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हमें भी हिसाब दो…

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हमारे देश की राजनीति आजकल अजीब मोड़ पर आकर खड़ी हो गई है! किसी भी दल का कोई भी आदमी दूसरे दल के बारे में कुछ भी कहने में स्वतंत्र है! कहने को तो देश संविधान के अनुसार चल रहा है लेकिन संसद के अंदर तथा संसद के बाहर जिस तरह हमारे जन प्रतिनिधि अमर्यादित तथा अजीबो गरीब भाषा का इस्तेमाल करते हैं उसे देखकर तो हम जैसे पुरानी संस्कृति के आदमी दांतों तले उंगली दबाते हैं। समय-समय पर भाजपा द्वारा कांग्रेस को अपने पिछले 70 सालों के प्रशासन का हिसाब देने की बात कही जाती है। इसके प्रत्युत्तर में कांग्रेस के लोग कहते हैं कि उनके शासन में डैम बने, सार्वजनिक क्षेत्र में आधारभूत तथा मौलिक उद्योगों की स्थापना हुई, आज़ादी के बाद से लेकर अब तक विदेशों के साथ जो मधुर संबंध है वह कांग्रेस प्रशासन के कारण ही हुए हैं आदि आदि। इसके बदले कांग्रेस वाले भाजपा से पूछते हैं कि आप भी अपने 10 साल के प्रशासन का हिसाब दो, भाजपा वाले जवाब देते हैं कि उनके प्रशासन में राम मंदिर बनाया गया, जम्मू कश्मीर में धारा 370 समाप्त की गई, जम्मू कश्मीर में आतंकवाद को नियंत्रित करने में सफलता मिली, देश में इतना आर्थिक विकास हुआ कि हमारी अर्थव्यवस्था विश्व की पांचवी बड़ी अर्थव्यवस्था बनने जा रही है और जल्दी ही तीसरी बड़ी अर्थव्यवस्था बन जाएगी,हमारे यहां जी 20 सम्मेलन आयोजित किया गया, आज भारत का नाम संसार के अनेक देशों में सम्मान के साथ लिया जाता है। इस तरह भाजपा तथा कांग्रेस एक दूसरे के शासन काल का हिसाब मांगते रहते हैं। अपनी प्रशंसा तथा दूसरे पक्ष की आलोचना करते हैं। और मतदाता हैं वह सभी राजनीतिक दलों से उनके शासनकाल का हिसाब किताब मांगते हैं। पूछते हैं…आपने हमारे लिए क्या किया? आपके शासनकाल में भ्रष्टाचार, कीमतों में वृद्धि, गरीबी, भुखमरी, चिकित्सा सुविधाओं का अभाव आदि अपनी चरम सीमा पर थे। आप लोग हमारी समस्याओं को हल करने के बदले में एक दूसरे को नीचा दिखाने में
लगे रहे, कुर्सी पर कब्जा करने के अलावा आपको कुछ याद ही नहीं आया। चुनाव के समय आप हमारे साथ लोक लुभावने वायदे करते हो लेकिन हमारी मूल समस्याएं जस की तस हैं। आप अपनी तिजोरिया भरने में लगे रहे, सरकारी खर्चे पर विदेशी दौरे करते रहे। हमारे करो के द्वारा संसद तथा सरकार चलती है, लेकिन संसद में आप लोग जो कर्तव्य पूरा करने के नाम पर मर्यादा का उल्लंघन करते हो,असंवैधानिक भाषा का प्रयोग करते हो,वॉक आउट करते हो उससे आपको संसद में भेजने के लिए हमें शर्म आती है। आप हमारी खून पसीने की कमाई में से करो के तौर पर प्राप्त आमदनी का जो दुरुपयोग करते हो उसका हमे हिसाब दो।
मैं इस देश की महिला हूं। पुरुष प्रधान समाज में मैं भी आपसे हिसाब मांगती हूं। आप मुझे पैदा होने से पहले कन्या भ्रूण हत्या के द्वारा पैदा होने से क्यों रोकते हो? मुझे जन्म लेने का अधिकार क्यों नहीं? पुत्र के पैदा होने पर तो पिता मूंछ को मरोड़ी देकर गर्व महसूस करता है जबकि लड़की पैदा होने पर घरों में कई कई दिनों तक मातम मनाया जाता है। मां-बाप खुद ही बेटे और बेटी के पालन पोषण में भेदभाव करते हैं। क्यों? मुझे भी इसका हिसाब दो। जैसे-जैसे मैं बड़ी होती हूं बाग मे खिलने वाले फूल गुलाब की तरह हर कोई मुझे