
काम करने वालों के पास समय का अभाव है,जो नौकरी करते हैं वह भी अपने घर के कार्यों के लिए समय निकाल नहीं पाते हैं क्योंकि शरीर में जो ऊर्जा बनती है वह भी ऊर्जा खत्म होती है और खत्म ऊर्जा के साथ शायद ही कोई अन्य काम हो पाए,जब नौकरी पेशे या व्यापार से जुड़े हुए लोग मूल काम के अलावा अतिरिक्त समय अपने लिए घर परिवार के कार्य के लिए निकाल पाने में तरस जाते हैं। जैसे-तैसे समय उन्हें मिल पाता है और जब मिलता है तो वह शायद उन कामों को कर पाते हैं जो काम उनकी वजह से घर का या घर से संबंधित निजी नहीं हो पाता है,पर इस व्यस्ततम समय में यदि देखा जाए तो जनप्रतिनिधियों को सबसे व्यस्त माना गया है। यानी की देश के प्रधानमंत्री से लेकर मुख्यमंत्री तमाम मंत्री विधायक सांसद सभी सबसे व्यस्ततम व्यक्ति माने जाते हैं। मुख्यमंत्री के तो कार्यों के लिए ऐसा कहा जाता है कि पूरा प्रदेश चलाना होता है उन्हें बहुत काम करना पड़ता है वह भी राज्य के लिए। कुछ ऐसा ही मंत्री के साथ है और कुछ ऐसा ही विधायक के साथ है इनके ऊपर बहुत बड़े क्षेत्र की जिम्मेदारी होती है पर इस बीच प्रोपेगेंडा या सस्ती लोकप्रियता हासिल करने के लिए क्या इन्हें समय मिल जाता है? अब आप सोच रहे होंगे कि यह सवाल क्यों हो रहा है तो यह सवाल इसलिए हो रहा है कि निर्वाचित जन प्रतिनिधि जो प्रधानमंत्री,मुख्यमंत्री, मंत्री,सांसद,विधायक बनते हैं उनके पास जो काम होता है जो जिम्मेदारी होती है। वह काफी बड़ी होती है इतनी बड़ी जिम्मेदारी के साथ इतने बड़े क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करना और समस्याओं को देखना और उस बीच अपने लिए आराम का समय निकालना भी उनके लिए कठिन होता है, फिर वह कैसे खेती-किसानी जैसे फोटो को सोशल मीडिया पर डालकर लोकप्रियता हासिल करना चाहते हैं? सभी को पता है कि यह सक्षम व्यक्ति हैं जो किसान तो हैं,पर उनके पास काम करने वालों की कमी नहीं है। उनके भरोसे उनकी रोजी-रोटी भी चलती है,जो उनके खेतों में काम करते हैं या फिर उनके अन्य काम करते हैं और यह लोग इसलिए लोगों को रखते हैं ताकि उन्हें रोजगार मिले और मंत्री विधायक स्वतंत्र होकर जिनके लिए वह यह जिम्मेदारी लिए हैं वह काम कर सके,पर ऐसा क्या हो पा रहा है? छत्तीसगढ़ में भाजपा हो कांग्रेस हो या फिर कोई अन्य दल हो जैसे ही मंत्री विधायक बनते हैं वह अपने आप को जमीन से जुड़ा बताने का दावा करते हैं पर क्या जमीन के लोगों से उनका वह जुड़ाव होता है जिसके लिए लोगों ने उन्हें चुना है या फिर एक दिन की फोटो डालकर वह अपने आप बताना चाहते हैं जो शुरू से वह रहे हैं,पर क्या मंत्री बनने या मुख्यमंत्री बनने के बाद ऐसे कार्यों के लिए उनके पास समय है या फिर सिर्फ फोटो शूट कर कर ही यह बताया जाता है कि वह किसान है? यह किसी एक मंत्री की बात नहीं है या फिर किसी एक पार्टी की बात नहीं है दोनों राष्ट्रीय पार्टियों के कई मंत्रियों को देखा गया है जिन्होंने सिर्फ सस्ती लोकप्रियता के लिए अपना मूल काम छोड़कर अपने आप को अलग व्यक्ति बताने का प्रयास किया है।
