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कविता@उपेक्षित नारीःविधवा…

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समाज की एक उपेक्षित नारी
जनमानस कहते जिनको बेवा
दुर्भाग्य का प्रतीक समझते जिनको
जिनके साथ जुड़े तरह-तरह की भेवा
इनके प्रति होते नकारात्मक भाव
और रूढç¸वादी विचारधारा
सामाजिक कार्यों से होती अलगाव
सब खुशहाली,पर्वों से होती किनारा
जैसे उनकी परछाई या स्पर्श से
अशुभ लक्षण हममें भी घिर आयेगी
ज्यों हुए वह खुशियों से वंचित
वैसे ही हमारे जीवन को भर जायेगी
मुंडन,षष्ठी,विवाह हो चाहे अन्य कारज
अमांगलिक सा बर्ताव होती
अछूत सा मन में घर कर लेती धीरज
भले ही सिसकती,रोते रहती एकांत में
जीवन बिताती अलग और शांत से
न घर बसाने का पुनः अवसर मिलता
न परम्परा में कोई दिखता बदलाव है
दु:ख,तनाव,चिंता,घुटन भर-भर के
पग-पग में मिलती पीड़ा की छाँव है


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