
हमारे देश की समृद्धि और संस्कृति की ऊंचाई हमारी परंपरा और हमारे संस्कारों पर टिके होते हैं। इसके सबूत इतिहास ने और समग्र मानव जाति ने देखे हैं। भारत के पास उसकी प्राचीन विरासत है। जिससे अनेक तरह की कला, साहित्य और धर्म विश्वस्तर पर पहुंचा है। मात्र देश में ही नहीं, देश की सीमाओं को लांघ कर विदेशों में यानी पूरे एशिया में कला, साहित्य और गुरुओं- बुद्ध, महावीर,कृष्ण,राम और अन्य अनेक भगवान के रूप में पहचाने जाने वाले महापुरुष धर्म को मानवधर्म के साथ जोड़ कर तमाम अनमोल उपदेश दिए हैं। उसमें कला के बहुआयामी प्रकारों का भी समावेश होता है। भगवान बुद्ध के लिए कहा जाता है कि जब वह केवल मानव थे, तब भी वह बहुत समझदार, गहराई से विचार करने वाले और कलापोषक तथा उसी तरह कला प्रचारक दृष्टिकोण रखने वाले थे। उनका यह असर बुद्धिज्म में झलकता है। वियतनामी विचारधारा के अनुसार,बुद्ध शुरू से ही भगवान नहीं थे। वह भी हमारी तरह मनुष्य थे और उन्होंने बहुत कुछ सहन किया था। न्यूयार्क के पहाड़ों-नदियों के साधुओं का कहना है कि बुद्ध अपनी मानवता की आधारशिला पर प्रेरणादायी व्यक्तित्व हैं।
ध्वज, पद्मासन, भिक्षापात्र जैसे बुद्ध के प्रतीक ओम मणिपद्म ओम का मंत्र, पद्मासन में विराजमान बुद्ध, ऊंची अंगुली दिखाता बालक बुद्ध और उनकी असंख्य अन्य मुद्राओं से शुद्ध कला के दर्शन होते है। उन्होंने पिंड ही ऐसा गढ़ा और दृष्टि ऐसी रची कि उनकी सृष्टि के कणकण में कला के दर्शन होते हैं। इसी से उनके शिष्य, अनुयायी कला के पंथ पर चले। बौद्ध चित्र कला का शिल्प और उसी तरह स्थापत्य कला तमाम नमूनों को प्रदेशों में घुमाने के बाद हम रसिकों को एक से अधिक चित्र कला प्रसाद के रूप में मिलती है। और उसका नाम है रोगन अथवा रोगन चित्र कला। यही दोनों नाम प्रचलित है। बौद्ध शिष्यों ने इस खास कला का अंग्रेजी में नाम खोजा- ड्राइंग ऑयल टेक्निक। विश्व की सब से पुरानी यह चित्रशैली पांचवी सदी में नजरों में आई। यह कला फारस, जो अब ईरान है, वहां से आई। बाकी ग्यारहवीं सदी में तैलरंग परंपरा शुरू हो गई थी। रोगन के रूप में पहचाने गए ये चित्र 1550 साल पहले उत्सुकों के ध्यान में आए। भारत के पड़ोसी देश अफगानिस्तान के मध्य में स्थित बामियान खाड़ी का बामियान गांव हिंदुकुश पर्वतों के बीच स्थित है, जो राजधानी काबुल से अस्सी मील की दूरी पर है। यहां बुद्ध ने छठी-सातवीं सदी में पत्थरों की दरारों और गुफाओं में उकेरवाईं थी। जहां किला, मठ और कलात्मक सामग्रियों की स्वर्गीय शोभा बिखरी पड़ी थी। गौतम बुद्ध के दो विशाल पत्थर के शिल्प छठी सदी के साक्षी है। उनका विनाश अन्य प्रजातियो ने मिसाइल से किया और उनकी कार्बन डेटिंग की गई। यूनेस्को, भारत का पुरातत्व विभाग और जापान के शोधकर्ताओं ने जांच शुरू की है।
रोगनी काम,रंग रोगन शब्दों में है रोगन कला
