Breaking News

कविता @ सांस की कीमत पूछी गई…

Share


सांस की कीमत पूछी गई
साँस-साँस को मोहताज किया,
जीवन को नीलाम किया।
मासूम थी,बस एक साल की,
फिर भी व्यवस्था ने इनकार किया।
वेंटिलेटर चाहिए? पूछा गया,
सिफ़ारिश है? तौल कर कहा।
दोपहर से लेकर रात तलक,
बच्ची की साँसों ने दस्तक दी हर पल।
कभी सिस्टम की फाइल में अटकी,
कभी डॉक्टरों के मुँह के फेर में भटकी।
कंधे पर बैठी थी ममता की पुकार,
पर अस्पताल ने लगाया इंतज़ार।
पीजीआई की गलियों में चीख गूँजती रही,
परदीवारें खामोश रहीं,मशीनें बंद पड़ी रहीं।
नही थी वो वोट,न पहचान की सिफारिश,
बस थी एक जान मासूम,बेगुनाह,बेपरवाह।
सिस्टम का क्या दोष कहें?
यहाँ तो जिंदा रहने के लिए भी पहचान चाहिए।
गरीब की बेटी हो या किसान का बेटा,बिना जुड़ाव, बिना सत्ता-नहीं मिलता हक़ जीने का।


Share

Check Also

लेख@ वकालत को सुरक्षित पेशा ही नहीं,सुरक्षित जीवन भी चाहिए : अधिवक्ता देव प्रसाद जोशी

Share छत्तीसगढ़ में अधिवक्ता संरक्षण की नई परिकल्पना : सुरक्षा,शुरुआती संघर्ष, बीमारी,वृद्धावस्था और न्यायालयीन कार्यस्थल…पांचों …

Leave a Reply