वैसे विधायक मंत्री या मुख्यमंत्री का हर पल फरियादी इंतजार करते हैं उनके लिए अपनी फरियाद लेकर आए लोग घंटों इंतज़ार करते हैं और वह कई बार आधे दिन या पूरे दिन भी इंतजार में बिता देते हैं और जब वह अपनी फरियाद सुना पाते हैं। निराकरण की तरफ उनकी फरियाद पहुंच पाती है तब वह घर जा पाते हैं निश्चिंत हो पाते हैं। ऐसे में शायद ऐसे जिम्मेदार पदों पर बैठे जनप्रतिधियों को जनता के लिए पर्याप्त समय निकालना चाहिए और उनकी फरियाद सुनकर उसके निराकरण का प्रयास करना चाहिए। खेती-किसानी या अन्य पारिवारिक जिम्मेदारियों को निभाना कतई गलत नहीं है बस उसका दिखावा कम होना चाहिए उसकी जगह मुख्य जिम्मेदारी जो जनता ने खुद के नेतृत्व और खुद के समस्या समाधान की उन्हें दी है उसके लिए काम करना महत्वपूर्ण होना चाहिए। वहीं जनप्रतिनिधियों को बने तो ऐसे मामले में ही सोशल मीडिया में ख्याति के लिए लोकप्रियता के लिए सामने आना चाहिए। किसान होना गर्व का विषय है निश्चित है लेकिन आज निर्वाचित जनप्रतिनिधि के लिए उससे बड़ा गर्व एक बड़े समूह मानव समूह का नेतृत्वकर्ता होना है और उस जिम्मेदारी का बेहतर निर्वहन और आम लोगों की समस्याओं का निराकरण ही उनका मूल कर्तव्य होना चाहिए। वैसे राजनीतिक दलों के लिए लोकप्रियता भी बहुत जरूरी है पर इस जरूरी लोकप्रियता के बीच लोकप्रिय होने के और भी रास्ते हैं यदि लोकप्रियता जनता से जुड़ा हुआ है तो जनता से जुड़े हुए काम को करके ही लोकप्रियता बनाई जा सकती है और उस लोकप्रियता को शायद ही कोई खत्म कर पाएगा,वह लोकप्रियता इतिहास के पन्नों में दर्ज हो जाएगा,पर क्या इस सोच के साथ लोकप्रियता वास्तव में होनी चाहिए या फिर सिर्फ दिखावे की लोकप्रियता ही राजनीतिक दलों का उद्देश्य है जो सिर्फ चांद समय में ही सिमट जाते हैं पर वास्तव में अपने कामों से कमाई गई लोकप्रियता इतिहास के पन्नों में दर्ज होती है यह संसार का कटु सत्य है। वैसे किसान होना गर्व की बात है और बड़े-बड़े पदों पर बैठे लोग भी किसान है और खेती किसानी से जुड़े हुए हैं पर उनकी व्यस्तता कहीं ना कहीं उन्हें खेतों से दूर रखती है वह चाह कर भी अब उस कार्य को नहीं कर पाते हैं करवाना ही ज्यादा मुनासिब समझा जाता है, भारत देश के राजनीतिक से लेकर प्रशासनिक शासन में बड़े-बड़े लोग बैठे हुए हैं न्यायपालिका से लेकर कार्यपालिका व निचले स्तर के कर्मचारी भी किसान होते हैं और कई तो ऐसे हैं जिनकी आजीविका का साधन ही खेती किसानी है इसके अलावा उनके पास कोई अन्य कार्य नहीं है जिस वजह से अक्सर वह साल के 12 माह खेतों में ही दिखते हैं पर यह लोग लोकप्रियता की चिंता नहीं करते हैं यह सिर्फ अपना श्रम करते हैं और अपने श्रम का बेहतर फल देखना चाहते हैं और वह फल होता है उनके खेतों में लगे अनाजों की बेहतर उत्पादन। पर वही किसान मानकर बड़े-बड़े पदों पर बैठे लोग इसे लोकप्रियता का साधन भी मान्य बैठे हैं और कभी-कभार खेतों में पहुंचकर उसे देख लेना या फिर उसके लिए थोड़ा सा मेहनत कर देना को ही वह लोकप्रिय समझ बैठते हैं पर ऐसा है नहीं जमीनी हकीकत से पूरा उलट है मामला।
-रवि सिंह-
कोरिया,छत्तीसगढ़
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