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लेख@नई सेंडिल

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रानू को अपने मायके की शादी जाना था। उसने अपनी छोटी बहन यामिनी को भी अपनी ससुराल बुला लिया। साथ में यामिनी के दोनों बच्चे भी थे। उन्हें परसों सुबह निकलना था। आज सुबह ऋ षभ राजनांदगाँव जाने के लिए निकल ही रहा था; तभी सरला ने कहा- ऋषि ! मेरे चश्मे की डंडी टूट गई है बेटा। शाम को वापस आते समय नई डंडी लगवा कर ले आना। चश्मे के बगैर मुझे ठीक से कुछ नहीं दिखाई देता। आँखें दुखती है। सर भी दुखता है। हाँ,ठीक है माँ। कहते हुए ऋ षभ घर से निकाला।
शाम को घर लौटते समय ऋषभ का मोबाईल घनघनाया। देखा। रानू का नंबर था। रिसीव किया। कुछ देर तक बातें हुई। उसके घर आते तक रात हो गयी।
दूसरे दिन सुबह होते ही ऋ षभ ने सरला से कहा- माँ ! आपके चश्मे की नई डंडी नहीं लगवा पाया। अगले सप्ताह और जाना होगा। बिल्कुल लगवा ही दूँगा। माँ, दरअसल क्या है कि आज रानू और यामिनी शादी कार्यक्रम में जा रही हैं। चश्मे के लिए मैंने जो पैसे रखे थे, यामिनी के लिए नई सेंडिल ले आया। बहुत जरूरी थी नई सेंडिल। पुरानी चप्पलें पहन कर वह भला कैसे जाएगी।
कुछ देर बाद ऋ षभ यामिनी को नई सेंडिल पहनते हुए देख रहा था; तभी उसकी नजर सरला पर गयी। सरला अपने चश्मे पर टूटी डंडी की जगह रस्सी बाँध रही थी।लेख


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