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कविता @ जीवन-सार

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मैंने अपनी प्रियतम को जब,
होले से एक टेर लगाई,
कुछ सकुचाती,कुछ मुस्काती,
पल में दौडी¸-दौडी¸ आई।
आंखों से आंखें मिलते ही,
शर्म से पलकें फिर झपकाईं,
जैसे बदली सावन आते,
करती है ज्यूं लुका-छुपाई।
हमने जब पूछा फिर उनसे,
कैसे हैं अब हाल तुम्हारे,
गालों पर लाली-सी लाकर,
कांधे पर रख शीश हमारे।
कुछ पढ़ती कुछ अनसोची-सी,
भावों में बह गई प्रियतमा,
अश्रु पल-पल उभर रहे थे,
कुछ छलके कुछ ठहर रहे थे।
उलझ रहे थे केश जो उसके,
जैसे पीढ़ा हो कोई मन की,
जैसे ही हंसती वो खिलकर,
लगती कली खिली उपवन की।
हम उसके चेहरे को पढ़कर,
अपने उत्तर खोज रहे थे,
मन में भेद रखा ना उससे,
जीवन सार सहेज रहे थे।


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