असल के समय में होते घांघरा और ओढ़नी के मर्यादित नमूनों में अब नवयुग में लोकप्रिय ऐसी अनेक कलाकृतियों का समावेश हो रहा है। चादर,थैली, थैला, तकिया,तकिया के कवर, टेबल क्लाथ,वाल हैंगिंग, परदा,दुपट्टा, कुरता आदि। भूतकाल में मात्र पुरुषों के लिए कही जाने वाली यह कला अब स्ति्रयों ने भी हस्तगत की है। रोगन चित्र कला की कलाकृतियां अब परदेश गमन भी करने लगी हैं। ये एक महंगी भेंट साबित होती हैं। प्रचलित और लोकप्रिय। अब इस कला का गौरव बढ़ता जा रहा है, परंतु साथ ही साथ सभी को लभ्य न होने से लोग मशीन वर्क और सिंथेटिक माध्यमो को स्वीकार करने लगे हैं। इस कला का पुनरुत्थान हुआ है। कला को बनाए रखने वाले कलाकारों द्वारा जागृति धीरे धीरे रंग ला रही है। ये है दो हाथ की कला – दो हाथों के बीच का संवाद, जो हवा में तीव्र गति से पर स्वस्थ चित्त से भांति भांति रचते हैं। आखिर क्या है यह रोगन? और यह तेल वाले चित्र कैसे बनते है? हम तो यही जानते हैं कि कलाकार केनवास पर ऑयल पेंटिंग से विश्वसर्जन करते है। तो यह जान लें कि इसमें किस किस तरह के तेल का उपयोग होता है? रंग तो पांच, पर सवाल अपार। यह मोटे सूती कपड़े,खादी, खद्दर पर होती है, पर इसकी प्रक्रिया कैसी होती है? अरंडी,अलसी, खसखस और अखरोट के अलगअलग गुणवत्ता वाले तेल का इसमें क्या रोल है? रोगन कला को जीवित रखने का श्रेय गुजरात की कलाप्रिय जनता को जाता है। महिलाओं की मांग है कलात्मक वस्त्रों की तो आदमी कैसे चुप बैठा रह सकता है।
बुद्ध की पेंटिंग से शुरू हुई रोगन कला
बामियान में बौद्ध अनुयायियों का नगर हे-जो दो हजार साल बाद मिला है। जहां उनके घर, घरबखरी, लकड़ी, कपड़ा, हर चीज पर बुद्ध ही बुद्ध मिले हैं। अलबत, भग्नावशेष के रूप में चार-पांच सौ साल से रोगन चित्र कला भारत में होती है। गुजरात राजस्थान की सीमा पर डीसा के पास भाभर गांव है, जो रोगन का मैनचेस्टर माना जाता है। इसके अलावा कच्छ के चौबारी,वागड, निरोणा (नखत्राणा), अंजार, भुज, माधापर और गुजरात के अन्य स्थानों मेहसाणा, पाटन, वीरमगाम,अहमदाबाद में भी प्रस्तुत कला के अंश मिलते हैं। वर्तमान में कच्छ के निरोणा और भुज के माधापर गांव के सन्निष्ठ कलाकार इस लुप्त हो रही और खासी महंगी कला का निष्ठा से जतन कर रहे हैं। माधापर के आशिष कंसारा रोगन कला को जीवित रखने के लिए खुद भी कलाकृतियां बनाते हैं और उनके तालीम शिविर आयोजित कर नई पीढ़ी को इससे अवगत कराते हैं। इस कला की व्यापकता और प्रकार बहुत व्यापक है, जिसे दिल से समझने के लिए आशिष बचपन से ही सक्रिय हैं। गुरु अशोक से मिली समझ को यह निष्ठावान शिष्य चारों ओर फैला रहा है। अपने किए गए अध्ययन के निष्कर्ष के आधार पर उनका कहना है कि रोगन कला अनेक विषयों को ध्यान में रख कर की जा सकती है, जिसमें सीमित मात्रा में मात्र पांच ही रंगों का सीमित उपयोग किया जाता है तो शास्त्रोक्त पद्धति के अनुसार इसमें हरा,पीला, भूरा, सफेद और केशरी रंग लगाया जाता है। पुराने समय में गुजरात में भरवाड़, रबारी,अहीर और पटेल परिवारो में महिलाएं रोगन कला वाले कपड़े पहनती थीं। खास कर लड़कियों के विवाह में दहेज में इसी कला से बना घेर वाला घांघरा देने के रिवाज था, वह भी मोटे खद्दर के कपड़े का।
वीरेंद्र बहादुर सिंह
नोएडा उत्तरप्रदेश
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