
धृतराष्ट बोला-हे संजय,कलिकाल मेँ इक्कीसवी सदी के प्रारम्भ मेँ अपने राज्य हस्तिनापुर सहित इंद्रप्रस्थ अर्थात दिल्ली के बारे मेँ जानने को उत्सुक हूँ तुमने बीसवी सदी तक के हालत के जो डरावने रूह कपाने वाले दृश्य बतलाये उससे मेरी आत्मा लहूलुहान हो गई है। मैं स्वीकारता हूँ की जगदीश्वर श्रीकृष्ण के लाख प्रयास ओर शांति प्रस्ताव को मैंने अपने बेटे दुर्योधन की हठधर्मिता ओर महत्वाकांक्षा के सामने मुझे झुकना पड़ा ओर कुरुक्षेत्र मेँ अनगिनत राजाओं सहित महारथी, रथी, परमवीर योद्धाओ का रक्तपात हुआ ओर महिलाए विधवाए हुई व बच्चे लाबारिस हुये। कुछ समय बाद हम भी युधिष्ठर को राजपाट सौंपकर वन की ओर निकल रहे इसीलिए तुम्हें तीनों कालों में झाँकने की दिव्यदृष्टि मिली होने से हमारे इस राज्य को कौन कैसे लोग भोगेगे। जैसा की अब तक तुमने बताया की बीसवीं- इक्कीसवीं सदी में हर घर में दुर्योधन ओर दुशासन जन्म लेंगे, ओर ये लोग ही आपस में खोटे काम कर कर मर जाएँगे किन्तु इनका काम सच को बरची की नोक पर टांककर सच का गला काट झूठ को स्थापित करना रहेगा। जब ये लोग सच को मिटा चुके होंगे तब इनका बोया झूठ ज़माने भर में अपने को विस्तारित कर लेगा । यानी पहले सच के रहमोकरम पर युधिष्ठिर सत्ता में रहा अब शकुनि मामा के षड्यंत्र के रहते आगे भी उसे सत्ता नहीं मिलेगी ? अखण्ड राष्ट्र खण्ड-खण्ड हो जाएगा। जो भारत खण्ड होगा उसमें महिलाओं ओर बच्चों के गंभीर-घिनौने अपराध होंगे,विधर्मी रसना के स्वाद के लिए गौमाता को कत्ल करेंगे। दुर्योधन के हथियारों के नाख़ून बुरी तरह बढ़ गए थे इसलिए वह युद्ध के लिए बड़बोलेपन की सीमाए लांघ भीष्म, गुरु द्रोणाचार्य,कृपाचार्य और कर्ण जैसे अजेय दीवारों की सुरक्षा के अहंकार में मदमस्त था इसलिए हथियारों के इन बड़े नाखूनों से युद्ध करने को विवश था. वह सत्ता प्राप्त करने के लिए सौ सौ झूठ, कपट, बेईमानी को प्रजा अपना राजा चुनेगी, अगर मजबूत चुना तो कोई दिक्कत नहीं लेकिन मजबूर चुना तो कुर्सियों की मुंह मांगी कीमत व्यापार चलेगा जब व्यापार चलेगा तो देश क्या खाक चलेगा । यह फिर मानवता कहाँ बचेगी। लेकिन किसी को देश की चिंता नहीं है, फिर उनके समक्ष मानवता की बात करना बेमानी है, हाँ देश में शासन करने के लिए उन्हें महाझूठ की वह कला में सिद्धि प्राप्त है जिसके तहत झूठ को बार बार बोलकर उसे सच साबित किया जा सके। जब महाभारत युद्ध में धर्मराज अपने गुरु के अश्वत्थामा के मरने का आधा सच बोलकर गुरु के हाथों से शस्त्र रखवा देता है वही स्थिति आज की राजनीति में आ गई ओर जनता आधे झूठ को सच मानकर आधे झूठ की कला के पारंगत राजनीतिज्ञों के समक्ष समर्पण कर देते है ओर इस कला से कुर्सी पाने के माहिर अपने लक्ष्य में सफल भी हो जाते है।
