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कविता@उसूलों का राही…

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उसूलों पे चलने वाला का
पाँव में पड़ जाता है छाला
कर्ण बहिरा बन। जाता है
लव पे लटक जाता है ताला
दिल का सच्चा वो होता है
ना होता है मन का वो काला
ईष्या द्वेष की ना है फितरत
सच्चा मन सच्चा दिलवाला
पाँव में ठोकर खा वो गिरता
दिल में उम्मीदों को है पाला
पथ चाहे कितना मुश्किल हो
पार कर जाता कठिन सा नाला
उसूलों पे चलने की हसरत
रोक नहीं सकता है जग वाला
मन ने ठाना मंजिल है पाना
कब रूकता है हसरत वाला
भले दीवार खड़ी कर दे दुश्मन
जब भी मूरख हो जाये जाला
हँस कर झेल लेता है अक्सर
जो है उसूलों पे चलने वाला


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