन खो देता है तो वह समाज से कट जाता है। ऐसे में वह अपनी एक अलग दुनिया बना लेता है। मानव का दिमाग,किस तरह से काम करता है? वह कैसे सोचता है ?यह सब ह्यूमन साइकोलॉजी के अंतर्गत आता है। ह्यूमन साइकोलॉजी एक ऐसा विषय है जिसमें अनेक पहलू काम करते हैं। साइकोलॉजी के अनुसार मानव अपना दिमागी संतुलन किसी न किसी ट्रामा के तहत खो देता है ।मानव के सबकॉन्शियस माइंड में कुछ घटनाएं हमेशा हमेशा के लिए जिंदा रह जाती हैं और उसे लगातार पीड़ा/दर्द देती हैं। जो उसकी एंजाइटी,डिप्रेशन,साइकोसिस जैसी अन्य मानसिक बीमारियों का कारण बनती है। साइकोलॉजी में यह मान्यता है कि किसी भी इंसान की परवरिश और उसके बचपन में हुए कड़वे हादसे उसके मानसिक तनाव का एक बहुत बड़ा कारण है। विज्ञान के अनुसार शारीरिक या मानसिक रोग अधिकतर मानव को अपने जीन्स/वंशजों से मिलता है। इसके अलावा नशा भी मानसिक रोग का एक बहुत बड़ा कारण माना जाता है। इस तरह की मानसिक बीमारियों में दवाइयों और मनोवैज्ञानिक थैरेपीज का सहारा लिया जाता है। जिस से पीडि़त व्यक्ति के दिमाग को संतुलित किया जाता है। जिसमें सीबीटी,ग्राउंडिंग टेक्निक,डीप ब्रीदिंग,मिरर थेरेपी, आर्ट थेरेपी,म्यूजिक थेरेपी इत्यादि शामिल है। साइकोलॉजी विज्ञान और तथ्यों की भाषा बोलती है। मगर दूसरी और जब हम साइंस से हटकर कुदरत और स्पिरिचुअलिटी की बात करते हैं तो पाते हैं कि मानव अपने कर्म बंधन से बंधा हुआ हर जीवन चक्र का भोग भोगता है। जीवन में होती घटनाएं एक समय चक्र पर निर्धारित दिखाई पड़ती है और कब कौन सी घटना अचानक से जीवन की दिशा बदल देती है यह समझना मुश्किल हो जाता है। उदाहरण के तौर पर एक घर के सभी व्यक्ति एक ही तरह की परिस्थिति में पलते बढ़ते हैं। मगर हर व्यक्ति की अपनी व्यक्तिगत घटनाएं उस पर अलग-अलग असर डालती है। एक परिवार के होने के बावजूद घर के प्रत्येक व्यक्ति की सोच, उसका कर्म पूरी तरह से अलग होता है। शायद इसीलिए मानसिक रोगों से निजात पाने के लिए कई तरह की हीलिंग थेरेपी प्रैक्टिस में है । जिनमें पास्ट लाइफ रिग्रेशन,आकाशिक रीडिंग,हिप्नोसिस इत्यादि शामिल है। आज आधुनिक समय में मानसिक रोग दिन प्रतिदिन बढ़ता चला जा रहा है। इस विषय पर खुलकर बात होने लगी है । आज हर व्यक्ति तनावग्रस्त है । साइकोलॉजी परफेक्शन को नहीं मानती है। यदि हम साइकोलॉजी के नजरिए से देखें तो प्रत्येक व्यक्ति में कुछ ना कुछ निकल ही आयेगा क्योंकि हर व्यक्ति की जिंदगी में उतार-चढ़ाव रहता ही है। जो कोई भी उन उतार-चढ़ाव में लंबे समय तक ठहर कर रह जाता है वह मानसिक रोगी बन जाता है । जिंदगी तभी ठीक से चलती है जब आप सफर में आने वाले हर उतार-चढ़ाव को पार करते हुए आगे बढ़ते जाते हैं।


केशी गुप्ता
द्वारका,दिल्ली


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