संजय वोला-महाराज आपके आत्मचिंतन से कुछ होने वाला नहीं सिवाय मेरा ही समय खराब होता है, ओर आप है की खुद का घर परिवार के साथ न्याय नहीं कर अपने बेटे के सगे नही हुये ओर उन्हे मरवा दिया, फिर कलयुग के लोगों की चिंता मेँ क्यों दुबले होते हो।धृतराष्ट्र ने आक्रोश ओर झुंझलाहट में एक गहरी सांस ली ओर कहा- संजय आजकल तुम पहले वाले नरमदिल ओर राजा के प्रति समर्पित नही दिखते जो जली कटी बातें सुनाते हो? तुम हमारे पुराने सेवक हो ओर शिष्टाचार ओर मर्यादा का निर्वहन करने में अग्रणी होते जा रहे हो। मानता हूँ मुझ जैसे नेत्रहीन शासक के दरवार में विश्व के महानतम सलाहकार, मंत्री ओर एक से एक महारथी थे,जो दुनिया के किसी राजदरबर में नहीं रहे तब में उनके नीतिगत वचनो ओर सलाह सुने बिन न्याय नही कर सका भले मुझे नेत्रहीन को समाज माफ न करे किन्तु मेरी आत्मा खुद के शासन मेँ लिए गए हर निर्णय से खुद को माफ कर रही है,तो समझो मैं संतुष्ट हूँ। संतुष्ट इसलिए की मुझ नेत्रहीन के बाद यह अखण्ड राष्ट्र सेकड़ों टुकड़े मेँ बंट जाएगा,जिनके खंडों पर जिनकी अपनी संप्रभुता होगी वही मेरा यह इंद्रप्रस्थ भरतखण्ड का एक हिस्सा बनने पर वहाँ की प्रजा संविधान को ही अपना धर्म मानेगी। शासन करने के लिए लोग दल बनाए या दलदल,जनता का अभिमत लेकर एक दल पूर्ण बहुमत प्राप्त कर पूर्णकालिक सरकार चलाये तो ठीक। वरना असंख्य दलों का खंड खंड बहुमत मिलने पर जो ज्यादा सीट जीतने वाला दल होगा वह सत्ता के द्वार पर तो पहुँच जाएगा लेकिन पूर्ण बहुमत के लिए जो गठजोड़ करेगा वह देश के लिए नही बल्कि एक व्यापारी के तरह सौदेवाजी होगी। संजय महाराज की हर बात को इत्मीनान से सुन रहा था ओर आश्वस्त था की उसने जो महाराज को बताया उससे कहीं अधिक वे सटीक व्याख्या करने में निपुण हो गए।
आजादी के बाद के शासकों ओर शासन की नीति तथा देश की प्रगति ओर नागरिकों के हालातों व परिस्थितियों की जानकारी से महाराज धृतराष्ट्र अवगत हो चुके थे ओर जाति धर्म संप्रदायों के झगड़े, फसाद के अलावा शिक्षा के नाम पर, स्वास्थ्य के नाम पर चल रहे षडयंत्रो व शिक्षा के बाद युवाओं को नौकरी रोजगार न देने से दुखी होकर संजय को पुकारा ओर संजय ने वही अपने गले का पुराना ढ़ोल पीटना शुरू किया ओर कहा-महाराज में भारत देश के 2024 में सम्पन्न होने वाले महाभारत का हाल सुनाना चाहता हूँ उसे ध्यान से सुनिए। बात 2014 की है गुजरात का एक चाय बेचने वाला नरेंद्र मोदी भारत का शासक चुन लिया जाता है ओर उसकी विश्वव्यापी ख्याति होती है। वह दूसरी बार अपनी ख्याति को 2019 में भुनाकर पूर्ण बहुमत ले फिर देश का प्रधान बन जाता है। मोदी का अहंकार आकाश छूने लगता है, सभी को सोते-जागते,उठते-बैठते