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कविता@खंडहरपन…

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फिर तबाही का मंजर हर तरफ छाने लगा
गम का दरिया फिर चारों ओर बहने लगा है।
करते थे जो आधुनिकता का दावा अपने वहम में
पुरातत्व में उनका अस्तित्व फिर खोने लगा है।
मानने थे जो अपनी सत्ता आसमान से भी ऊंची
पर्वतों के नीचे उनका अहम दमन होने लगा है।
करते थे जो परिहास औरो की कमियों पर
आज उनके दर्प पर कुदरत का अट्टहास होने लगा है।


डॉ.राजीव
जनयानकड़ कांगड़ा
हिमाचलप्रदेश


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