तोड़ लेना चाहता है, आसमान में उड़ने वाली पतंग की तरह मुझे काट लेना चाहता है,क्यों? मुझे इसका हिसाब दो! जब मेरा विवाह होता है तो लड़के वाले मेरी बोली लगाते हैं! कितना दहेज दिया जाएगा, लड़के वालों की तरफ से कितने बाराती आएंगे, विवाह शादी बैंम्टि हॉल में ठाठ बाठ तरीके से होनी चाहिए, मेहमानों की मिलनी पर लिफाफे में अच्छी खासी धनराशि होनी चाहिए आदि आदि बातें मेरे दिल को छलनी कर देती है। इतना ही नहीं, मेरे घर वालों के द्वारा सब कुछ कर दिए जाने के बाद भी ससुराल में मेरे साथ इस तरह का व्यवहार नहीं किया जाता जिस तरह लड़के वाले अपनी लड़की के अपने ससुराल में मान सम्मान वाले तरीके से किए जाने की आशा करते हैं।। मैं सब कुछ छोड़कर ससुराल में आई हूं, मुझे कभी अपना नहीं समझा जाता। मायके वाले कहते हैं कि ससुराल ही तेरा घर है और ससुराल वाले कहते हैं तेरा घर तो मायका है। अब आप ही बताओ मेरा घर कौन सा है। मैं समाज से हिसाब मांगती हूं। मेरे विवाह से लेकर मेरी मृत्यु तक मेरा तथा मेरे घर वालों का शोषण होता है। मेरे संतान हो तो मेरे घर वालों का यह फर्ज बनता है कि बच्चे के लिए कपड़े तथा पैसे दें, मेरे ससुराल में कोई शादी हो तो मेरे घर वालों का यह फर्ज बनता है कि अधिक से अधिक योगदान दें, मेरी मृत्यु हो तो भी सारा खर्च मेरे घर वाले ही उठाएं। मुझे मेरे पैदा होने की इस प्रकार की सजा क्यों दी जाती है, मैं भी समाज से हिसाब मांगती हूं।
मैं एक पिता हूं। परिवार के लिए किसी न किसी प्रकार से कमा कर लाना, परिवार के सदस्यों की देखभाल करना,बच्चों को पढाना, उनकी नौकरी का प्रबंध करना, उनका घर बार बसाना यह मेरी जिम्मेवारी है। मेरे घर वालों को इस बात की कोई चिंता फिकर नहीं है कि जब मैं घर की जिम्मेवारियां पूरी करने के लिए बाहर कमाने जाता हूं तो मुझे कठिनाइयां तथा अपमान का सामना करना पड़ता है। इस सारे के बावजूद भी घर के बच्चे मुझे यह कहने में कोई शर्म महसूस नहीं करते कि,,, आपने हमारे लिए किया ही क्या है? जब मैं कहता हूं कि मैंने आपको पाल पोस कर बड़ा किया है, तो बच्चे कहते हैं यह तो आपका फर्ज था। अगर आप हमारी देखभाल नहीं कर सकते थे तो हमें पैदा ही क्यों किया। यह है इनाम जो मुझे अपने परिवार के सदस्यों की भलाई के लिए गर्मी, सर्दी, बरसात आदि के मौसम में उनके लिए कमाने के लिए मिलता है। और जब मैं बूढ़ा हो जाता हू तो मैं घर वालों के लिए एक बोझ बन जाता हूं। कोई मेरा कहना नहीं मानता, कोई मुझे इज्जत नहीं देता, समय पर खाना नहीं मिलता, कोई मेरे से पूछ कर कोई काम नहीं करता, बीमार होने पर मुझे एक कोने में बिठा दिया जाता है और बहुत बार तो घर वाले बुजुर्ग को उसकी धन संपत्ति पर कब्जा करके वृद्ध आश्रम धकेल लेते हैं और फिर कभी उसका हाल-चाल पूछने नहीं जाते। ऐसी स्थिति में परिवार के प्रति ईमानदारी से निभाए गए कर्तव्य के बदले में मुझे भी हिसाब चाहिए। क्या कोई मुझे न्याय दिलवाने में मेरी मदद करेगा। मैं आपके जवाब की इंतजार कर रहा हूं। जिन-जिन से हिसाब मांगा गया है उन्हें हिसाब तो देना पड़ेगा अन्यथा एक दिन ऐसा आ सकता है जब हिसाब मांगने वाले हिसाब देने वालों के पीछे ऐसे पड़ जाए जैसे शहद की मक्खियों को छेड़ने के बाद मक्खियों काटने के लिए पीछा नहीं छोड़ती।
प्रोफेसर शाम लाल कौशल
रोहतक हरियाणा


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