लगता है की मोदी के डंके की आवाज पूरी दुनिया में गूंज रही है। असल चुनाव एक बड़ा महाभारत है जो कुरुक्षेत्र का हिस्सा है। फिर इस महाभारत में मोदी का डंका नहीं बजा ओर वे अपने प्रतिद्वंदी राहुल गांधी ओर खुद अपनी ही पार्टी को समझने में चूक कर गए। उनकी निम्नस्तरीय भाषा संवाद में दिये गए भाषण,विभिन्न वेशभूषाओं में पूजा पाठ करके खुद को दिखाने से देशवासी प्रभावित नही हुये। 85 करोड़ लोगों को पाँच किलो गेहूं की लाइन में लगाकर उनकी खाली जेबों का ध्यान न रखना, शिक्षा के बाद नौकरी के इंतजार में ओवरएज होती पीढ़ी का गुस्सा ओर तनाव, अग्निवीर जैसे प्रयोग ने मोदी का डंका पिटवा दिया ओर वे दलदल में गिरने को तैयार हो गए।
संजय बोला महाराज वर्ष 2024 में मोदी जी अति उत्साह में थे ओर उन्होने जो झूठ, महाझूठ की शुरुआत की तो वह थमने का नाम ही नही ले रही थी। अपने को महान बनाने के लिए अपनी महानता के झूठ के पल बांधते, अपने विरोधियों के प्रति झूठ पर झूठ का जहर उगलते रहे, जनता समझती रही। उन्होने इस बार झूठ बोया,झूठ का अंकुरण पैदा हुआ फ्री झूठ का वृक्ष पैदा हुआ ओर देखते देखते झूठ का जंगल खड़े हो गए और आज पूरा देश झूठ की हवाओं में सांस लेने को विवश है। मोदी की गारंटी के नाम से यह प्रचार शुरू हुआ झूठ के जंगल से दहाड़ने वाले मोदी को झूठ की ही फसल काटनी पड़ी। आज पूरा देश देख रहा है मोदी की गारंटी के कारण कुर्सी की जंग शुरू हो गई है। भले ही एनडीए चुनाव जीत गया हो परंतु मोदी की गारंटी चुनव हार गई है, अब यही मोदी की गारंटी पाँच साल के शासन की बागडौर संभालने को है ओर अपने हरेक सहयोगी को कुर्सी देने की गारंटी लो गई है। मोदी के तीसरी बार प्रधानमंत्री बनना अपने आत्म गौरव ओर सम्मान को बनाए रखना है। मोदी की जो कुर्सी की गारंटी है वह एनडीए ओर भाजपा नेतृत्व के गठबंधन की डोर पाँच साल तक मजबूत रखने के लिए है किन्तु मोदी जी कुर्सी के लिए सभी तरह के समझौते कर भी ले तो इस मनमाफिक सौदेबाजी के बावजूद राजनीतिक स्थिरता मजबूत बनी रहेगी इसकी गारंटी उनके पास नहीं है। मोदी जी गारंटी के फेर में अभिमन्यु के तरह चक्र में फसे दिख रहे है जो राजनीतिक झटको ओर अशांति के कमजोर पक्ष को समझते हुए जनता के निर्णय पर चिंतन अवश्य करेंगे। उन्हे समझ लेना चाहिए की अहकार किसी का भी नहीं रहता है ओर वे इस बात का भी आत्ममंथन करे की लोकतंत्र में डंका जनता का ही बजता है,उनका नहीं। महाराज बोले ठीक है संजय कुर्सी की गारंटी यानी शासन करने के लिए गृह,कृषि,रेल, वित्त आदि विभागों की सौदेबाजी ओर बंदरबांट के बाद के परिणामों पर दुबारा चर्चा करूंगा,अब मैं विश्राम की ओर चलता हूँ।
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