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कविता @ हवाओं से ख्वाहिशें…

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हवाओं की तरह होती है ख्वाहिशे
ना एक जगह टिकती है
ना एक जगह रूकती है
बहती रहती है निरंतर
उड़ाती रहती है परों पर अपने
नित नई ख्वाहिशों के पर
हवा की तरह इन ख्वाहिशों का भी
कोई आशियाना नही होता
रंग ,रूप और आकार नही होता ।
बस फैली रहती है ये मन के संसार में
इन ख्वाहिशों का कोई मजहब नही होता ।


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